सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
१२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
शक्र की--चस्त्र, अन्न, जल. के सुख से युक्त, स्त्री में आसक्त. निरन्तर समृद्धियों
223 की--बड़ा शूर वीर, मलिन, आलसी, किला कोट वन वंत में विलास
करे |
(४) ककं के मंगल पर दृष्टि
सूर्य की--पित्त प्रकोप से दुःखी, अत्यन्त धैथंवान्, फौजदारी का अधिष्ठाता
(दण्डाधिकारी) निरन्तर बड़े यश वाला ।
चन्द्र की--रोग युक्त, नयी चीज का सोच करने वाला, कुरूप, साधुवृत्त से हीन ।
बुध की--पित्त रहित, थोड़ा कुटुम्ब, पाप का प्रचारक, दुष्ट चित्त ।
गुरु की--राजा का मंत्री, गुण और गौरव युक्त, बड़े मान युक्त, प्रसिद्ध ।
शुक्र की- बुरे कर्मों में धन नाश, सदा बुरे कर्मों का विचार कर्ता ।
शनि की--जलोत्पन्न धान्य से धन की प्राप्ति, श्रेष्ठ क्रांति, राजा से धन प्राप्त ।
(५) सिह के मंगल पर दृष्टि `
सूयं की दृष्टि--अपने प्यारों से प्रीत, शत्रुओं से वेर कत्ता, वन पर्वत कुंजों में
रहने वाला ।
चन्द्र की--पुष्ट स्वरूप, कठिन स्वभाव, माता से नञ्ज, कार्य में चतुर, तीव्र
सुन्दर बुद्धि ।
बुध को--श्रेष्ठ काव्य शिल्पादि कलाओं का ज्ञाता, लोभी, चंचल चित्त, अपने
साधन में चतुर |
गुरु की-श्रेष्ठ बुद्धि, राजा का मित्र, सेना का स्वामी, बहुत मनुष्यों के मनोरथ
पूर्ण करने वाला, विद्या में प्रवीण ।
जोती शुक्र पता की--अभिमान चनि धित से । ऊंचा, अत्यन्त सुन्दर, रों सुन्दर, शोभायमान देह, अनेक स्त्रियों का
शनि की--पराये घर वास, अत्यन्त चिन्ता, बूढ़ों के समान रूप, धन हीन । (६) गुरु स्थानी (९-१२ राशि कें) मंगल पर दृष्टि सुर्य की--वन पर्वत किला कोट में वास, क्रूर स्वभाव, मनुष्यों में पूजित । क्त बल की--पंडितों की विधि का ज्ञाता, राजा को नहीं मानने वाला, लड़ाई
बुध की- चतुर, शिल्प विद्या में भो न क के. द्या में निपुण, श्रेष्ठ शील, सव विद्याओं में चतुर,
सम 'गुरु मा की--स्त्री की अत्यन्त त्यन्त चिन्ता करने वाला, शत्रुओं से सदा लडाई करने वाला
शुक्र की--उदार चित्त, विषयों में आसक्त अनेक प्रकार के गहने, भाग्यवान् । | शनि कोते काति हीन, अनेक स्थानों मं मण, बी, पराये कायं मेतत्पर ।
ग्रहों की दृष्टि का फल : १३
(७) शनि स्थानी (१०-११ राशि के) मंगल पर दृष्टि
सूर्य की--स्त्री-पुत्र, धन के सुखयुक्त, तरुण स्वरूप, तीक्ष्ण, निरन्तर बड़ा शूरवीर
चन्द्र की--श्रेष्ठ आभूषण युक्त, माता के सुख से हीन, स्थान भ्रष्ट, चंचळ
मित्रता, उदार चित्त ।
वुध की--प्रिय वाणी, भ्रमण करने में धन प्राप्त,यत्नयुक्त, जुआ से युक्त निर्भय ।
गुरु कौ--बड़ी आयु, राज कृपा युक्त, गुण युक्त, भाइयों को प्यारा, सुन्दर देहू की कांति, कार्य में बहुत बोलने वाला ।
शुक्र की--श्रेष्ठ भोग, सौभाग्य, सुख युवत, स्त्रियों का प्यारा, कलह प्रिया
शनि की- राजा के धन को प्राप्त करने वाला, स्त्री के साथ वेर, बहुश्रुत, बड़ी
बुद्धि वाला, कपट युक्त, संग्राम प्रिय ।
मङ्गल पर पाप ग्रह की दृष्टि--क्षेत्र, धन-धान्य आदि का नाश ।
मङ्गल पर शत्रु ग्रह की दृष्टि--बन्धन, रोग, युद्ध तथा दुर देश में निवास ।
मङ्गल पर शुभ ग्रह की दृष्टि--विजय, देश और क्षेत्र का लाभ तथा मित्रो से
शुभ ।
मङ्गल पर मित्र ग्रह की दृष्टि- धन की वृद्धि हो ।
४--बुध पर दृष्टि का फल
(१) मंगल स्थानी (१-८ राशि के) बुघ पर दृष्ट
सूर्य की दृष्टि-- भाइयों का प्यारा, सत्यवक्ता, विलासयुक्त, राजा, श्रेष्ठ गौरव
युक्त ।
` चन्द्रकी दृष्टि--श्रेष्ठ, गीत नृत्यादि में प्रीत, काम सहित, स्त्री में प्रीत, वाहन
और नौकरयुक्त, चुगल ।
मंगल की दृष्टि---राजा का प्यारा, बहुत धन वाला, शूरवीर, चतुर, लड़ाई में
उद्यत, क्षुधायुक्त ।
गुरु की दुष्टि-सुखयुवत, चतुर श्रेष्ठ वाणी, स्त्री पुत्रादियुक्त, प्रसन्न चित्त ।
शुक्र की दृष्टिस्त्रियों के साथ विलासी, गुण और गोरवयुक्त, स्त्रियों का प्यारा
सुन्दर बुद्धि, नम्रता सहित ।
शनि की दृष्टि- श्रेष्ठ साहस वाला, कूर स्वभाव, कुल में कलटयुक्त, प्रीत और
श्रेष्ठ वृत्ति से रहित ।
(२) शुक्र स्थानी (२-७ राशि) बुध पर दृष्टि
सूर्य की दृष्टि--दरिद्र और दुःख तथा रोगों से सन्तापित देह वाला, पराया
उपकार करने में निरन्तर तत्पर, शान्त स्वभाव, शुद्ध चित्त ।
चंद्र की-हुत प्रपंची, धनधान्ययुक्त, दृढ़ प्रतिज्ञा, राजा का मंत्री प्रख्यात ।
मंगल की--राजा से अपमानित, रोग से सन्तापित, मित्र और विषयों से रहित ।
4४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
गुरु की--उत्तम देश, ग्राम तथा नगरों का स्वामी, राजा, चुर गुणों का जानने
चाला, गुणवान्, शीलवान् । हा है
शुक्र की--अति सुन्दर वेष, वस्त्राभूषणयुक््त, स्त्रियों को कामदेव और काम से
बड़े हर्ष को प्राप्त, अत्यन्त चतुर, उदार, श्रे ष्ठ भाग्य ।
शनि की- -म्म्री, पुत्र, मित्र और वाइन से दुःख, सन्तप्त चित्त, सुख और धन से
हीन । १
(३) स्वक्षेत्री बुघ पर दृष्टि का फल ,
सूर्य की--सत्ययुक्त, सुन्दर लीला का विलास करने वाला, राजा से मान और
उन्नति को प्राप्त, चंचलता रहित ।
