सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
शनि--बड़ा आलसी, घन हीन, सत्य रहित, मालिन, व्यसनों से युक्त
(जा० भ०) । धनी (वृ० जा०) ।
(११)कुम्भ के चन्द्र पर दृष्टि
सूर्य की--खेती के वळ सहित, जुआ खेलने वाला, राजा का आश्रित, धर्म
मैं तत्पर (जा० भ०) ! परस्त्री गामी (वृ० जा०) !
मंगल की--मकान, धन तथा माता-पिता के वियोग को प्राप्त, बड़े कठिन
पदार्थों को पैदा करने वाला, बहुत बोलने वाला, मलिन चित्त, अत्यन्त धूर्त
(जा० भ०) । परस्त्री रत (वृ० जा०) ।
बुध की--विषय और सोख्य सहित, भोजन विद्या जानने वाला, अत्यन्त
पवित्र, प्यारी वाणी (जा० भ०) । राजा (वृ० जा०) ।
गुरु की--धरती, नगर, ग्राम आदि के सुख से युक्त, भोगों से युवत, सत्पुरुषो में प्रवृत्ति करने वाला; श्रेष्ठ पुरुष (जा० भ०) | राजा तुल्य (वृण्जा) ।
शुक्र की- मित्र, पुत्र, स्त्री तथा भकान के सोख्य से रहित, दीन, गौरव
हीन, (जा० भ०) । पराई स्त्री में तत्पर (वृ० जा०) ।
शनि की--गधा, ऊँचे नवीन घोड़ों का लाम करने वाला, खोटी स्त्री में तत्पर धर्मे के विरुद्ध वृत्ति वाला (जा? भ०) । परस्त्रीगामी (वृ जा०) । शुभ अह की दृष्टि से, यश धन युक्त । पाप ग्रह की दृष्टि हो तो, परस्त्रीगामी (जा० पारि०) !
(१२) मोन के चन्द्र पर दृष्टि
सूर्ये की--कामदेव का सौख्य अत्यन्त प्राप्त, सेना का स्वामी, बहुधन कौ वृद्धि, श्रेष्ठ कर्मों की सिद्धि को प्राप्त (जा० भ०) । पापी (वृ० जा०) । मंगल कौ--शत्रु युक्त, कुलटा स्त्री से मित्रता, सुख से हीन, पाप में तत्पर (जा० भ० । पापी (वृ० जा०) ।
बुध की--श्रेष्ठ स्त्री पुरुषों के सुख को प्राप्त, मान और.घन राजा की कृपा से प्राप्त (जा० भ०) । मशखरा (वृ० जा०) । गुरु की- उदार चित्त, सुकुमार शरीर, श्री, स्त्री और पुत्रादि का सौख्य, राजा (जा० भ०) । राजा (वृ० जा०) ।
शुक्र की--श्रेष्ठ गति, श्रेष्ठ विद्या में तत्पर, श्रेष्ठ वृत्ति वाला, स्त्री के साथ विलास करने में शक्ति, विद्वान् (वृ० जा०)।
शनि-कामातुर, स्त्री और पुत्र रहित, नीच स्त्रियों के साथ मित्रता (जा० भ०) पापी (वृ० जा०) ।
शुभ दृष्टि से हास्य प्रिय, राजा या विद्वान् हो । पाप दृष्टि से कठोर वचन भाषी ओर पापात्मा हो । (जा० पारि०) 1 चन्द्र पर पाप ग्रह की दृष्टि से धन हानि, सिर व नेत्र में रोग । २ शत्रु „ ५7 पापकर्म, धननाश, गमागम होता है ।