सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
चंद्रमा से युक्त हों [जा० सं० ]। [१५] सप्तम और लग्न में पाप ग्रह हों चंद्रमा भी
पाप युक्त हो और शुभ दृष्टि न हो [जाण्सं०] । [१६] सप्तम और लग्न दोनों में
ग्रहों का कतंरी योग हो [जा० सं०] । [१७] पाप युक्त चंद्र १, ६, ८, १२, भाव में कहीं हो शुभ ग्रह की दष्टि न हो और केन्द्र में शुभ ग्रह हो । [ जा० सं० ]। [१८]
लर्न में चंद्र, अष्टम में मंगल, नवम में सूर्य, व्यय में शनि हों ओर गुरु की दृष्टि न
हो [ जा० सं० ] । [१९] पाप युक्त क्षीण चंद्र शुभ ग्रह की दृष्टि से हीन १, ५, ७,
=, ९, १२ भाव में कहीं हो [ जा० सं० ]। [२०] लग्न में सूर्य और चंद्र हो शुभ
ग्रह की दृष्टि न हो या बलवान् ग्रह त्रिकोण और अष्टम में हो [ जा० सं० ]। [२१] जो राशिसंधि में उत्पन्न हुए हों वे शीघ्र मरते हैं जबकि पाप ग्रह उनको देखते हों ।
राशि के ३०० होते हैं किसी एक के मान लो ३° है और आगे की राशि के आरंभ
के २, मिलाकर संधि हो जाती है । इनमें अंतिम नवांश और पहला नवांश मृत्यु ओर
भय करते हैं जब पाप ग्रह युक्त हो दृष्ट हो या तो मृत्यु करते हैं । यदि अपने अच्छे कर्म
से या माता पिता के शुभ कर्मों से वच जावें तो धन वाहन युक्त राजा होगा ( स० चि० )। [ २२ ] लग्न में शनि, अष्टम में चंद्र, तृतीय में गुरु हो [ वृ० पारा ]। [ २३ ] षष्ठ में पाप गृही पाप ग्रह युक्त चंद्र हो [ जा० सं० ]। [ २४ ]लग्न में सब पाप ग्रह, व्यय भाव में गुरु, छठे घर में बुध हो । [२५] पाप ग्रह अष्टम भाव में
शुभ ग्रह के नवांश में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो [ ल० चं० ]। [ २७ ] अष्टम में राहु केन्द्र में चंद्र हो. [ छ० चं० ]। [ २८ ] लगन में कूर ग्रह और मंगल के घर में गुरु हो | छ० चं० ] । [ २९ ] सप्तम में या चतुर्थ में २ पाप ग्रहों के वीच चंद्रमा हो
[ लं० चं० ]। [ ३० ] अष्टम में पाप ग्रहों से दुष्ट शनि हो [ छ० चं०]1[ ३१] छर्न में सूर्य, पंचम में चंद्र, अष्टम में पाप ग्रह हो [ ल० चं० ]। [ ३२ ] त्रिकोण
केन्द्र मे पाप ग्रह ६-८-१२ घर में शुभ ग्रह हो तो सूर्योदय में जन्मा वालक प्राण त्यागे
[ छ० चं० ]। [ ३३] १,६, ७, ८, भाव में शनि युक्त मंगल हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो [ छ० चं० ]।
[ ३४ ] व्यय में पाप ग्रह हो जो लग्न में आने को हो और षष्ठ में पाप ग्रह हो वह सप्तम में जाने को हो । [ वू० जा० ] [ ३५ | दूसरे आठवें भाव में पाप ग्रह वक्री हो । [ वृ० जा० ] [ ३६ ] क्षीण चन्द्र व्यय में हो, लग्न और अष्टम में पाप
ग्रह हो किसी केन्द्र मै शुभ ग्रह न हो। [ वृ० जा० ] [३७] पाप युक्त क्षीण चन्द्र 1, ७, ८ १२ भाव में हो चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो और केन्द्र में शुभ ग्रह न हों । [ वृ० जा० ] [ ३८ ] लनन में क्षीण चन्द्रमा हो अष्टम और केन्द्र में पाप ग्रह ' हो [ बृ० जा० ] [ ३९ | पाप ग्रहों के वीच चन्द्र ४, ७ या ८ स्थान में हो । [४०] छर्न में सूर्य चन्द्र, त्रिकोण में पाप ग्रह हो वा बलवान शुभ ग्रह से युक्त या दुष्ट न हो [ वृ० जा ] [ ४1 ] भावसंधि, तिथिसंधि और राशि संधि इनमें एक दो या तीन एक साथ पड़ जाने उस समय जन्म हो [ स० चि० ] परन्तु शुक्रवार का दिन हो तो मृत्यु नहीं होती ऐसा चन्दीश्वर का मत है। [ ४२ ] राशि संधि में