चंद्र की--वहुत बोलने वाला, मिष्ठभाषी, लड़ाई जिसे प्यारी हो, राजा के पास
रहने वाला ।
मंगल की-प्रसन्नदेह, चुगलखोर, कलाओं का ज्ञाता, राजा के कृत्य में निरन्तर
प्रवीण, मनुष्यों का प्यारा ।
गुरु की-धनयुक्त, सामथ्यं सहित, श्रेष्ठ, राजा के मान से अधिकार को प्राप्त,
बहुश्रुत ।
bs की-राजा का दूत, बैरियों को जीतने वाला, दोनों की सन्धि कराने में चतुर
वेशया में आसक्त, मन की अभिलाषा को प्राप्त ।
शनि की-प्रारम्भ किये कार्यं को सिद्ध करने वाला, नम्रता रहित, श्रेष्ठ वस्त्र
और आभूषण आदि समुद्धियों सहित । (४) ककं के वृध पर दृष्टि
सूर्यं की-स्श्री के निमित्त से पूर्ण पीड़ा, धन का व्यय, अतिदुर्वेल देह, बहुत उत्पातों
सहित ।
चंद्र की--वस्त्र!दियों की शुद्धि और मणियों का संग्रह करने वाला, घर आदिं
स्थान बनाने में चतुर, फूलों की माला गूंथने में चतुर ।
मंगल की--थोड़ा शास्त्र का ज्ञाता, अर्थ में तत्पर, शूरवीर, प्यारी वोली, झूठ
बात करने में चतुर ।
गुरु की--चतुर, विद्या का जानने वाला, भाग्यवान्, श्रेष्ठ वाणी ।
शुक्र को--प्योरी वाणी, सुन्दर शरीर, श्रेष्ठ गीत, बाजो की विधि में चतुर ।
शनि को--गृणहीन, अपने मित्र तथा भाई बन्धु रहित, झूठ बोले, दंभ में तत्पर, कृतध्न ।
(५) सिंह के बुघ पर दृष्टि
सूर्य की- कृपा रहित, चंचळ स्वभाव, ईर्षालु, हिसा में तत्पर, क्र, क्षुद्र । चंद्र की--ह्पवान् सुन्दर वुद्धि, नञ्ज, गीत और नृत्य में तत्पर, श्रेष्ठ वृत्ति । मा मंगल की--कामदेव ओर पराक्रम रहित, वृत्तिहीन, बत्ति घावों से अंकित, अं वुद्धिहीन,
ग्रहों की दृष्टि का फल : १५
गुरू--कोमल, निर्मल रुचि, कुल में श्रेष्ठ, सुन्दर नेत्र, सामर्थ्यवान्, उत्तम वाहन,
घनदान् ।
शुक्र--श्रे ष्ठ रूप, मिष्ठ वाणी, विलासी, राजा का आश्रित वाहन और घनयुक्त ।
शनि--देह में पसीने की दुर्गन्ध, वड्डी देह, कुरूप, उग्र, सुखहीन ।
(६) गुरु क्षेत्री बुध पर दृष्टि
सूर्यं की--शूल, पथरी और प्रमेह रोग, मन की तरंग से रहित, शान्ति को प्राप्त ।
चन्द्र की--लेखन कला में चडुर, श्रेष्ठ संगीत वाला, साधु और मित्रों का संग,
सुखी ।
मंगल की- खानदानी चोर, वन में वास, उसका नाम राज्य में लिखा जाता है
धन-अन्न से रहित ।
गुरु की- ज्ञानवान्, अपने कुल में शिरोमणि, राजा के खजाने में गिनने वाला,
बहुत जनों का स्वामी ।
शुक्र की--राजा का मंत्री, लेख के अधिकार को प्राप्त, चोरों में आसक्त, दुष्ट
स्त्रीयुत, धनवान् ।
शनि की--बहुत अन्न खाने वाला, मलिन, दुष्ट वृत्ति, वन पर्वत में वास, काम के
लायक नहीं ।
(७) शनि क्षेत्री बुध पर दृष्टि
रवि की--अपने प्रारब्ध से प्रताप सहित, श्रेष्ठ मल्ल विद्या में कुशल, दुष्ट
शक्ति, कुटुम्बी ।
चंद्र की--जल सम्बन्धी कार्य से आजीविका,धनवान्, डरपोक, फूल और कन्द के
उद्यम करने वाला।
मंगल की लज्जा - और आलस्ययुक्त, बड़े स्वभाव वाल!, सौम्य मूर्ति, सुखी,
चपल वाणी, धनवान् ।
गुरु की--अन्न और वाहन तथा धनयुक्त,सुखी, ग्राम और नगर का स्वामी, बड़ा
“बुद्धिमान् ।
शुक्र की--वहुत सन्तान, कुरूप, चतुरता रहित, नीचजनों सा साथी, अति कामी ।
शनि की--सुख रहित, पाप में तत्पर, दीन धन रहिंपर,हीनजनों का संग ।
बुध पर पाप दृष्टि-बड़ा दुःख, शूल रोग ।
शत्रु दृष्टि--अतिसार रोग, दुर्बुडि, विपरीत कर्म करने में उद्यत होता है ।
शुभ दृष्टि--लेखक विद्वान् तथा चतुर ।
मित्र दृष्टि--आभूषण, धन,रेशमी वस्त्र तथा रत्नों का लाभ ।
५--शुरु पर दुप्टि का फल
(१) भौम क्षेत्रो गुरु पर दुष्टि
सूर्य की दृष्टि--असत्य से डरने वाला, बहुत धमं करने वाला, विख्यात, श्रेष्ठ
भाग्य युक्त, नम्र ।
१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
चन्द्र की--प्रसिद्ध नम्र, स्त्री का प्यारा, श्रेष्ठ पुरुषों की सलाह लेने वाला, धर्म
में तत्पर, शान्त स्वभाव ।
मंगल की- क्रूर, बड़ा धूर्त, दूसरे के अभिमान को नष्ट करने वाला, राजः के
आश्रय से आजीविका, बहुत मनुष्यों का स्वामी ।
बुध की--श्रेष्ठ वृत्ति और सत्य उत्तम बाणी से रहित, दूसरे का छिद्र देखने
वाला, नञ्ज, मनुष्यों का स्वामी, धूर्त ।
शुक्र की--गन्ध माला शैया, भोजन भूषण, स्त्री वस्त्र, स्थान इन सबसे सौख्य को
पाता है ।
शनि की--लोभी, क्रूर, हठी; मित्र ओर सन्तान के सुख रहित और सलाह करने
में कठोर । (२) बुध क्षेत्री गुरु पर दृष्टि सूर्य की-युद्ध में जय प्राप्त, भाव सहित, शरीर में रोग, वहुत वाहन और सेवक
युक्त राजा का मंत्री ।
चन्द्र की-सत्य युक्त, नम्रता युक्त; परोपकारी; श्रेष्ठ चित्त, श्रेष्ठ भाग्य वाळा ।
मंगल की--भाग्य युक्त, पुत्र सौख्य को प्राप्त, मिष्ठ भाषी, राजा से मान प्राप्त,
सदाचार युक्त ।
बुध की--श्रेष्ठ मन्त्र और विद्या में तत्पर, निरन्तर भाग्य सहित, राजा से धन
प्राप्त, सुन्दर कलाओं का ज्ञाता ।
शुक्र की--धन और भूषण सहित, श्रेष्ठ वृत्ति में चित्त, ऐश्वयंवान् ।
शनि की--श्रे ष्ठ पुत्र, श्रेष्ठ स्त्रियों के सुख युक्त, नगर और ग्राम में उत्सव युक्त
चतुर। (३) बुध क्षेत्री गुरु पर दृष्टि
सुर्य दृष्टि- श्रेष्ठ पुत्र,स्त्री, धन तथा गित्र सौख्य युक्त, श्रेष्ठ प्रतिष्ठा को प्राप्त.
