सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वतोभद्र चक्र : १७९
शतपद चक्क ( सवंतोभद्र चक्र के उपयोग के लिये )
षक ५ ह ७ ड ८ म १० ट ११ प १२ र १४ त १५
४कि ५ हि ७डि ९ मि १० टि ११पि १२ रि १४ति १६
४ कु ६घहु८ डु ९ मु १० टु ११ पु परु १५ तु १६
ङ छ ण १३ ठ
ए३वे५के७हे ८ डे ९ मे १० टे १२ पे १४ रे १५ ते १६
ओ४वो शको ७ हो ८डो ९मो ११टो १२पो १४ रो १५ तो १६
न १७य १८ भ १९ ज २१ख कचे ग२३ स२४द२५ च २७७ १
नि१७यि१८भि १९जि २१खि २२ गि २३ सि २४ दि २५ चि २७ लि २
नु १७ यु १८ भु २० धजु $ खु २२ गु २३ सु२४ दु२६थचु१ नु २
फढ फ्झ
ने १७ये १९ भे २१जे ३२ खे २२ गे २३ से२४दे २७ चे १ ले २
नो१८यो१९भो २१जो३२खो २२ गो २३सो २४दो २७ चो १ लो २,
यहाँ नक्षत्रों के नाम अंकों में बनाये उनके चारों चरण अक्षरों में एक सा अंक
पड़ा है जैसे अ इ उ ए प्रत्येक में ३ अर्थात् तीसरा कृतिका नक्षत्र सूचक अंक पड़ा है।
अभिजित का अंक ३* दिया है जिससे शतपद चक्रमें पुरे २७ नक्षत्रों के चारों चरणों
के अक्षर आ जाते हैं। अब इस चक्र के ऊपर के विना मात्रा वाले अक्षर अ, व, क,
ह, आदि यहाँ दिये क्रम से ही स्वतो भद्र चक्रमें दिये हैं जिसमें ६, १३, २० और २६
वाँ नक्षत्र पहिले वर्णन किये हुए केन्द्र के नक्षत्र हैं ।
शतपद चक्रका पृथक् भी विचार होता है। नाम के अक्षर के अनुसार नक्षत्र
के चरण होते हैं। जिस नक्षत्र के चरण में शुभया क्रूर ग्रह आवे उससे वेध
विचारते हैं ।
शुभ ग्रहों के वेध से शुभ फल । पाप ग्रहों के वेध से पाप फळ । शुभाशुभ ग्रहों
के वेध से मिश्र फल होता है । यह सत्र सवंतोभब्र चक्र के विचारने से स्पष्ट
प्रकट होगा ।
इस चक्र में लत्ता र प्रकार का है ।
(१) पुरोलत्ता--यह सूर्ये, मंगल, गुद और शनि की छत्ता है इसमें नक्षत्र आदि
की गिनती क्रम से होती है जैसे अश्विनी के बाद भरणी फिर कृत्तिका आदि ।
(२) पृष्ठ छत्ता--यह शेष ग्रहों का लत्ता है अर्थात् चंद्र, बुध, शुक्र, राहु, केतु की
यह लत्ता है । इसमें नक्षत्र आदि की गिनती विरुद्ध कम से होती है जैसे श्रत्रण के बाद
उल्टा गिना तो उ० षाढ़ा फिर पूर्वाषाढा फिर मूल इत्यादि ।
अन्तर विचार--
१ सूये से गिनने पर १२ वाँ नक्षत्र पुरोलत्ता है अर्थात् आगे की लात (सीधी गिनती)
अ हेव
इ ३ वि
उ ३ वु