भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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१२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

शक्र की--चस्त्र, अन्न, जल. के सुख से युक्‍त, स्त्री में आसक्त. निरन्तर समृद्धियों

223 की--बड़ा शूर वीर, मलिन, आलसी, किला कोट वन वंत में विलास

करे |

(४) ककं के मंगल पर दृष्टि

सूर्य की--पित्त प्रकोप से दुःखी, अत्यन्त धैथंवान्‌, फौजदारी का अधिष्ठाता

(दण्डाधिकारी) निरन्तर बड़े यश वाला ।

चन्द्र की--रोग युक्त, नयी चीज का सोच करने वाला, कुरूप, साधुवृत्त से हीन ।

बुध की--पित्त रहित, थोड़ा कुटुम्ब, पाप का प्रचारक, दुष्ट चित्त ।

गुरु की--राजा का मंत्री, गुण और गौरव युक्त, बड़े मान युक्त, प्रसिद्ध ।

शुक्र की- बुरे कर्मों में धन नाश, सदा बुरे कर्मों का विचार कर्ता ।

शनि की--जलोत्पन्न धान्य से धन की प्राप्ति, श्रेष्ठ क्रांति, राजा से धन प्राप्त ।

(५) सिह के मंगल पर दृष्टि `

सूयं की दृष्टि--अपने प्यारों से प्रीत, शत्रुओं से वेर कत्ता, वन पर्वत कुंजों में

रहने वाला ।

चन्द्र की--पुष्ट स्वरूप, कठिन स्वभाव, माता से नञ्ज, कार्य में चतुर, तीव्र

सुन्दर बुद्धि ।

बुध को--श्रेष्ठ काव्य शिल्पादि कलाओं का ज्ञाता, लोभी, चंचल चित्त, अपने

साधन में चतुर |

गुरु की-श्रेष्ठ बुद्धि, राजा का मित्र, सेना का स्वामी, बहुत मनुष्यों के मनोरथ

पूर्ण करने वाला, विद्या में प्रवीण ।

जोती शुक्र पता की--अभिमान चनि धित से । ऊंचा, अत्यन्त सुन्दर, रों सुन्दर, शोभायमान देह, अनेक स्त्रियों का

शनि की--पराये घर वास, अत्यन्त चिन्ता, बूढ़ों के समान रूप, धन हीन । (६) गुरु स्थानी (९-१२ राशि कें) मंगल पर दृष्टि सुर्य की--वन पर्वत किला कोट में वास, क्रूर स्वभाव, मनुष्यों में पूजित । क्त बल की--पंडितों की विधि का ज्ञाता, राजा को नहीं मानने वाला, लड़ाई

बुध की- चतुर, शिल्प विद्या में भो न क के. द्या में निपुण, श्रेष्ठ शील, सव विद्याओं में चतुर,

सम 'गुरु मा की--स्त्री की अत्यन्त त्यन्त चिन्ता करने वाला, शत्रुओं से सदा लडाई करने वाला

शुक्र की--उदार चित्त, विषयों में आसक्त अनेक प्रकार के गहने, भाग्यवान्‌ । | शनि कोते काति हीन, अनेक स्थानों मं मण, बी, पराये कायं मेतत्पर ।