शोभायमान । i
न चन्द्र की--गुणी, ग्राम ओर नगरों में उपकार करने करने वाला, वहुत गौरवसे
बा पत र घाव युक्त देह, धन पराक्रम युक्त ।
य बुध की--श्रेष्ठ बानी ओर स्त्री पुत्र धन सोख्य युक्त, चतुर, ज्योतिषी , शिल्प शास्त्र
व्य शुक्र की--धन, स्त्री पुत्रों के सुख से युक्त; युक्त, मकान वावली ली और खेती के काम में में
शनि की--राजा से श्रेष्ठ गौरव प्राप्त, नित्य उत्स ऐं से पर्ण
तथा ग्रामों का स्वामी । अ प
(४) ककं के गुरु पर दृष्टि
सूर्य की दुष्टि- स्त्री पुत्र घन के उत्पन्न सौख्य को पहिले नाश करता है और
ग्रहों की दृष्टि का फल : १७
पिछली अवस्था में पूर्वोक्त पदार्यो का सोख्य होता है ।
चन्द्र की--राजा के खजाने का स्वामी, श्रेष्ठ कांति, धन के सुख युक्त, श्रेष्ठ
वृत्ति में चित्त ।
मंगल की--वालक स्त्री तथा सुन्दर वस्त्र भूषणों से युक्त, गुणवान्, शूरवीर,
ब्रण रोग ।
बुध की--मित्रों के आश्रय से सव सिद्ियाँ प्राप्त, श्रेष्ठ वृत्ति, श्रेष्ठ बुद्धि, श्रेष्ठ
प्रताप, राजा का मन्त्री ।
शुक्र की--मित्रो के वैभव को भोगने वाला, स्त्रियों से अनेक सौख्य को प्राप्त ।
शनि की--सम्मान और भूषण तथा गुणों से युक्त, श्रेष्ठ शील, सेना नगर या
ग्राम को स्वामी, बहुत बोलने वाला ।
(५) सिह के गुरु पर दृष्टि
सूये की--खर्च करने वाळा, प्रसिद्ध, बडा धूर्ते, राजा से धन लाभ, श्रेष्ठ
कमें में चित्त ।
चन्द्र की--प्रसन्न मूर्ति, चित्त की शुद्धि से हीन, स्त्री के कारण से धन लाभ ।
मंगल की--बड़े मान और गौरव युक्त, श्रे ष्ठ कर्म के निर्माण करने में चतुर ।
बुध की--भकान आदि वनवाने के कॉम में चतुर, गुणों में अग्रणी, राजा का
मन्त्री, वाणी विलास में चतुर ।
शुक्र की-- राजा से बड़ा पद प्राप्त, स्त्रियों से प्रीति करने वाला, गुणों का
जानने वाला ।
शनि की-सुख से हीन, मलिन, श्रेष्ठ वाणी, दुर्बेल देह, उत्सव रहित ।
(६) स्वक्षेत्री गुरु पर दृष्टि
सूर्य की दृष्टि--राजा के विरुद्ध, मित्रों से अत्यन्त बैर करने वाला, जिसके
सदा वैरी रहें । :
चन्द्र की--भाग्य और धन वृद्धि से अभिमान, स्त्री का प्यारा, सुख युक्त,
नम्रता रहित ।
मंगल की--फोड़े से अंकित, युद्ध में चतुर, हिंसक, क्रूर स्वभाव, परोपकारी ।
बुध की--राजा के आश्रय से बड़ा अधिकार प्राप्त, स्त्री, धन ऐश्वर्य सुख से
युक्त, पराये उपकार करने में एक चित्त ।
शुक्र की--सुख युक्त, धन युक्त, प्रसन्न, चतुर, सदा ऐश्वयं युक्त ।
शनि की--अधिकार से पतित, सुख और पुत्रों से रहित, युद्ध में पराजय ।
(७) शनि क्षेत्री गुरु पर दृष्टि
सूर्य की--प्रसन्न, कांतिमान्, श्रेष्ठ वाणी, पराया उपकार आदर से करने
वाला, राजा के कुल में उत्पन्न ।
चन्द्र की--कुल को धारण करने वाला, तीव्र बुद्धि, शीळवान्, धर्म क्रया में
उदार, अभिमानी, माता-पिता का भक्त ।
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१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
मंगळ को-- राज कृपा से धन की सिद्धि और सुख को प्राप्त करने वाला । बध की--शांत स्वरूप, निरन्तर स्त्री के वशीभूत, धमं क्रिया में निरन्तर तत्पर ! शुक्र की--विद्या विवेक, धन गुण युक्त, राजा से मन की अभिलाषा को प्राप्त । शनि को--कामना को प्राप्त, श्रेष्ठ गुणों से युक्त, घर और अर्थ की प्राप्ति, धनधान्य युक्त, नम्रता सहित ।
(८) गुरु पर पाप दुष्टिबुद्धि का पराजय तथा क्षेत्र आदि से वियोग :
गुरु पर शत्रु दृष्टि - कुष्ठ रोग, त्वचा में दोष कलह तथा युद्ध ।
गुरु पर मित्र दृष्टि--जय,. धन का लाभ, स्त्री क्षेत्र आदि का संग्रह ।
गुरु पर शुभ दृष्टि--धर्म के कार्यो में उद्यम करता है और सुखी होता है ।
(९) नवम स्थान में गुरु हो तो उस पर दृष्टि का विचार
सूये से दृष्ट--मन्त्री, राजतुल्य होता है । म सुय चन्द्र से--बहुत आयु वाला और निन्दित पद से युक्त । बली सूर्य चन्द्र दोनों से दृष्ट--विख्यात, राज तुल्य, पंडित, बहुत स्त्रियों से युक्त और समृद्ध, साहसी, घनी । सूर्य बुध दोनों से--सुन्दर ऐश्वर्य, मनोहर, धन, स्त्री और भूषण से युक्त, काव्य कला का ज्ञाता ।
सूर्य शुक्र दोनों से --सामवेद का जानने वाला, उत्सव कर्ता और गो महिषी, बकरी, गधा इनसे युक्त, साहसी । सुर्य शनि दोनों से दृष्ट--कोष पति और संग्रह कर्ता, चतुर विख्यात और गुणी तथा देश गुरु और श्रेणी नायक होता है । चन्द्र से दृष्ट- प्रिया कांता का भोगने वाला । चन्द्र या मंगल से दृष्ट-सेनाचायं और सौख्य युक्त, सुन्दर ऐश्वर्य युक्त या मंत्री । चन्द्र बुध से दृष्ट--गृह शयन अन्नादि का भोगने वाला, तेजस्वी, क्षमाशील और वृद्धिमान् ।
चन्द्र शुक्र से दृष्ट--कमंयुक्त, शुभाचार, शूरवीर, सम्पन्न और परिवार युक्त । मंगल से दृष्ट--धनवान् ।
मंगल बुध से दृष्ट--तेजस्वी, सत्ययुक्त, सेवा कम में तत्पर, चतुर बुद्धि । मंगल शुक्र से दृष्ट--धनवान्, चतुर बृद्धि, विद्वान्, सत्यभाषी, विदेशगामी । संगल शनि से दृष्ट--नीच, विदेशगामी, चाकरी वाला, निन्दक, चुगल, ठग । बुध शुक्र से दृष्ट--कारीगरी का जानने वाळा, सुन्दर भाग्य, विद्वान्, अच्छा भेष का धारण करने वाला, शीलवान्, आज्ञा पालक, गौ वाहून धन से युक्त । बुध शनि से दृष्ट- सुन्दर ऐश्वयं, मनोहर, विद्वान्, वक्ता, शूरवार, सुखी, विनय सम्पन्न ।
शुक्र शनि से दृष्ट--देश भक्त, धनी ।
ग्रहों की दृष्टि का फल 3 १९
शनि से दृष्ट--भॅसा तथा वृक्ष से युक्त धनवान् होता है ।
द्वादशेश से दृष्ट--विवाद कर्ता और प्रिय वोल्ने वाला ।
सब ग्रहों से दृष्ट--समुद्ध, धर्मात्मा, तेजस्वी, रूपवान्, गुणवान् ।
६ शुक्र पर दुष्टि का फल
(१) मंगल क्षेत्री शुक्र पर दृष्टि का फल
सूर्य को=विशेष करके राजा की निरंतर कृपा वाला, स्त्री के कपट से अत्यंत दुःखी ॥
चन्द्र की- श्रेष्ठ प्रतिष्ठा वाला, चंचल चित्त वृत्ति, कामातुरता का विकार ।
मंगल की--धनवान्, सुख से रहित, विशेष दीन और मलिन ।
बुध की--खोटा धन तथा संम्बन्धियों से रहित, अपनी वृद्धि और सामथ्य से
रहित क्रूर, पराये धन को हरण हरने वाला ।
गुरु की--स्त्री पुत्रादिकों के सुख से रहित, श्रेष्ठ देह, शोभायमान, नम्रता युक्त,
उदार चित्त ।
शनि की--गुप्त धन, शांत स्वभाव, माननीय, श्रेष्ठ, अपने जनों की सम्पत्ति सहित
