भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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आयुर्दाय विचार : २३१

बिलिम

१६०-चन्द्र राशीश सूयः पाप यू क्त ६-८ घर में शुभ दृष्टि रहित हो लग्नेश आपो- ( ३-६-९ १२ घर ) में हो ( स. चि. )1

न १७ वर्ष आय्‌, १६१-५, ८ या ११ राशि के लग्न मे राहु हो गुरु यक्त या दृष्ट हो. पाप गूह से दृष्ट हो (स. चि.) । १६२-मिथुन लग्न के नवांश में शनि होः लग्नेश से दृष्ट हो वह ऐश्वय वान्‌ और रण शूर हो १७ वषं जिये ( जा. पारि, ) । १८ वषं आय्‌, १६३-लग्नेश अष्टम में अष्टमेश लग्न मे हो शुम योग रहित हो. या लग्नेश अष्टमेश ६,१२ घर में पंचमेश युक्‍त हो (स. चि.) । १६४-लग्नेण अष्टमेश परस्पर एक दूसरे के घर मों हो जिन पर कोई शुभ योग या दृष्टि न हो यो ये लग्नेश और अष्टमेश ६,१२ घर में हो गुरु युक्त न हो (स. चि. ) लग्नेश और अष्टमेश यदि अच्छी स्थिति मे हो तो आय्‌ बढ़ती है खराब स्थिति में हो तो आयु घटती है।

भाव

१६५-छगनेश अष्टमेण दोनों पाप गूढ परस्पर एक दूसरे के घर मे' हों या १२या ६ मे हो गुरु यूक्त न हो (जा. पारि. ) । १९ वर्ष मृत्यु (१६६) गुरु के नवांश में शनि हो राह से दृष्ट हो ओर लग्नेश पर शुभ दृष्टि न हो तो वह जन्मते ही मरे यदि लग्नेश उच्च का हो तो १९ वर्ष आय्‌ हो । १६७-सूयः अष्टम में हो चन्द्र शनि दोनों साथ किसी घर में हों। शुभ योग दृष्टि से बुरा प्रभाव घटेगा (स.चि)1

हो

२० वष' आय्‌ १६८-क्षीण चन्द्र हो कोई कूर गृह अष्टम मे हो, अष्टमेश केन्द्र में लग्नेश निर्वल हो [ जा. छ, 11 १६९- शुभ गृह ३, ६, ९, १२ घर में शनि व चंद्र दोनों ६-८ घर में हो [जा. ल॑.] । १७०-चन्द्रमा या राहु इन दोनों को छोड़

दोनों केन्द्र में हों मंगळ लग्न मे हो [ जा. लं. ] । १७२-लग्न में शुभ गृह यक्त लग्नेश हो अष्टमेश अष्टम में हो परन्तु कोई गृह उसे न देखता हो [ जा. लं. Ji १७३-केनद्र में पाप गूह हो, चंद्र या शुम गृह की दृष्टि होया ८ या १० भाव में चन्द्र हो [जा. पारि] । १७४-केन्द्र में पाप गृह हो, चन्द्र या दूसरे गूह की दृष्टि न हो और चन्द्र ६,८,१२ स्थान में हो [ स. चि. ]। १७५-लग्न में मंगल और सूय हो गुरु दशम मे चर राशि का हो चन्द्र ५ या ९ घर मे हो । १७६-क्षीण चन्द्र लग्नेश से अष्टम मे शुभ ग्रह की दृष्टि न हो पाप ग्रहों की दृष्टि हो [जा० पारि०]। १७७ चतुर्थ मे राहु केन्द्र मे चंद्र हो [मान० 11 १७८-स्थानादि वर्गों से परिपूर्ण वळी शुभ गृह केन्द्रों मे हो और लग्न से अग्टम मे कोई ग्रह न होवे (मान०) । २१ वर्ष आय्‌, १७९-गुरु मित्र क्षेत्री लग्न से १० या ११ घर मे, शुक्र शत्रु क्षेत्री २ या १२ घर मे हो (मान०) । १८०-पष्ठ मेः शुक्र हो तो २१ वर्ष मे शस्त्र से मृत्यु हो (जा. सं )। १८१-छरन मे पापे गही सूर्या पाप ग्रहों के मध्य मे हों । १८२- जन्म संध्या मे हों लग्नेश पाप युक्त ३,६,९,१२ घर मे हो और गुरु शुक्र केन्द्र मे हों।