भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

करने वाला परम सुशील (शंभु०),दुसरे के ठगने में चतुर, गुरु आदि के वचन उल्लघन

करने वाला, ( वृ० जा० ) दुबंलांग, चलने के स्वभाव वाला, उपाय रहित, सबसे

कलह करने वाला सुन्दर वाक्य बोलने वाळा, काम करने में चतुर ( मान० ),

चंचळ स्वभाव, कलह प्रिय, कला के समूहों में चतुर, श्रेष्ठ वेश, बहुत मनुष्यों का

सालक ( जा० भ० ) । ८

(५) गुरु शुक्र- स्त्री, धन, मित्र पुत्रादि से सदा सुखी, विद्या में पंडित, श्र ष्ठों से

अत्यन्त शास्त्रार्थ करे ( शंभु० ), अच्छी विद्या जानने वाला; धन और स्त्री युक्त, बहुत

गुणों से युक्त (वृ० जा०), सुन्दर स्त्री, धनवान्‌, धर्म में आस्तिक, प्रमाण जानने वाला

विद्या से आजीविका ( मान० ), विद्या से पंडित, सदा पंडितों से विवाद करने वाला,

पुत्र मित्र और घन के सौख्य से युक्त ( जा० भ० ) ।

गुरु शनि-अधिक यश, ग्राम नगर का स्वामी,स्त्री के पक्ष में संदेही, मनोरथ सिद्ध,

शूरमा, धनवान्‌ कला जानने वाला ( शंभु० ), नाई या कुम्हार, अन्नकार ( रसोई

बनाने बाला ) हो ( वृ० जा० ), जीविका से युक्त, वड़ा शूरवीर, यशस्वी, नगर

का स्वामी, नगर के जनों में या सेना के मनुष्यों में मुख्य, ( मान० ), शूरवीर, धनवान्‌

ग्राम और नगर का स्वामी, यश वाला कलाओं में कुशल, स्त्री के आश्रय से मनोरथ

पूर्ण करने वाला (जा भ० ) ।

(६) शुक्र शनि--उत्तम शील, लेखन विधि से उत्पन्न खेल से युक्त, पत्थर के

कामों में चतुर, चंचल बुद्धि, लकड़ी चीरने वाला, (शंभु० ) अल्प दृष्टि, स्त्री के आश्रय

से धन बढे, पुस्तक आदि लिखने में और चित्र बनाने में चतुर ( वृ० जा० ), सदा

मतवाला, पशुपाळन करने वाला, बढ़ई के काम में चतुर, खारा या खट्टा पदार्थे का

प्रेमी, कारीगरी जानने वाळा ( मान० ) शिल्प शास्त्र और लेखन विधि में चतुर,

  • कौतुकी, घोर युद्ध करने वाला पत्थर के काम में चतुर ।

(७, सूर्यं चन्द्र का विशेष बिचार

सूर्य पाप ग्रहों से युक्त-पिता का नाशक ( ल० चं० )

चन्द्र पाप ग्रहों से युक्त--माता का नाशक

सूर्य या चन्द्र शुभ ग्रह युक्त--शुभ फल

सूर्य या चन्द्र शुभाशुभ ग्रह युक्त--शुभाशुभ ( मिश्रित ) फल ( फ० च० )

(८) सप्तम भाव में २ ग्रह योग का फल

सप्तम में सूयं चन्द्र-पुत्र मित्रो से हीन ओर स्त्री से युक्‍त होता है ।

सप्तम में सूर्य मंगळ-स्त्री से हीन और स्थिर शरीर वाला होता है ।

सप्तम में सूर्य गुरु-स्त्री से युक्त धनवान्‌ तथा राजबैरी । ;

सप्तम में सूर्य शुक्र-निर्धन, बड़ा शरीर, स्त्री से युक्त, पवंतचारी

सप्तम में सूर्यं शनि-चाकरी करने वाला, दरिद्र, नीच कर्म ।

सप्तम में चन्द्र मंगल-मिथ्याभाषी, ईर्ष्यालु, प्रलापी ।

सप्तम में चन्द्र बुध-राजा या राज्य से मान, अच्छा पंडित ।