(२) स्वक्षेत्री शुक्र पर दृष्टि
सूयं की- श्रेष्ठ स्त्रियों के धन वाहनों से निश्चय शुभ लाभ ।
चन्द्र की--वेश्याओं में विलास, अपने कुछ का पालक, निर्मल बुद्धि, सुशील, श्रे ष्ठ
चाणी के बिलास में चतुर ।
मंगल की--ग्रह और सौख्य से रहित, लड़ाई में अपमान को प्राप्त ।
बुध की--गुणवान्, श्रेष्ठ भाग्य, काम सहित, सौम्य स्वभाव, बळवान,धेर्यं सहित ।
गुरु की--अष्ठ वाहन और स्त्री, गुण श्रेष्ठ, मित्र-पुत्र धनादि संपूर्ण वस्तुओं
का लाभ ।
शनि की--रोगी, साधुवृत्त से हीन, सौख्य और धन से हीन ।
(३) बुध क्षेत्री शुक्र पर दृष्टि
सूर्यं की--राजा के रनवास का डथोढ़ीवान्, नम्र, गुण युक्त, शास्त्र जानने वाला ।
चन्द्र की- श्रेष्ठ अन्न, वस्त्रादि सुख युक्त, नील कमल के समान श्याम, सु दर
नेत्र, सुन्दर बाल ।
मंगल की--भाग्ययुक्त, कामकला में चतुर, स्त्री के निमित्त धन क। व्यय करने
वाला, कामी ।
बुध की--चतुर, वाहन और धन की वृद्धि वाला, सेना का स्वामी, परिवार के
सौख्य से युक्त, बुद्धिमान् ।
गुरु की--श्रेष्ठ वुद्धि, वृद्ध सहित, बहुत वैभव युक्त, प्रसन्न चित्त निरन्तर नम्र ।
शनि की--अपमान युक्त, चपल स्वभाव, दुःख सहित, मनुष्यों से त्यक्त ।
(४) कर्के के शुक्र पर दृष्टि का फल
सूर्य की--कोधी, हषं का नाश, बैरियो से पीड़ित ।
*२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
चन्द्र की--पहिले कन्या, पीछे पुत्र उत्पन्न हो । माता ओर विमाता का मान
करने वाला । मंगल की--कलाओं में चतुर, शत्रुनाशक, वृद्धि से सौख्य युक्त, स्त्री चिन्ता ।
बुध कौ-विद्या में प्रवीण, गुणवान्, स्त्री-पुत्रों से अत्यन्त संतापित, मनुष्यों से त्यक्त । गुरु की- अत्यन्त चतुर, उदार, सुन्दर मूर्ति, नम्रता युक्त, मति और वैभव
युक्त, स्त्री-पुत्रो के सौख्य युक्त, प्यारी वाणी ।
शनि की--श्रेष्ठ वृत्ति और सौख्य रहित, धन हीन, व्यर्थं परिश्रम करने वाला,
स्त्री से जीता गया, स्थान से पतित ।
(५) सिंह के शुक्र पर दृष्टि का फल
सूर्य की--स्पर्धा से चित्त वृत्ति को बढ़ाने वाला, स्त्री के आश्रय से धन का लाभ
या अंट, गधा, घोडों से धन लाभ ।
चन्द्र को--माता दो होवें, स्त्री से विरोध करने वाला, ऐश्वर्य सहित । मंगल की--राजा का प्यारा, अन्न धन युक्त, काम कला के व्यसनों से युक्त । बुध कौ--धन सहित, संग्रह करने में चित्त को वृत्ति, लोभी, कामदेव की अधिकता से बुरे विचारों को प्राप्त ।
गुरु की-राजा का मन्त्री, घन-वाहन युक्त, बहुत स्त्री पुत्र सेवकों के सौख्य वाला । शनि की-राजा के समान सम्पूर्ण समृद्धियों का भागी । फौजदारी के मुकदमे का आफीसर (दंडाधिकारी) ।
(६) गुरु क्षेत्री शुक्र पर दृष्टि
सूर्य की कूर, चतुर, भाग्य और सौभाग्य का भागी, वल सहित, विशेष धनवान अनेक देशों की यात्रा । 6 चन्द्र की--श्रेष्; राजमान्य, प्रसिद्ध, नम्र, बहुत भोग युक्त,धीर, वलवान । मंगल की--वैरियों को नहीं संहारने वाला, धनवान, प्रसन्न, स्त्री कृत प्रेम से युक्त, श्रेष्ठ, पुण्यवान्, श्र ष्ठ वाहनों से युक्त । बुध की--श्रोष्ठ वाहन धन वस्त्र आभूषण का लाभ, श्रेष्ठ अन्नों के सुख सहित । गुरु की--घोड़ा, सोना, वस्त्र, आभूषण, बड़े हाथी व स्त्रियों के सुख से युक्त । शनि की-श्रेष्ठ भोग, उत्तम सौख्य और कर्मों का भागी,नित्य उत्सव सहित धनी । (७) शनि क्षेत्रीय शुक्र पर दृष्टि
सूर्य को--स्थिर स्वभाव,वैभव युक्त, मणि युक्त, धन सहित, वल से विराजमान । चन्द्र कौ--यशस्वी, सुन्दर शरीर, बड़ा बलवान्, धन और वाहन युक्त । मग्र क रोग से अत्यन्त तप्त स्वरूप, अनर्थ से धन नाश । वुध की--पंडितों की विधि को जानने वाला, धनी, संतुष्ट ; प्रचण्ड, श्रेष्ठ वाणी का विलास करने वाला । य अहा गुरु की-श्रेष्ठ गन्ध और माला वस्त्र सुन्दर वाजे सहित, संगीत विद्या का ज्ञाता ।
ग्रहों की दृष्टि का फल : २१ |
शनि कौ--प्रसन्न देह, अनेक वस्तु लाभ करने वाला, धन वाहन स्त्री और पुत्रों के
सौख्य से युक्त ।
शुक्र पर पाप दृष्टि फल--पराजय, स्त्रोवियोग धन, नाश ।
शुक्र पर शत्रु दृष्टि फल-मूत्रक्ृच्छ् आदि बड़े रोग होते है ।
शुक्र पर शुभ दृष्टि फल-स्त्री का लाभ, सुख, आभूषण तथा धनं का लाभ ।
शुक्र पर मित्र दृष्टि फल-पट्ट वन्ध तथा देश लाभ आदि हो ।
शनि पर भिन्न ग्रहों कीं दृष्टि
(१) मंगलक्षेत्री शनि पर दृष्टि
सूर्यं की-भैस, गाय, बकरी भेंड की समृद्धि वाला, खेती के काम में सदा सत्पर ।
चन्द्र की-नीच संगति वाला, चपल, दुष्ट शील, खल, दुःखी भौर धन रहित ।
मंगल की-प्रहुत बोलने वाला, सम्पदा रहित, कार्यनाशक, धनहीन।
बुध की-चोरी करने वाला, कलह में तत्पर, स्त्री और उत्सव रहित ।
गुरु की-सुखी, धनयुक्त, राजा ग मन्त्री, राजां के आश्रय से मुख्यता को प्राप्त ।
शुक्र की-बहुत यात्रा करने वाळा, कांतिहीन, पापिनी स्त्री में आसक्ति से दुःखी ।
(२) शुङ्ग क्षेत्री शनि पर दृष्टि
सूर्य की दृष्टि-विद्या के विचार में अधिक, बड़ा चक्ता, परायो अन्न खाने वाला,
धनहींन, शान्त ।
चन्द्र की-राजा की कृपा से वड़े अधिकार को प्राप्त, स्त्री भूषण तथा वस्त्र
सोख्य को प्राप्त, बलवान ।
मंगल की-युद्ध के हाम में तत्पर, निरन्तर बहुत बोलने वाला, बड़ी कृपा वाळा।
बुध की-स्त्री में तत्पर, नीच पुरुषों का संग, विनोद ओर हास्य में तत्पर, धनहीन;
हिजड़ों से मित्रता 1
गुरु की-पराये उपकार में चित्त, दूसरों के दु:ख से दुःखी, दाता और उद्योगी ।
शुक्र की-रत्न आदि पदार्थो क! लाभ, स्त्री के बिलास में तत्पर, पानी की
अधिकता वाला, राजा से गौरव प्राप्त ।
(३) बुधक्षेत्री शनि पर दृष्टि
सूर्य की-सुख रहित, नीचों में तत्पर, क्रोधी, अधर्मी, वैर करने वाला, धर्मवान् ।
चन्द्र की-प्रसन्न मृति, राजा की कृपा से अधिकार क्रो प्राप्त, ऊँचे कार्यों में
प्रबृत्ति करने वाला, स्त्रियों के अधिकार को प्राप्त ।
मंगल को-बड़ा डुद्धिमान्, निरन्तर विधि को जानने वाला, प्रसिद्ध, गंभीर।
बुध की-धन युक्त, सुन्दर बुद्धि, नम्रता सहित, गीत प्रिय, संग्राम के कार्य में
चतुर, शिल्प का ज्ञाता ।
गुरु की-राजा का आश्रय करने वाला, सुन्दर गुणों से युक्त सत्पुरुषो का प्यारा,
गुप्त धनवान् ।
२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
