सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 454 में से
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१५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(४) बुधवार--उस मास में विद्यारचि बढ़े परन्तु भय हो ।
(५) गुरुवार--उक मास में वस्त्रादि की प्राप्ति और सुख हो ।
(६) शुक्रवार--सुख । (७) शनिवार--दुःख और सन्ताप ।
(१) उदर रोग, शरीर पीड़ा, मानसिक व्यथा, भोजन में शीघ्रता या बिलम्ब,
सम्बन्धी मित्र सज्जनों से झगड़ा। (योत्र) । थकावट, धन की हानि, उत्तेजना,
थकावट उत्पन्न करने वाली यात्रा ।
(२) दुजनों की सङ्गति, नीच स्वभाव, मानसिक व्यथा, सिर एवं नेत्र में पीड़ा
कृषि एवं वाणिज्य की हानि और भय । धन हानि, दुःखी, घर से धोखा, जिद्दी ।
(३) रोग से मुक्ति, सुख, आनन्द, मित्रों से सम्मान, पुत्रों से सुख और अभीष्ट
लाभ, शत्रुओं का पराजय एवं लक्ष्मी तथा मान की प्राप्ति । नया स्थान प्राप्ति, धन
प्राप्ति सुख ।
(४) मानसिक एवं शारीरिक व्यथा, घर-झगड़ा, सुख की हानि, कुत्सित भोजन व्यसन । यात्रा में असुविधाएँ, पृथ्वी के योग में विघ्न, रोग, स्त्री योग में विघ्न । (५) आसक्ति, मन की व्यग्रता, मित्रों से असुविधा, धन की हानि, दीनता, चित्त में अस्थिरता तथा शत्रु व रोग का भय, बुरा स्वास्थ्य ।
(६) आनन्द, कायं की सिद्धि, स्वस्थता, अन्न वस्त्र की प्राप्ति, शत्रुओं का नाश,
धन और मान की प्राप्ति एवं सुख, रोग दूर, दुःख और मानसिक चिन्ता दूर ।
(७) कुटुम्ब एवं मित्रों से मतभेद, स्त्री और सन्तान को रोग, कार्य में असफलता उदर पीड़ा, यात्रा, थकावट प्रद यात्रा, पेट और गुदा में रोग ।
(८) अपने बुरे कामों का फल, शत्रुओं से झगड़ा तथा पीड़ा, खाँसी, राजभय, अपनी स्त्री भी रुष्ट, शत्रुओं से दुवंचन प्राप्त, अपमान, भय से त्रास, अति गर्मी से पीड़ा ।
(९) कांतिक्षय, मिथ्या अपवाद, अकारण धन और पुण्य की हानि, आय की कमी रोग तथा मानसिक अशांति, भय, अपमान, बन्धु वियोग, अति निराशा ।
(१०) धन, स्वास्थ्य, मित्र, कुटुम्व, राजा एवं बड़े लोगों से समागम, आनन्द,
अभीष्ट सिद्धि, बड़ा कार्य सफलता पुर्वक पूर्ण ।
(११) लाभ, धन, उत्तम भोजन, नवीन पद, स्वास्थ्य, बड़ों का अनुग्रह, गृह में
कोई आनन्द उत्सव का सुख, घन प्राप्ति, रोग निवारण, मान ।
(१२) जन्म-भूमि का त्याग, कुटुम्वियों से वियोग, कार्य एवं पद की हानि, अधिक
व्यय और कठिनाइयाँ, दुःख, धन हानि, भित्रों से कलह, अन्त में ज्वर ।
२--चन्द्र का गोचर फल प्रत्येक भाव का
१--रोग मुक्ति, सुख और आनन्द, धन, सत्कार, उतम भोजन और शैया, स्त्री-
सम्भोग, उपहार की प्राप्ति, भाग्योदय ।
२--मानसिक असन्तोष, नेत्र, रोग, चावल के अतिरिक्त अन्य पदार्थों का भोजन,
धन हानि ।