सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंककल ७
पुरुषाकार चक्र : १९३
क्रमानुसार सब नक्षत्र इस चक्र में बताये अनुसार लिख-देखेँ। जिस नक्षत्र पर अन्य
नक्षत्र हो वहाँ लिख देवें फिर फल विचारे ।
इससे भी युद्ध के समय यात्रा आदि में फल विचारते है ।
जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका फल
यदि त्रिशूल पर जन्म नक्षत्र पड़े - मृत्यु हो ।
यदि बाहर के ८ नक्षत्रों में पड़े--मध्यम फल ।
यदि भीतर के ८ नक्षत्रों में पडे-निःसंदेह जय लाभ हो आयु बढ़े आदि शुभ फल हो। -
सूर्य कालानल चक्र में जो ग्रहों के वेध का फल बताया है उसी प्रकार चन्द्र-काला-
नल चन्द्र से भी विचारे ।
ग्रहों का पुरुषाकार चक्र .
प्रत्येक ग्रहों के पुरुषाकार चक्र से फल का विचार होता है उस ग्रह के नक्षत्र से
जन्म नक्षत्र के फल का विचार होता है।
१--चन्द्र पुरुषाकार चक्र--३ नक्षत्र मस्तक-धन प्राप्ति । ३ नक्षत्र मुख-पूणं
लक्ष्मी । ६ भुजा-कुशल । ३ हृदय-कल्याण । ३ पेट-मागं में मृत्यु । ३ गुदा-लक्षमी ॥
६ पाँव-श्रेय प्राप्त ।
( गोचर में चन्द्र जहां हो उससे गिनकर जन्म नक्षत्र जहाँ पड उसके अनुसार
क्रशमः फल ) जन्म नक्षत्र से वर्तमान चन्द्र नक्षत्र तक गिनने से जो संख्या आवे उसके:
अनुसार फल-६ नक्षत्र मुख में-हानि । ६ नक्षत्र पीठ में-धन लाभ । ६ नक्षत्र हाथ में
राजा से भय। ३ नक्षत्र गुह्य मे-राजाओं से मान । ३ नक्षत्र चरण में-स्यान से भ्रष्ट ॥
३ नक्षत्र कण्ठ में-सव सुख प्राप्त ।
२- मंगल का पुरुषाकार चक्र--गोचर में मंगल जहाँ हो उससे आरम्भ कर
जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका फल-३ नक्षत्र-मस्तक-राज्य । ३ नक्षत्र-मुख-रोग । ३
नक्षत्र-नेत्र-सुख । २ नक्षत्र-कण्ठ-रोग । ४ नक्षत्र-हाथ-रोग। ५ नक्षत्र पेट-धन ।
३ नक्षत्र-गुदा -भ्र मयुक्त । ४ नक्ष त्र-पांव-भ्रम युक्त ।
३--बुघ का पुरुषाकार चक्र (जहाँ गोचर में बुध हो उससे जन्म नक्षत्र तक
संख्या अनुसार फल) ४ नक्षत्र सिर में--राज्य । नक्षत्र मुख में-वांछित भोजन ।
४ नक्षत्र चायाँ हाथ-कष्ट। ४ नक्षत्र दाहिना-सुख। ६ नर'त्र हृदय-सुख । ४ नक्षत्र
गुदा-रोगी । २ नक्षत्र पेर-मन में भ्रम ।
४--गुह का पुरुषाकार चक्र
जिस नक्षत्र पर गुरु गोचर में हो उससे जन्म नक्ष त्र तक गिनने में जो संख्या हो .
उसका फल ।
४ नक्षत्र सिर में--राज्य । ४ नक्षत्र. कंघा में-लक्ष्मी प्राप्ति । १ नक्षत्र कठ में-
विभूति प्राप्त । श्नक्षत्र हृदयःप्रीति छाभ । धुनक्षत्र पांव-मीड़ा । ४ नक्षत्र यायां हाथमृत्यु । ३ नक्षत्र दोनों नेत्र-राजा सम सुख ।
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