शुक्र की-स्त्री के आभूषण बनाने में चतुर, श्रेष्ठ कमं और धर्म में निरन्तर
तत्पर, स्त्रियों में आसक्त चित्त ।
(४) ककं के शनि पर दृष्टि
सूर्य की-आनन्द स्त्री और धन से हीन, अन्न भोग से हीन,माता को क्लेशदायक ।
चन्द्र की-बन्धु जनों तथा माता को दुःख देने वाला, धन की वृद्धि सहित ।
मंगल की-वल से हीन, क्षीण देह, राजा के दिये धन से वैभव ।
बुध की-वाग्विलांस में कठिन, भ्रमण करने में बुद्धि, मनोवांछित फल प्राप्त,
पाखंड करने में चतुर ।
गुरु की-धरती, पुत्र घर स्त्री, धन, रत्न, वाहन, आभूषण से युक्त । उ
शुक्र की-उदार, गौरव युक्त, सुन्दर यान युक्त, सोन्दयं तथा निर्मल वाणी
विलास से हीन ।
(५) सिह के शनि पर दृष्टि
सूर्य की-धन, अन्न, वाहन से श्रेष्ठ वृत्ति से सत्य और उत्तम चरित्र से हीन ।
चन्द्र की-श्रेष्ठ रत्न, आभूषण, वस्त्र, सुन्दर यश, स्त्री, मित्र, पुत्रादिकों के सुख
में पूर्ण प्रसन्न चित्त ।
मंगल की-संग्राम कर्म में अत्यन्त निपुण, करुणाहीन, क्रूर स्वभाव । बुध की-धन, स्त्री, पुत्र के सुख से हीन, दीनता युक्त, नीच व्यसनों से युक्त । गुरु की-भ ८्ठ मित्र, पुत्रादि युक्त, गुणों सहित, प्रसिद्ध, श्रेष्ठ वृत्ति वाला $
निरन्तर नम्रता सहित, पुर और ग्राम का स्वामी ।
शुक्र की-धन, अन्न और वाहन से युक्त, स्त्री से संताप को प्राप्त ।
(६) गुरुक्षेत्री शनि पर दृष्टि का फल
सूर्य की-प्रसिद्धि, धन एवं गौरव को प्राप्त करने वाला, पराये पुत्र में प्रीति । चन्द्र की-श्रेष्ठ वृत्ति, माता रहित, अन्य नामों से शोभित, धन, पुत्र, स्त्री के सुख भोगने वाला ।
मंगल की-बातरोगी, मनुष्यो के विपरीत चलनेवोला, परदेशवासी । बुध की-श्रेष्ठ गुणों से युक्त, धनवान्, कामी, राजा से वड़े अधिकार को प्राप्त, सदाचार युक्त ।
गुरु की-मंत्री या सेनापति, सव कार्यों को करने वाला, बलवान् सुशील । शुक्र की-परदेश वासी, बहुत कार्यों में आसक्त, दो माता, निरन्तर पवित्र । (७) स्वक्षेत्री शनि पर दृष्टि का फल सूर्य की-बुरे रूप वाली स्त्री का पति, पराया अन्न खाने वाला, अनेक प्रयास सहित, रोगयुक्त, परदेश वासी ।
चन्द्र की-धन ओर स्त्री युक्त, दुःख से उत्पन्न हुआ, चपल स्वभाव, माता के विरुद्ध रहे, कामातुर ।
ग्रहों की दृष्टि का फल : २३
मंगल की-शूरवीर, क्रूर, अच्छे गुणों से युक्त, सवंजनों में उत्कृष्ट, सदा प्रसन्न
चित्त, प्रसिद्ध ।
बुध की-श्रेष्ठ वाहन युक्त, उत्साह युक्त, वलवान्, अनेक कार्यों में आसक्त ।
गुरु की-गुण युक्त, राजा का मन्त्री, रोग रहित, सुन्दर शरीर ।
शुक्र की-कामातुर, नियम रहित, भाग्य सहित, सुखवान्, धनवान्, भोग भोगने
वाला, लक्ष्मी का स्वामी ।
शनि पर पाप दृष्टि-वगल में रोग, बन्धन तथा क्षय हो।
शनि पर शत्रु दृष्टि-शत्रु वाधा, पराभव तथा रोग ।
शनि पर शुभ दृष्टि-रोग रहित ।
शनि पर मित्र दुष्टि-बांधवों से संगम होता है ।
दुष्टि का अन्य बिचार |
राहु दृष्टि से पाप नाश-छग्न या लग्न से ३-६-११ इन स्थानों को राहु देखता
हो तो उसके पाप का नाश होता है ( प्रा. यो. ) ।
चन्द्र की बुरी दृष्टि-लग्न पर चन्द्र की दृष्टि बुरी होती है । परन्तु कक लग्न
से उस पर चन्द्र हो तो फल अच्छा होता है ( प्रा. यो. ) ।
चन्द्र पर दृष्टि-दिन का जन्म हो चन्द्र दृश्य भाग में हो उसे ग्रह देखता हो तो
अशुभ फल ।
दिन का जन्म हो चंद्र अदृश्य भाग में हो उसे ग्रह देखता हो तो शुभ फल ।
रात का जन्म हो चंद्र दृश्य चक्र में हो तो शुभ फल ( प्रा. यो. ) ।
भाव या ग्रह सव ग्रहों से दृष्ट-जो भाव या ग्रह समस्त ग्रहों से दृष्ट हो वह
भाव ग्रह शुभ फल देने में समर्थ होता है ।
लग्न या चंद्र पर सब ग्रहों की दृष्टि-यदि जन्म में लग्न या चंद्र सब ग्रहों से
दृष्ट हो तो राज्य देने वाले होते हैं ।
लग्न सबसे दृष्ट-छग्न को सब ग्रह देखें तो वह कुल में श्रेष्ठ राजा होता है शत्रु
हन्ता, विलासयुक्त, सुखी, भाग्यवान्, बलवान् और दीर्घायु होता है ।
चंद्र सबसे दुष्ट-चन्द्र पर सव ग्रहों की दृष्टि हो तो राजकुल में उत्पन्न राजा
होता है अन्य अपने कुल में श्रेष्ठ धन अन्न ओर नीति कुशळ होता है (शंभु होरा०) ।
सूर्य लग्न में हो या लग्न पर पूर्ण दृष्टि हो तो क्रोधी, शरीर में बात पित्त रोग से
पीड़ा, पाषाण आदि प्रहार से कष्ट, कंठ या गुदा में ब्रण या तिल । बालपने में अनेकों
पीड़ा दुःख होते हैं ( जा० सं० ) ।
शुभ ग्रह लग्नेश होकर लग्न को देखे या लग्न में हो-बिना क्लेश बड़ी आयु पावे
और सुखी होता है ( जा० सं० ) ।
लग्न पर ग्रह दृष्टि फल
लग्न पर सूर्य दृष्टि--राज सेवी, पितृषन से धनी ।
२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
लून पर चन्द्र दृष्टि--जळू या जळचरों के व्यवहार से या रोजगार से धनी ।
रूगत पर मंगल दृष्टि--धर्मात्मा, स्थूल लिंग ।
लग्न पर बुध दृष्टि--विद्वान, शिल्पज्ञ तथा यशस्वी ।
रूग्न पर गुरु दृष्टि--राजा का पूज्य और व्रत युक्त ।
लग्न पर शुक्र दृष्टि--वेश्याओं में आसक्त, सुखी, धनी ।
लग्न पर शनि दृष्टि--वृद्धा स्त्री वाला, खल, मलिन ।
लग्न को कोई ग्रह न देखे तो लग्नस्थ ग्रह के वश से फल कहे ( जा० पारि० ) ।
लग्न पर दृष्टि फल
लग्न को लग्नेश देखे--राजा या राजा का प्रिय, धनी, सुखी हो ।
लग्न को शुभ ग्रह देखे--सव शुभ फल ।
लग्न को पाप ग्रह देखे--अशुभ फल ।
लग्न को दो आदि ग्रह देखे-सुखी ।
लग्न को सब ग्रह देखें--राजा हो ( जा० परि० )
` होरादि कुण्डली में चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि का फल
चन्द्र जिस राशि के होरा में हो उसे होरा स्थित ग्रह देखे तो णभ फल देगा ।
जैसे चन्द्रमा यदि सूर्य होरा में हो और सूय होरा स्थित ग्रह देखें तो शुभ ।
| चन्द्र 1 चन्द्र ss 12 1)
लग्न पर दृष्टि--इसी प्रकार लग्न में भी होरेश का फल विचारना ( वृ० जा० )
यदि लग्न में चन्द्र होरा हो और चन्द्र उपे देखें तो शुभ, सूर्य का होरा स्थित ग्रह देखे
तो शुभ, यदि चन्द्र अपने होरा में हो या दूसरे ग्रह सूर्य के होरा में होकर उसे देखे तो
अशुभ फल होता है ( प्राण यो० ) 1
द्रेष्काण कुण्डली में भी ऐसा ही विचार
जिस द्रेष्काण में चन्द्र हो उसी द्रेष्काण राशि के स्वामी से चन्द्र देखा जाय तो शुभ
फल होता है।
