सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 234, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
वान् हो परन्तु पाप ग्रह केन्द्र में हो अष्टम या त्रिकोण में सूर्य शुक्र मंगळ एक साथ
हों [ स० चि० ] । ४९--मंगलवार को मंगल ही लग्न में हो, क्षीण चन्द्र हो लग्न व
केन्द्रों से बाहर लग्नेश हो तो उसकी मृत्यु यह मंगल शीघ्र ही देता है । ऐसा ही शनि
भी करता है [ स० चि० ]। ५०--सप्तम में मंगल और शनि हो शुभ ग्रहों से दृष्ट
न हो [ ज्यो० शा० ] । ५१--लग्न में मंगल हो ६ या ५ में शनि हो [ज्यो० शा०]।
५२--सब पाप ग्रह ८ भाव या केन्द्र में हों | फल० ]। ५३--सब पाप ग्रह १ या
८ घर में हों [ फल० ] । ५४--सव पाप ग्रह १ या ७ घर में हों | फल० ]। ५५-
पाप युक्त क्षीण चन्द्र ६,८,१२ भाव में हो [ फल० ] । ५६--पाप ग्रह ७ या ८ घर
` में हो [ फल० ] । ५७--केन्द्र स्थान को कोई शुभ ग्रह न देखे [ फल० |। ५८--
क्षीण चन्द्र लस में क्रूर ग्रह सप्तम भाव के पहिले द्रेष्काण में हो [ स० चि० ]।
५९--छम्नेश सूर्य युक्त नीच में या अष्टम हो तो वह शीघ्र मरे या जीता रहे तो मरे
के वराबर रहे [ स० चि० ]। ६०--राहु सिवाय मेष और वृष राशि के लान में ह
[ स॒० चि० ] । ६१--पाप गूह लग्न से २, १२ घर में या ७, ८ और १२ घर में हो
[ स० चि० ] । ६२--गुरु के नवांश में शनि हो राहु से दुष्ट हो लग्नेश पर शुभ
दृष्टि न हो [ जा० पारि० ]। ६३--चन्द्र कुम्भ के २० वें भाग [अंश | में हो या
वृश्चिक या सिंह के २१ वें भाग [ अंश ] में हो [ स० चि० ] । ६४--अष्टमेश पाप
युक्त हो ८, १२ स्थानों में भी पाप गृह हो [जैमि०] 1 ६५४--केन्द्र त्रिकोण में पाप गृह
६,५ में शुभ गह हो लःनेश और अष्टमेश नीच का हो [ जैमि० ] । ६६--सप्तम में
आयुध द्रेष्काण का पाप गूह हो और चन्द्रमा लग्न में हो [ स० चि० ]।
आयुध द्रेष्काण मेष का मिथुन का सिंह का तुळा का कुम्भ का
पहिला दूसरा पहिला दूसरा पहिला
मृत्यु समय के कुछ योग
कुछ दिनों में मरे [१] जन्म में क्षीण चन्द्रमा पाप युवत हो उस पर राहु की
दृष्टि हो तो थोड़े दिनों में मरे [ जा० भ० ] [ स० चि० ]।
[२] लग्नेश, अशेश, राशीश जिसके अस्तंगत हों [ स० चि० ]।
७ दिन में मृत्यु हो [३] १, ७, १२, २ भाव में क्रूर गह चतुर्थ में राहु हो
[ मान० ]1
७ दिन या ७ मास में मृत्यु [४] चन्द्रमा, सप्तम या नवम में शनि राह और मंगल से युक्त हो[ ल० च० ]। प्र
७ दिन में मृत्यु [५] कृष्ण पक्ष में दिन को जन्म हो सप्तम में गुरु शुक्र हो और चन्द्र राह व शनि की दृष्टि हो!
८-१२ दिन में मृत्यु [६] लग्न से २-८-१२ भाव में कूर हो तो आठवे या १२बे' दिन विष्ठा रुकने से मृत्यु हो [ ल० चं० ]।
१० दिन में मृत्यु [७] रून या अष्टम में चन्द्र और राहु हो [ छ० च० ]।