भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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१३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(१) इसी प्रकार कुंडली में जन्म का चन्द्र नीच का हो या शत्रुगृही हो और

ऐसे चन्द्र की वुध अष्टक वर्ग में यदि द्वितीय स्थान में कोई रेखा हो तो वात करने

में लज्जा मानने वाला होता है । बोलने में व्यवस्था रहित होता है ।

(१०) लग्न से द्वितीय स्थान में बुध को रेखा पड़ती हो और शुभ राशि हो तो

जातक प्राय: आनन्द दायक वातों का बोलने वाला होता है ।

(११) बुध ६-८-१२ भाव मे हो उसमें ३ या कम रेखा हों, बुध पर किसी

शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो आलसी और जुआड़ी हो ।

(१२) वृध शुक्र के साथ ६-८ या १२ भाव में हो यदि बुध पर तीन या कम

रेखा हों तो विद्या रहित हो ।

(१३) बुध अ०वगं से चतुर्थ में शुभ रेखाओं से माया आदि की संख्याजानना ।

गुरु के अष्टक वर्ग का फल

गुरु के स्थान से पंचम स्थान द्वारा ज्ञाति, पुत्र, धर्म धनादि का विचार होता है

  • एवं इस पंचम से अष्टम स्थान की रेखाओं से भी पूर्वोक्त रीति से जैसा सूर्य आदि में

बताया है विचार करना ।

(१) गुरु अष्टक० के जिस राशि में सबसे अधिक रेखा हो उस राशि गत लग्न

में गर्भाधान होने से पुत्र की प्राप्ति होती है । जिस दिशा की सूचक वह राशि हो

उस दिशा में खजाना, गौशाला, अस्तबल, हथसार, मोटर गैरिज भंडार आदि बनाने

से उस स्थान में सब प्रकार की वृद्धि होती है । जसे गुरु अष्टकवगं में धन में ७ रेखा

तुला में ६, वृश्चिक में ६ रेखा है धन-पूर्व । तुला-पश्चिम। वृश्चिक-उत्तर। यहाँ

३ दिशायें शुभ हैं इनमें विशेष रेखा है। सब में शुभ धन-पूवं दिशा का है।

(र) गुरु अष्टक० में जिसमें सबसे कम रेखा हो उस राशि में जब गोचर का सूरय

जाता है उस मास में कार्थ करने से निष्फलता होती है ।

(३) लग्न से ६-८-१२ भाव में गुरु जिस राशि में हो उसकी ५ या अधिक रेखा

हों तो वह दीर्घायु और धनी हो शत्रु पर विजय पावे ।

(४) ४, ९, १२ राशि का गुरु केन्द्र में या नवम में हो या किसी राशि में हो

परन्तु नीच का या शत्रु गृहीत हो या अस्त न हो जिस राशि में गुरु हो उसकी ८ रेखा

हो तो अपने यत्न से पृथ्वी का स्वामी, धनवान्‌ और राजा तुल्य होता है उसकी

बुद्धिमानी ओर शुभ गुणों की बहुत ख्याति होती है।

इस योग में गुरु के साथ चन्द्र भी हो ओर केवल ७ ही रेखा हों तो धनवान्‌ हो

स्त्री और बहु सन्तान का सुख हो । ६ रेखा-धनवान्‌ वाइन आदि का सुख भोगने

वाला संतान युक्त होता है। ५ रेखा-अयशील, शीलवान्‌ । मतांतर ७-८ रेखा-्त्री'

एवं धन से चिरकाळ सुखी । ६ रेखा-धन-वाहन आदि सुख। ५ रेखा-श्रेष्ठ

स्वभाव वाला ।

(५) गुरु से चन्द्र ६ या ऽ स्थान में हो । गुरु अष्टक वर्ग में चन्द्र स्थिति राशि

पर रे या कम रेखा हों तो राजयोग रहने पर भी सदा ऋण ग्रस्त रहे ।