उसी प्रकार द्वादशांश निशांश व नवांश आदि में विचारना ।
द्वादशांश का फल--द्वादशांश फल के लिए-पहिले जो मेधादि राशि गत चन्द्र पर
दृष्टि का फल कहा है वही फल इसमें भी विचारना ।
नवांश में फल--इसी प्रकार चन्द्र पर जों सूर्यादि ग्रहों का फल कहा है वही फल चवांश राशि के अनुसार भी समझना ( वृ० जा० )
अध्याय २
अनेक ग्रहों के एक राशि में होने का फल
३ ग्रह योग
(१) सूयं चन्द्र-क्रूर कमं में निपुण, घमण्डी, पत्थर के यन्त्र आदिकों के व्यापार में
चतुर, निरन्तर कामी ( शंभु० )। अनेक प्रकार के यन्त्र बनाने वाला, पत्थर के काम
करने वाला ( वृ० जा० ) स्त्री के वश रहें, कपट कमं कर्ता, बड़ा उद्धत, काम करने
में बड़ा अदृढ़, पराक्रमी और अल्प मन वाला ( मान० ) । पत्थर और यन्त्रों को बेचने
वाला, माया में चतुर, कामी, चाहना सहित, अभिमानी ( जा० भ० )।
सूर्य मंगल--उत्तम धमं कमं तथा धन से हीन रहे, क्लेशों में तत्पर, निरन्तर
क्रोध युक्त ( शंभु० ) । पापी ( वृ० जा० ) । तेजस्वी, पाप में मन,मिथ्याभाषी, बड़ा
मूखं, भाई बन्दो से प्रेम करने वाला, वड़ा बलवान ( मान० ) । बड़ा यश, बलवान्,
मूर्ख, अतिशय उद्धत, झूठ बोलने वाला, साहसी, शुरवीर , ( जा० भ० )
सूर्य बुध--प्रिय वाणी, राजमस्त्रो, सेवा से धन कमावे, शास्त्रों में तत्पर, कलाओं
'के समूह में चतुर ( शंभु ) । सब कार्यों में निपुण, बुद्धि यश सौख्य युक्त (वु० जा०) ।
बड़ा विद्वान, राजाओं से मान प्राप्त, देव ब्राह्मण सेवा में मन, प्रियभाषी, यशस्वी,
स्थिर धन से युक्त ( मान० ) प्यारी बोली, मंत्री, बहु सेवा कर धन इकट्ठा करने
वाळा, कलाओं में कुशल, शास्त्रों में चतुर ( जा० भ० )। सूर्य बुध एक साथ
होने से बुधादित्य योग होता है वह धर्मात्मा पण्डित धनवान् बहुपुन्नवान् और सेवकों
सहित्त तथा जितेन्द्रिय होता है ( जैमिनि० )।
सूर्य गुरु--पुरोहिताई में चतुर, राजा का मन्त्री, भित्रों से पाये धन से
सम्पन्न, चतुराई से युक्त, उपकारी (शंभु०)क्र्र स्वभाव, निरन्तर पराये कर्म में तत्पर
(वृ० जा०), राजाओं से सत्कार प्राप्त, स्वधमं में निष्ठा, मित्रवान्, धनवान्, विद्या
पढ़ने पढ़ाने वाला, सर्वत्र विख्यात ( मान० ) । पुरोहिताई में निपुण राजा का मन्त्री,
मित्रता से धन को प्राप्त, परोपकारक, चतुर ( जा० भ० ) ।
सूर्य शुक्र--सद् बुद्धि, संगीत बाजे आयुध कर्म में निपुण, नेत्र शक्ति से हीन,
मित्र समाज प्राप्त रहे ( शंभु० ) रंग, मल्लादि और आयुध ( हथियार ) से धन पावे
( वृ० जा० ), णस्त्र से प्रहार करने वाला, जेल में बन्धन पाने वाला, नाट्यशाला की
हास्य भरी बातों को जानने वाला, कमजोर नेत्र, परस्त्रियों से संगम में द्रव्य प्राप्ति,
परस्त्रियो में फँसा (मान०), नट बनकर या शस्त्र का प्रयोग करके द्रव्यकमाये (फळू०)
गाना-बजाना और शास्त्र विद्या में सुन्दर बुद्धि, नेत्रों के बल से रहित, स्त्रीयुवत,
“मित्र समाज में पूर्ण ( जा० भ० ) 1
सूर्यं शनि--धमे में प्रीति, पुण्यबुद्धि, गुणज्ञ, स्त्री पुत्रों से सुखी सम्पन्त, अत्यन्त
घातु क्रियाओं से युक्त रहे ( शंभु० ) तांबा आदि धातु के काम में निपुण, अनेक बर्तन
२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
भांडे आदि का वनाने वाला व इनके काम से द्रव्य पावे ( वु० जा० ), विद्वान हो तब
भी क्रिया में निष्ठ रहने वाळा, धातु का जानने वाला, वृद्ध पुरुषों की तरह बर्ताव
करने वाला, स्त्री तथा पुत्र से रहित ( मान० ), धातु क्रिया व व्यवहार में वृद्धि रखने
वाला, गुण का जानने वाला, धर्म प्रिय पुत्र और स्त्री से सौख्य पाने वाला, सदा
अत्यन्त समृद्धियों सहित { जा० भ० ) ।
(२) चन्द्र मंगल--पुण्य कम से जीविका, कुटिल स्वभाव, प्रतापवान् अपने आचार
से हीन, कलह में तत्पर, रोग से पीडित, माता का शत्रु ( शंभु० ), कूर कमं, स्त्री व
मद्य के घड़े वेचने वाला, अपनी माता को क्रूर ( वृ० जा० ), रक्त की पीड़ा से
व्याकुल, मृतिका, धांतु तथा चमड़े को कारीगरी जानने वाला, धनवान्, रण में शूर,
( मान० ), आचार रद्दित, चुगल, प्रतापी, व्यापार से आजीविका, कलह प्रिय,
मातुवैरी, रोग से दुःखी ( जा० भ० ) ।
चन्द्र बुध-सुन्दर रूप, उत्तम कमं, धन से युक्त, स्त्री में परम आसक्त, अति
बोलने वाळा, उत्तम वाणी के विजास वाला, कृपा से गीला मन और छोटा शरीर
( शंभु० ), प्यारी वाणी, अथं जानने वाला, सौख्य युक्त,सबका प्यारा, कीर्तिवान
( वृ० जा० ), स्त्री में अति आसक्त, रूप में सुन्दर, कविता करने में चतुर, धनवान्
गुणवान्, सदा हसमुख, बड़ा विद्वान् अपने कुल में धर्मात्मा ( मान० ), श्रेष्ठ वाणी,
श्रेष्ठ रूप, दयालु, नम्र, स्त्री का अधिक प्रेमी, बड़ा वक्ता ( जा० भ० ) ।
चन्द्र गुरुसबंदा गूढ़ होवे गूढ़ बुद्धि, अति मित्रों वाला, परोपकारी, धर्म कर्मे
आदि से युक्त ( शंभू ), शत्रु जीतने वाला, कुल में श्रेष्ठ, चपल, धनी ( वृ० जा० );
देव गुरु पूजक, वन्धुजनों का मान करने वाला, धनवान्, दृढ़ प्रीत करने वाला, बड़ा
सुशील, ( मान० ) नम्रता युक्त, मजबूत, छिपी सलाह करने वाला, अपने धर्म और
कर्म में तत्पर, परोपकार में चित्त ( जा० भ० ) ।
चन्द्र शुक्ल--उत्तम गन्ध पुष्प, उतम वस्तु में मन, वस्नादि व्यापार में चतुर,
व्यसन वाळा, विधि जानने वाला ( शंभु ), वस्त्र कमं, तंतुवाय-सूत्र विनना, रफूगिरी
व वस्त्ररंगना, सीना और वस्त्र के व्यापार में चतुर ( बू० जा० ), चीजों के क्रय विक्रय
में चतुर, शूद्र वृत्ति वाला, कलहकारी, अल्प वस्त्र आदि से युक्त (मान० ), वस्त आदि
के क्रय विक्रय में चतुर व्यसन रहित, विधि का जानने वाळा, सुगन्ध और उत्तम पुष्प
उत्तम वस्त्रों में चित्त ( जा० भ० ) ।
चन्द्र शनि--पर स्त्री में तत्पर, वैश्य वृत्ति से जीविका, सदाचार से हीन, पराया
पुत्र और पुरुषार्थं से हीन (शंभु०), उसकी माता पुनभू' ( एक जगह व्याही हुई दूसरी
जगह पुत्र उत्पन्न किया ) हो ( वृ० जा० ), हाथी घोड़ें का पालन करने वाला, अल्प
पुत्र वाला, वृद्धा स्त्री के संग, वेश्या से धन प्राप्त करे, खोटा स्वभाव ( मान० ), अनेक
स्त्रियों के सेवत करने की इच्छा, वैश्य वृत्ति, साधु शील से रहित, पर पुत्र ओर पुरुषार्थ
हीन ( जा० भ० ) ।
अनेक ग्रहों के एक राशि में होने का फल : २७.
