भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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आयुर्दाय विचार : २२३

में सूर्य चन्द्र, केन्द्र त्रिकोण में पाप ग्रह हो शुभ ग्रह की दृष्टि न.हो । २९--चन्द्रमा

पाप युक्त हो राहु से दृष्ट हो [प्रा० यो०] । ३०-अष्टमेश पाप युक्त ६ या १२ भाव में

या अष्टमेश और लग्नेश ६ या १२ भाव में हो [ जा० सं० ]। ३१--छग्न से ६, ८,

१२ घर में चन्द्र हो पाप ग्रहों की दृष्टि हो [ वृ० पा० ] 1३२--छमन में सूर्य या चन्द्र

हो त्रिकोण या अष्टम में बलवान्‌ पाप ग्रह हो शुभ युक्त या दृष्ट न हो [ जा० पा० ]।

२३३--लग्न में चन्द्रमा हो, अष्टम में मंगल, वारहवें शनि और नवम सूर्य हो इनको

बलवान्‌ गुरु न देखता हो तो शीघ्र मृत्यु हो । [ जा० पा० ]। गुरु किसी को देखता

हो किसी को न देखता हो तो अरिष्ट मात्र हो। बलहीन गुरु देखे तो दोष नहीं -

मिटता । यदि गुरु पंचम में हो और सव १, ८, १२, ९ घर में हों तो देख सकेगा तब

दोष दूर हो जायगा । ३४--चन्द्र राशि के अन्त नवांशक में हो, शुभ ग्रह से दृष्ट न

हो, पाप ग्रह त्रिकोण में हो [ वृ० जा० ]। ३५--छग्न और सप्तम में पाप ग्रह हो; चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो [ वृ० जा० ]। ३६--चन्द्रमा लग्न में, ६, ८, ११ घर में शुभ ग्रह त्रिकोण में पाप ग्रह हो [ जा० भ० ]। ३७-लनन में सूर्य, सप्तम में

मंगल व शनि, अन्य स्थान में चंद्र हो [ जा० भ० ] ३५--क्षीण चन्द्र लग्न में, पाप

ग्रह ८ घर या केन्द्र में हो, सप्तमेश पाप ग्रह युक्त हो [ ल० चं० ] । ३९--तृत्तीयेश

३, १, ५ या २ घर में हो [ ० च० ] | ४०--दशम में सूर्य १, ८ या ४ राशि का

पाप ग्रहों से दृष्ट हो [ छ० च० ]। ४१--जन्म में चन्द्र कोई भाग्य सूचक अंश में

हो साथ ही केन्द्र या अष्टम में हो तो शीघ्र मृत्यु हो । राशि १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२[फल०]

भाग्य सूचक अंश २६ १२ १३ २५ २४ ११ २६ १४ १३ २५ ५ १२

इनमें से कोई बुरे योग, दिन मृत्यु, दिन रोग, विष घटी में जन्म हो तो शीघ्र

मृत्यु हो १--दिन मृत्यु--घनिष्टा और हस्त का पहिला चरण, विशाखा और आर्द्रा का

दूसरा चरण, उत्तर भाद्र ० ओर आश्लेपा का तीसरा चरण, भरणी का चोथा चरण ।

२-दिन रोग--आश्लेषा और उत्तर भाद्र» का पहिला चरण, भरणी | और

मूल का दूसरा चरण, उत्तर फाळ और श्रवण का तीसरा चरण, स्वाती और मृग

शिर का चौथा चरण ये बुरे योग दिन में पड़ें तो बुरा प्रभाव डालते है । यदि ये दोनों

योग रात में पड़े तो दोष दूर हो जाता है ।

३--विष घटी--पहिले वता चुके हैं [ फल दी० ]।

४२--सूर्ग दशम में मंगल या चन्द्र के घर का हो जिस पर पाप ग्रहों की दृष्टि

हो शुभ युत या दृष्ट न हो [ स० चि० ]1 ४३--छूग्नेश पाप युक्त सप्तम में हो

[ जा० भ० ]। ४४--राहु केन्द्र में पाप युक्त हो शुभ युक्त या दृष्ट न हो [ स०

चि० ] । ४५--शनि लग्न या त्रिकोण में हो ६-८-१२ भाव या केन्द्र में पाप ग्रह हो

[ स० चि० ] | ४६--क्षीण चन्द्र लग्न में पाप दृष्ट हो | स० चि० ] | ४७--क्षीण

चन्द्र पाप युवत १, ७, ८ भाव में हो [ स० चि० ] । ४८--लग्न चन्द्र या सूर्य बल?