सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 226, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अल्पायु ५७-क्षीण चंद्र णाप ग्रह युक्त हो १, ५, ७, ८, ९ में से किसी स्थान में शुभ
ग्रह भी न हो और न शुभ ग्रह की दृष्टि हो ।
» १प-चंद्र जिस राशि में हो उस राशि में कोई बलवान् अरिष्ट कारक ग्रह हो।
» ५९-प्रातः व संध्या को किसी का जन्म हो उस समय जो लग्न हो उस लग्न में
चंद्र हो या पाप ग्रह उस लग्न के अन्तिम नवांश में हो ( प्रा० योग )
बाल अरिष्ट--जिस ग्रह की दशा में अर्थात् जन्मकाल में जो शेष दशा किसी
ग्रह की हो उसके भीतर या अंत में मरे तो वह बाल अरिष्ट है ।
१. मंगल की राशि में गुरु अष्टम में हो सब पाप ग्रहों से दृष्ट हो शुभ ग्रहों की
दृष्टि न हो तो अरिष्ट हो ( जा० सं० )।
२. षष्ठ स्थान में चन्द्र हो तो अरिष्ट करता है ।
३. सूर्य ग्रहण हो, सूर्य लर्न में हो तो शस्त्र लगकर अरिष्ट हो ।
४. पाप ग्रह शत्रु या नीच राशि में हो तो अरिष्ट करता है । धन रहित, सुख
रहित बन्धन से संतप्त मरण करता है ( स० चि० ) ।
५. जन्म लग्न ककं या वृश्चिक हो इसमें पाप ग्रह लग्न से सातवें भाव तक हों
शुभ ग्रह सातवें घर से लग्न तक होवें तो अरिष्ट कारक है यह वज्मुक्ति योग
है ( जा० भ० ) ।
६. पाप ग्रह युक्त चन्द्र १, ७, ८, १२ घर में हो, केन्द्र शुभ ग्रह युक्त न हो, चन्द्र
पर शुभ दृष्टि न हो तो बालारिष्ट होता है ( जा० पारि० )।
७. १२ वें भाव में सव ग्रह अरिष्ट कारक होते हैं सूर्य शुक्र चन्द्र और राहु ये विशेष
नेष्ट होते हैं । परन्तु इन चारों की दृष्टि अरिष्ट भंग करने वाली होती है (वृ. पा.) ।
८. किसी भी राशि में एक अंश में शनि मंगल, चन्द्रमा से केन्द्र में हो तोऽवह
२ माता या दाई से पालित होने पर भी नहीं जीता ( वृ० पा. ) ।
९. चन्द्र को शनि विशेष तीसरी दृष्टि से देखें तो भयानक वाल अरिष्ट होता है
( ज्यो० रहस्य० ) ।
१०. लग्नेश चन्द्र राशीश और लग्न-नवांशेश तीनों सूर्य के साथ हों ।
११. पाप ग्रह लग्न और अष्टम स्थान में हो, नीच या शत्रु गृही चन्द्र हो, गुरु
केन्द्र में न हो।
१२. मंगल लग्न में हो, सूर्य शनि एक दूसरे के साथ लग्न से सप्तम में हों ।
१३. लगन से अष्टम में चन्द्र और सप्तम में मंगल हो, राहु नवम हो, शनि लग्न
में हो तो भयानक बालारिष्ट हो । द
१४. लग्न, चन्द्र ओर लग्न से अष्टम स्थान पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो ( ज्यो० रह० ) गुरु या शुक्र केन्द्र में हो, मंगल सूर्य शनि की दृष्टि हो तो बाल अरिष्ट नष्ट हो
जाता है । ( ज्यो० रह० ) ।
१५. संध्या में जन्म हो, चक्र का होरा हो और राशि नवांश से अन्य भाग में
जन्म हो ( ज्यो० शा० ) ।