(३) मंगल बुध--मल्ल युद्ध में चतुर, बहुत पुत्रों की अभिलाषा, अनेक प्रकार की
औषधि वाला, पुण्य स्वमाव, हीन कमं, लोह कमं विधि जानने वाला (शंभु०), अत्तार
जड़ी वक्कल, फूल पत्ते गोंद तेल.और बनावटी वस्तु का व्यापार करे, कुश्ती लड़ने
वाला ( वृ० जा० ), निधन, विधवा पति, दुर्भाग्य स्त्री वाला, कण वृत्ति करने वाला,
सोने या लोहे की जीविका करने वाला ( मान० ), मल्ल विद्या में चतुर बहुत स्त्रियों
की लालसा, अनेक ओषधियों का व्यापार, सोना ओर लोहे की विधि में बुद्धि वाला
( जा० भ० )
मंगल गुरु--मन्त्र विद्या, अस्त्र शस्त्र के बोध में अत्यन्त निपुण तथा विवेकी, सेना-
पति राज्य, नगर या ग्राम का स्वामी, ग्रह बल के अनुसार होवे ( शंभु० ), नगर का
स्वामी, राजा या ब्राह्मण, धनवान् ( वृ० जा० ), बुद्धिमान् शिल्प शास्त्र को जानने
वाला, सुनने मात्र से वात का स्मरण रखे, वाक्य चतुर, घोड़ों से प्यार करने वाळा,
सबों में प्रधान ( मान० ), मन्त्र और विद्या की कला में चतुर शीलवाला, सेना का
स्वामी राजा या नगर व ग्राम का स्वामी ( जा० भ०) ।
मंगल शुक्ग--प्रपञ्च, झूठ धूतं में प्रीत, अनेक स्त्रियों के भोग में मन, घमण्डी,
सवके साथ वैर ( शंभु० ), मल्ल, गोपालक, चतुर, परस्त्रियों में आसक्त , जुआडी, ठग,
( वृ० जा० ) गुणों द्वारा पुरुषों में प्रधान, ज्योतिषी, जुभा खेलने, झूठ बोलने में निरत,
बड़ा शठ, परस्त्रियों में आसक्त, सबों में मान्य ( मान० ) स्त्रियों के भोग विधान में
चित्त, जुआ व झूठ में प्रीत, प्रपञ्च में तत्पर अभिमान रहित, सबसे बैर (जा० भ०) ।
मंगल शनि--अस्त्र शस्त्र जानने वाला, युद्ध कमं में तत्पर, सुखहीन, और लोक में
अति निन्द्य होवे ( शंभु ), दुःख कारक, झूठ बोलने वाला, निदित काम करने वाला,
( वृ० जा० ), प्रशस्त वाणी, इन्द्रजाल में निपुण, अपना धर्म छोड़ कर अन्य धर्म को
मानने वाला, कलह प्रिय, विश्वासघाती, विष तथा मदिरा के झगड़' में रहने वाला
( मान० ), अस्त्र और शस्त्र का जानने वाला, युद्ध करने वाला, चोरी झूठ में प्रीत,
सदा सौख्य रहित ( जा० भ० ) ।
(४) बुध गुरु--संगीत जानने वाला, नीति का स्वामी, नम्र, अधिक सुखी, उत्तम
गुण, धीर सुगंधित वस्तु प्रिय, उदार ( शंभु० ), मल्ल गीत प्रिय, नृत्य का ज्ञाता,
( वू० जा० ), नाचने गाने में कुशल, घंयवान्, पंडित, सदा सुखी ( मान० ),
गान विद्या का ज्ञाता, नम्र, सौख्य युक्त, अति श्रेष्ठ धैयेवान, निरंतर उदार, सुगंध
का भोग भोगने वाला ( जा० भ० )।
बुध शुक्र--उत्तम वाणी का विकास, गुणवान् विवेकी, सदा प्रसन्न, अपने कुल में
श्रेष्ठ, सुन्दर वेश, बहुतों का स्वामी ( शंभु ), बोलने में चतुर, भूमि और गुणों का
स्वामी (वृ० जा०), नीति शास्त्र का ज्ञाता, अनेक प्रकार की कला में कुशल, धनवान्,:
सुन्दर वाक्य, वेद ज्ञाता, हास्य की लालसा ( मान० ), कुल में प्रतापी, श्रेष्ठ वाणी,
सदा हषं युक्त, श्रेष्ठ वेश, नग्नता युक्त, बहुत नौकर, गुणवान् चतुर ( जा० भ० )।
बुध शनि--कलह प्रिय, चंचल चित्त, कला के समूहों में चतुर, बहुतों का पालन
२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
करने वाला परम सुशील (शंभु०),दुसरे के ठगने में चतुर, गुरु आदि के वचन उल्लघन
करने वाला, ( वृ० जा० ) दुबंलांग, चलने के स्वभाव वाला, उपाय रहित, सबसे
कलह करने वाला सुन्दर वाक्य बोलने वाळा, काम करने में चतुर ( मान० ),
चंचळ स्वभाव, कलह प्रिय, कला के समूहों में चतुर, श्रेष्ठ वेश, बहुत मनुष्यों का
सालक ( जा० भ० ) । ८
(५) गुरु शुक्र- स्त्री, धन, मित्र पुत्रादि से सदा सुखी, विद्या में पंडित, श्र ष्ठों से
अत्यन्त शास्त्रार्थ करे ( शंभु० ), अच्छी विद्या जानने वाला; धन और स्त्री युक्त, बहुत
गुणों से युक्त (वृ० जा०), सुन्दर स्त्री, धनवान्, धर्म में आस्तिक, प्रमाण जानने वाला
विद्या से आजीविका ( मान० ), विद्या से पंडित, सदा पंडितों से विवाद करने वाला,
पुत्र मित्र और घन के सौख्य से युक्त ( जा० भ० ) ।
गुरु शनि-अधिक यश, ग्राम नगर का स्वामी,स्त्री के पक्ष में संदेही, मनोरथ सिद्ध,
शूरमा, धनवान् कला जानने वाला ( शंभु० ), नाई या कुम्हार, अन्नकार ( रसोई
बनाने बाला ) हो ( वृ० जा० ), जीविका से युक्त, वड़ा शूरवीर, यशस्वी, नगर
का स्वामी, नगर के जनों में या सेना के मनुष्यों में मुख्य, ( मान० ), शूरवीर, धनवान्
ग्राम और नगर का स्वामी, यश वाला कलाओं में कुशल, स्त्री के आश्रय से मनोरथ
पूर्ण करने वाला (जा भ० ) ।
(६) शुक्र शनि--उत्तम शील, लेखन विधि से उत्पन्न खेल से युक्त, पत्थर के
कामों में चतुर, चंचल बुद्धि, लकड़ी चीरने वाला, (शंभु० ) अल्प दृष्टि, स्त्री के आश्रय
से धन बढे, पुस्तक आदि लिखने में और चित्र बनाने में चतुर ( वृ० जा० ), सदा
मतवाला, पशुपाळन करने वाला, बढ़ई के काम में चतुर, खारा या खट्टा पदार्थे का
प्रेमी, कारीगरी जानने वाळा ( मान० ) शिल्प शास्त्र और लेखन विधि में चतुर,
- कौतुकी, घोर युद्ध करने वाला पत्थर के काम में चतुर ।
(७, सूर्यं चन्द्र का विशेष बिचार
सूर्य पाप ग्रहों से युक्त-पिता का नाशक ( ल० चं० )
चन्द्र पाप ग्रहों से युक्त--माता का नाशक
सूर्य या चन्द्र शुभ ग्रह युक्त--शुभ फल
सूर्य या चन्द्र शुभाशुभ ग्रह युक्त--शुभाशुभ ( मिश्रित ) फल ( फ० च० )
(८) सप्तम भाव में २ ग्रह योग का फल
सप्तम में सूयं चन्द्र-पुत्र मित्रो से हीन ओर स्त्री से युक्त होता है ।
सप्तम में सूर्य मंगळ-स्त्री से हीन और स्थिर शरीर वाला होता है ।
सप्तम में सूर्य गुरु-स्त्री से युक्त धनवान् तथा राजबैरी । ;
सप्तम में सूर्य शुक्र-निर्धन, बड़ा शरीर, स्त्री से युक्त, पवंतचारी
सप्तम में सूर्यं शनि-चाकरी करने वाला, दरिद्र, नीच कर्म ।
सप्तम में चन्द्र मंगल-मिथ्याभाषी, ईर्ष्यालु, प्रलापी ।
सप्तम में चन्द्र बुध-राजा या राज्य से मान, अच्छा पंडित ।
अनेक ग्रहों के एक राशि में होने का फल : २९
सप्तम में चन्द्र गुर-कन्याओं से युक्त, राजा या पण्डित. वणिजी से युक्त ।
सप्तम में चन्द्र शुक्र-कन्याओं से युक्त, थोड़े पुत्र, थोड़ा धन, स्त्री से युक्त ।
सप्तम में चन्द्र शनि-स्त्री से हीन, नगर का स्वामी, नगर में विचरने वाला ।
सप्तम में मंगल वुध-पहिली स्त्री मृत्यु को प्राप्त, विवादी शूरवीर
सप्तम में मंगल गुरु-पर्वत वन जल में विचरने वाला, स्त्री से हीन ।
सप्तम में मंगल शुक्र-स्त्री के कारण अनर्थ, दुष्टाचार वाला ।
सप्तम में मंगल शनि-स्त्री के वश रहे, निघंन , अन्य स्त्री में रत ।
सप्तम में बुघ गुरु-अच्छां आचरण, उत्तम स्त्री तथा स्वजनों से युक्त ।
सप्तम में बुध शुक्र-राजा का मन्त्री, कल्याण कमं, स्त्री की चेष्टा करने वाला |
सप्तम में बुध शनि-स्त्री-पुत्र सुख से हीन, रोगी ओर धन युक्त ।
सप्तम में गुरु शुक-भोगी, स्त्री रत्न से युक्त, कन्याओं से युक्त ।
सप्तम में गुरु शनि-मूखं, मित्रों से वेर, नष्ट धन, पिता का धन वाला ।
सप्तम में शुक्र शनि-धन स्त्री रत्न सौख्य इनसे युक्त, कीतिमान् (जा० सं०)
नवम में दो ग्रह योग
नवम में सूर्य चन्द्र-नेत्र रोगी, धनी, सुभाग्य युक्त, कलह प्रेमी ।
नवम में सूर्य मंगल-दुःखी, कलह प्रिय, शूरवीर, प्रचण्ड, निपुण, राजप्रिय ।
नवम में सूर्य बुध-विद्वान्, बहुतों से बेर, दुःखी, नाना रोग ।
नवम में सूर्य गुरु-रोगी, भूषण वस्त्र गंध पुष्प प्रिय ।
नवम में सूर्य शुक्र-नेत्र रोगी, कलह प्रिय, रोगी, भाग्यवान्, सुन्दर बुद्धि ।
` नवम में सूर्य शनि-शठ, धूतं, रोगी, युद्ध. प्रिय, अनर्थं कर्ता, निर्धन, अल्पायु ।
नवम में चन्द्र मंगल-सम्पन्न, घाव युक्त, माता का अप्रिय, विकल अन्त ।
नवम में चन्द्र बुध-पुत्र हीन, विफल शरीर, बहुत बोलने वाला, उत्तम, शास्त्र
का ज्ञाता पंडित ।
नवम में चन्द्र गुरु-सौभाग्य घन से युक्त, सुखी, गुणवोन्, उत्तम ।
नवम में चन्द्र शक्र-माता की सपत्नी हो, व्याधि युक्त, व्यभिचारिणी का पति।
नवम में चन्द्र शनि-अति दुष्ट कमं करने वाला, माता के कुछ से भ्रष्ट ।
नवम में मंगल वुध-मन्त्रियो के शास्त्र में चतुर, सुन्दर भाग्य, भोगी,.
