सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दाय विचार : २१३
दीर्घायु ६१--अष्टमेश लग्न से लाभ में शुभ ग्रह युक्त हो ( जा० ल॑० ) |
६२--अष्टम में शनि हो ( जा० लं० )।
६३--अष्टमेश शुभ ग्रह होकर शुभ ग्रह युक्त अष्टम भाव में हो ( जा० लं० )। ६४--लग्न अष्टम व लाभ इनके स्वामी क्रमानुसार लाभ केन्द्र व त्रिकोण में
हों वे पाप ग्रह हों चाहे शुभ ग्रह हों तो भी दीर्घायु हो ( प्रा०्यो० ) ।
६५-अष्टमेश शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो दीर्घा० ( प्रा० यो० ) ।
६६--अष्टमेश अष्टम में हो और शनि अकेला हो ( स० चिता० ) ।
६७--शनि स्वगृही मित्र गृही या उच्च का हो ( सर्वे० चि० ) ।
६८--१, ८ और १० भाव के स्वामी स्वगृही हों ( स० चि० ) 1 पुर्णायु ६९--कोई अरिष्ट न हो तो.जो आयु साधन करने से प्राप्त हुई हो वह आयू
दीर्घायु ७०--बलवान् लग्नेश शुभ ग्रह युक्त
भोगे ( ज० भ०) ।
या दृष्ट हो पाप दृष्टि रहित
हो तो सदा भाग्यवान् और
दीर्घायु हो ( जा० पारि० ) |
७१--उच्च का कोई भी ग्रह शनि व
अष्टमेश युक्त हो (जा०पा०) ।
७२--पाप ग्रह ६-१२ भाव में हों,
लग्नेश केन्द्र में हो (जा०पा०)।
७३--अष्टम में पाप ग्रह हो और दशमेश उच्च का हो ( जा० पारि० ) । ७४--अष्टमेश जिस भाव में हो उस भाव का स्वामी जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी और लग्नेश केन्द्र में हो ( जा० पारि० )। ५--हिस्वभाव लग्न में जन्म हो और लग्नेश से केन्द्र में २ पाप ग्रह हों ( जा० पारि० ) ।
७६-द्विस्वभाव लग्न में जन्म हो लग्नेश केन्द्र में हो या उच्च या मूल त्रिकोण का हो तो चिरायु और भाग्यशाली होने ( जा० पारि० )1 ७--शनि सूर्य मंगल चर राशि के नवांश में हो, गुर और क्र स्थिर राशि के नवांश में हो, शेष अर्थात् चन्द्र बुध राहु केतु दिस्वभाव रोशि में हों तो १०० वर्ष की आग हो ( जा० पारि० )।
७८--उच्च का अष्टमेश शुभ ग्रह युक्त केन्द्र त्रिकोण में हो तो दीर्घाय ( जा० पा० ).।
चिरायु ७६--लग्नेश अष्टमेश ओर दशमेश वक्री हो,शनि का योग न हो तो चिरायु
हो ( जा० पारि० ) 1