सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२१२ ; सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
दीर्घायु ४१--लग्नेश गुरु शुक्र युक्त केन्द्र में हो व गुरु शुक्र से दृष्ट हो तो दीर्घायु हो
( स० चिता० ) ।
४२--लग्नेश शुभ ग्रह युक्त गुरु से दृष्ट हो केन्द्रों में शुभ ग्रह हो (स० चि०)
४३--लूग्नेश वली हो पाप ग्रह ३-६०११ में द्दो शुभ ग्रह केन्द्र में हो
(स० चि० )।
४४--३-६-११ भाव में पाप ग्रह हो ६, ७, ८ भाव में शुभ ग्रह हो तो दीर्घायु
हो । ( स० चि० ) ( जा० पारि० ) ।
४५- सप्तम भाव में ग्रह स्वगृही, मित्र गृही या उच्च का हो तो ग्रह की
स्थिति के अनुसार दीर्घायु हो (स० चि० ) ।
४६--लग्नेश अष्टमेश युक्त ६-१२ भाव में हो षष्ठश १२ भाव में हो उस पर
शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो दीर्घायु ( स० चि० ) ।
४७--दशमेश स्वगृही, मित्र गृही या उच्च काहोतो उसकी स्थिति के
अनुसार दीर्घायु हो ( स० चिं० )।
४८--दशमेश, लग्नेश और अष्टमेश केन्द्र में हो ( स० चि० )।
४९-उक्त ग्रह दशम में हो या उपरोक्त तीनों शनि युक्त अन्य केन्द्र में हो
( स० चि०)।
५०-लग्न में अष्टमेश गुरु शुक्र युक्त या दृष्ट हो या लग्नेश केन्द्र में हो
(स० चि० )। |
५१--तोन ग्रह उच्च के हों, अष्टमेश लग्न में हो । अष्टम में कोई पाप ग्रह
न हो ( स० चि० )।
५२--तीनग्रह उच्च के हों, लग्नेश और अष्टमेश युक्त हों अष्टम में पाप ग्रह
न हो ( जा० पारि० )।
५३--अष्टम भाव में ३ ग्रह उच्च के या स्वगृही नित्रगृही हों और लग्नेश
बलवान् हो ( जा० पारि० ) ।
५४--सम्पूर्णं पाप तथा शुभ ग्रह पारावतादि अंशको में केन्द्र त्रिकोण गत हों
( स० चि० ) ||
५६-- लग्नेश सूर्य का मित्र हो तो दीर्घायु हो (.स० चि० ) !
५७--एक भी शूभ ग्रह पूणं बली होकर केन्द्र में हो तो सव दोषों का क्षय
और पुर्णायु करता है ( मान० ) ।
५८--लग्नेश वली होकर ११ या ३ भाव या केन्द्र में हो तो अरिष्ट दूर
होकर निरोगी दीघं आयु वाला हो ( मान० ) ।
५९--आधान लग्न में शुभ ग्रह हो तो दीर्घायु धनी सुखी हो ( फल० दी० ) ।
६०--तीसरे भाव मे राहु हो तो चिरायु हो और उसे लक्ष धन का स्वामी
और कष्टहीन करता है, परन्तु अंगहीन करता है या मामा का नाश
करता है ( जा० छकार ) 1