उद्विग्न चित्त ।
नवम में मंगल ग्ररु-पूज्य,धन वान्य युक्त,व्याधि या घावयुक्त शरीर,क्लेश युक्त ।
नवम सें मंगल शक-परदेशगामी, क्रूर महाधीर, परदेशवासी, प्रधान, स्त्री
से बेर।
नवम में मंगल शनि-सौख्य और धन नष्ट, पापी, दुराचारी, अन्य स्त्रीगामी
स्वजनहीन ।
नवम में बुध गुरु शास्त्र जानने वाला, न्यायी, भोगी, संपदा युक्त, समथं ।
नवम में बुध शुक्र-पंडित, गीत प्रिय,विख्यात,अच्छी बोली, धीर विद्वान् समर्थ ।
३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
नवम में बुध शनि-धनी प्रिय जनों से युक्त, रोगी चतुर, विषम स्वभाव, बेर
कर्ता, बहु मार्गी ।
नवम में गुरु शुक्र-भाग्यवान्, सुन्दर ऐश्वर्य, राजा, बड़ी आयु, सुन्दर भाग्य
सम्पन्न, अनेक सुख युक्त ।
नवम में गुर शनि-धन रत्न युक्त, पूज्य स्वजन हीन, व्याधि युक्त ।
नवम में शुक्र शनि-यशवान्, पृथ्वी पति, व्याधि युक्त, शीलवान् बहुमित्र
(जा० सं०)
(१०) लग्न से दशम में २ ग्रह योग
दशम में सूर्य चन्द्र--सुन्दर शरीर, शत्रु पर जीत, दयाहीन, सेनापति, दुःशील
युक्त, राजसी स्वभाव ।
दशम में सूर्य मंगल--चाकरी कर्ता, निष्फल कार्य, प्रधान, राजा का सेवक,
नित्य उद्विग्न चित्त ।
दशम में सूर्य बुघ--हाथी घोड़ा पृथ्वी का स्वामी, विख्यात । यदि नौच का हो
तो ऐसा नहीं होगा ।
दशम में सूये गुर--नीच कुल में भी जन्म लेकर राजा हो, कीर्ति, सौख्य, सम्मान
और धन से युक्त ।
दशम में सूर्ये शुक्र राजनीति शास्त्र में चतुर, मित्र धन वाहन युक्त, बहुत कार्यों
का आरम्भ करने वाळा ।
दशम में सूय शनि--परदेशगामी, चाकरी करने वाला, जो कुछ धन राजा से
प्राप्त करता है उसे किसी समय चोर चुरा ले जाता है।
दशम में चंद्र मंगल--हाथी घोड़ा खजाना सम्पदा बुद्धि से युक्त, पराक्रमी ।
दशम में चंद्र बुध--विख्यात, मानयुक्त, घनी, राजा, मंत्री, अवस्था के अन्त
भाग में दुःखी, बन्धु से हीन ।
दशम में चन्द्र गरु विद्वान् दानकर्ता, मान धन कीति से युक्त, समृद्ध लम्बी
भुजा, सबके पूजने योग्य ।
दशम में चन्द्र शुक्र-मंत्री, विख्यात क्षमायुक्त, धन विभव से युक्त ।
दशम में चन्द्र शनि-विख्यात, जीते हुए शत्रु वाला, राजा, २ स्त्री ।
दशम में मंगळ बुघ-शूरवीर बुद्धिमान्, तेजस्वी राजा से सत्कार प्राप्त, क्रूर,
सेनापति, धीर ।
दशम में मंगल गुरु-बहुत से परिवार और धन वाला, राजा, कीतिमान् और
कमं समर्थं ।
दशम में मंगळ शुक्र-शास्त्र विद्या में निपुण, माछा, वस्त्र, विद्या अर्थ बुद्धि से
युक्त, राजमन्त्री, स्त्री के समान शरीर ।
दशम में मंगळ शनि-राजा से नहीं मिलने वाला, धन वाला, किसी अपराध में
राजा से दण्डित, विभव से हीन ।
अनेक ग्रहों के एक राशि में होने का फल : ३९
दशम में बुध गुरु-राजा विनीत व मन्त्री, मान, आज्ञा, विख्याति इनसे युक्त,
थुत्र के जारण मारण आदि रूप हिंसा कमं से युक्त ।
दशम में बुध शुक्रनीति शास्त्र ज्ञाता, सब कर्मों का साधन कर्ता, साधु, नीच
जनों के अनुकूल रहने वाळा, राजा और समर्थ।
दशम में बुध शनि-असाधु, मलिन, मूर्ख, चाकरी करने वाला, असत्यभाषी,
परोपकारी ।
दशम में गुरु शुक्र-राजा, मान आज्ञा और विभव से युक्त, बहुत चाकरों वाला,
सुन्दर शील युक्त ।
दशम में शुक्र शनि-उत्तम कमं कर्ता, विख्यात, सवं दन्दों से हीन, राज मन्त्री।
यदि ३ या अधिक ग्रह दशम में हों तो द्विग्रहों के योग की कल्पना द्वारा युक्ति
से फल विचारना । जैसे सूर्य, चन्द्र, मंगळ तीनों एकत्र हों तो (१) सूयं चन्द्र का फल
(२) फिर चन्द्र मंगल का फल (३) फिर सूर्य मंगल का फल पृथक-२ विचारना।
यदि वे ह्विग्रह योग २ या ३ स्थानों में हों तो प्रत्येक स्थान का फल पृथक २
स्थान के अनुसार होगा ।
चन्द्र से दशम में हिग्रह योग
सूर्यं मंगल-अलंकार वस्त्र आदि से युक्त, दिव्य वणिजी करने वाला, शूरवीर,
तीक्ष्ण और अति हिंसक ।
सूये बुध-वस्त्र वाहन भूषण का भोगने वाला, वणिजी कमं करने वाला; जळू
से जीविका वाला ।
सूर्य गुरु-वीर, शूर, विख्यात, राजा से सत्कार प्राप्त, कार्य सिद्धि वाला ।
सूर्य शुक्र-स्त्री के आश्रय में रहने वाळा, समृद्ध, सु दर ऐश्वयं युक्त राज प्रिय।
सूर्यं शनि-चाकरी कर्ता, कृष्ण, दीन, बध और बन्धन को प्राप्त, परदेश वासी,
चोरों में मुख्य ।
मंगल बुध-राजा का शत्रु, महाशूर, सुन्दर कलाओं में चतुर, दीर्घायु ।
मंगल गुरु-दोनों बली हों तो, मित्र जनों से प्राप्त किये धन वाला, मित्र जनों के
आश्रित रहने वाला, जीवन से युक्त ।
मंगळ शुक्र-वणियों की वृत्ति से परदेश में रहना, सुवणं, मोती मणि आदि से
युक्त, स्त्रियों के आश्रित जीवन ।
चन्द्र से दशम में
चन्द्र से मंगल शनि--साहसी कमं युक्त, झूठ बोलने वाला ।
चन्द्र से बुध गुरु-धर्मात्मा ओर स्वामी, विख्यात, राज पूज्य, धनी लेखन कमं
से युक्त, शास्त्र सूत्रों को जानने वाला ।
चन्द्र से बुघ शुक्र- मित्र, धन, स्त्री, सोख्य से युक्त, पंडित, मंत्री या देश पति ।