भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 454 में से

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१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(१) जन्म नक्षत्र का स्वामी कोटेश है । (२) कचट आदि वगं का स्वामी जन्म

नक्षत्र या नाम के अनुसार वर्गेश होता है । वर्गश-कोटपाल है ।

अ वर्ग का स्वामी=सू्ये, क वगे का स्वामी=मंगल, च वर्ग का स्वामी- शुक्र,

ट वर्ग का स्वामीस्बुध, त वर्ग का स्वामी=गुरु, प वर्ग का स्वामीच्शनि,

य र र व का स्वामी=चंद्र, श स से क्ष तक-चन्द्र ।

जैसे किसी का नाम आकार से है तो अ वर्ग हुआ जिसका स्वामी सूर्य है इससे

कोटपाल सूर्य हुआ ।

अ कृत्तिका नक्षत्र का पहिला चरण है मेष राशि है। मेष राशि का स्वामी मंगल

है इससे कोटेश मंगल हुमा है ।

पचांग में गोचर के ग्रह देखना किस-किस नक्षत्र में है । यहाँ कोट चक्र में दिये

नक्षत्रों में जो ग्रह जिस नक्षत्र में हो वहाँ स्थापित करें।

युद्ध में कोट ( किला ) संग होगा या रोग अच्छा होगा या नहीं आदि का

“बिचार होता है ।

फल विचार--जव कोटेश कोट के मध्य में हो तथा कोटपाल बाहर हो तो कोट

को भय नहीं होता । इसके विपरीत हो तो विघ्न होता है।

` दुर्गे के मध्य में सूयं हो--जल या शेष हो ।

दुर्गे के मध्य में चन्द्र हो=भँग सुर्यं शनि मंगल राहु केतु] दुगं भंग हो

दुर्ग के मध्य में मंगल हो=्दाह सब दुर्ग के मध्य में }

दुगे के मध्य में बुध हो=राजा युद्ध युक्त हो गुरु वुध शुक्रचन्द्र वे ) इन्द्रसे भी वह

दुर्ग के मध्य में गुर हो=बहुत सुभिक्षहो चारों दुगं के मध्य में | दुर्ग न गिरे

और राजा का चित्त चलायमान हो ।

दुर्ग के भध्य में शनि हो=भेद भग हो

दुर्गे के मध्य में राहु केतु-राजा विष में जल जावे ।

सुर्यं कालानल चक्र

न्ट ‘Se उन्चारै

पुष्य ८ 2२ अभिः

पुन« ७ २३ ०

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बन्य ३३ शनः

3 22, < 3७ झू भरब उपिव शवसन उ

जहाँ एक अश्विती लिखा है वह त्रिशूल का दण्ड मूल है । यहाँ अश्विनी मत

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