भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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१५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

७--धन का नाश, भोजन वस्त्र आदि में कमी, कुटुम्बियों (स्त्री) से असन्तोष,

भाई ओर सन्तान के क्रोध से दुःख, नेत्र एवं उदर रोग ।

८---शस्त्र प्यारा, परदेश वास, कार्य को हानि, पदच्युति, रोग एवं ऋण द्वारा मान हानि, ज्वर पीड़ा, जख्मो से दूषित देह, धन और मान नष्ट ।

९--अनादर, शरीर में पीडा, धातु क्षय से निर्बल, धन का अभाव, उष्णता, रोज￾गार के स्थान से हटना, धन आदि की हानि द्वारा अपमान, बल क्षय ।

१०--रोग दुःख, अपौष्टिक पदाथे का भोजन, किसी कार्यवश विदेश यात्रा,

रोजगार में विघ्न, दुष्ट चेष्टा, कार्य में असफलता, अन्य मत से धन प्राप्ति ।

११--उदय, आरोग्य, धन वस्त्र आदि की प्राप्ति, आनन्द, कायं में सफलता,

भूमि आदि की बढ़ती ।

१२--घन का व्यय, परदेश वास, सन्तप्त, रोग (नेत्र रोग), धन की हानि,

कुटुम्बियों से अनवन, अति उष्णता के रोग से पीड़ित ।

. बुघ का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--चुगलखोर, बन्धन; धन की हानि, कुटुम्ब से विरोध, झगड़ा, कुसमय का

भोजन, स्वागत विहीन, दुर्जनों की संगति ।

२--सवंदा आनन्द, धन एवं रत्नादि की प्राप्ति, अच्छे लोगों की संगति, अन्यमत

से अनादर ।

३ शत्रु भय,कुटुम्वियों से झगड़ा, धन हानि, अन्य मत से मित्र प्राप्ति ।

४--धन की प्राप्ति, माता या कुडुम्त्र को सुख, घन वृद्धि ।

५--पीड़ी, आकस्मिक झगड़ा, संतान व स्त्री से वियोग या अनवन, मृत्यु का भय,

गर्मी के कारण अंगों में शिथिलता ।

६- अन्न एवं वस्त्रादि की प्राप्ति, उत्तम पुस्तकादि के पढ़ने का सुख, सफलता ।

७--पीड़ा, सुख की हानि, द्रव्य की कमी, कुटुम्व एवं मित्रों से झगड़ा, राजभय,

निस्तेज शरीर, शरीर में शिथिलतां, विरोध ।

८--धन लाभ, पुत्र से सुख, बुद्धि का विकास, चित्त में अशांति, भोजन में अरुचि

मिथ्या वचन, सन्तान प्राप्ति ।

९- खेद, अपवाद, समस्त कार्यो में विघ्न बाधा- दूसरों को पीड़ा, कुत्सित भोजन,

पित्त से पीड़ा ।

१०--जये पद की प्रात्ति, वाक्य में चतुराई, शत्रु की पराजय से सुख, भोजन में

असुविधा, मन में अशान्ति, अपवाद ओर दुवंचन का पात्र ।

११--स्वस्थता, सुख, यश, धनागम, कुटूम्बियों से मित्रता, पुष्टि ।

१२--धन एवं सुख की हानि, चित में सन्तोष, भोजन में अरुचि, झगड़ा, कार्यों

में हानि, पराभव का भय ।

५--गुरु का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--भय, मान हानि, राजा से भय, रोजगार में झगड़ा, मानसिक व्यथा, पदार्थो