सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२२ वर्ष आय् १८३-लग्न मे कर्क का गुरु और सूय हो अष्टमेश केन्द्र मे हो
(जः. पारि,) । १८४- लग्न से गुरु पापग्रह यक्त और चन्द्र दृष्ट हो, लग्न से अष्टम
मे अन्य ग्रह हो (जा; रं )। १८५-लग्तेश अष्टमेश केन्द्र मे हो या अष्टम
मे' कोई ग्रह हो और केन्द्रों मे शुभ ग्रहं न होवे पाप ग्रह होवे ( स० चि० )1
१८६-छस्न में कीट राशि (वृश्चिक) में सुर्य गूरु हो अष्टमेश केन्द्रमे हो (त.चि.) ।
इस योग में' वृश्चिक लग्न मे सूरय दशमेश और गुरु २, ५ घर का स्वामी होता है
अष्टमेंण बुध होता है वह लग्न के सिवाय और किसी केन्द्र मे रहना असम्भव है ।
जब लग्न मे सूय है, बुध और गरु लग्न मे' वलवान् हो जाते हैं इससे अधिक
शुभता आ जाती है इससे इस योग मे कुछ शंका होती है। १८७--गुरु लग्न मे
हो राहु युक्त चन्द्र सप्तम या अष्टम मेहो (स. चि.) । यहाँ चन्द्र राहु अष्टम मे
हो तो योग ठीक जंचता है, परन्तु सप्तम में शंका उत्पन्न करता है । क्योकि सप्तम ,
मे राहु है तो लग्न मे केतु गुरु के साथ हुआ । गुरु चंद्र केन्द्र मे होने से गजकेशरी
योग हो जाता है जो दीर्घ जीवन देता है । १८८-छग्न मे' त्रिशांश पति हो [मान.] ।
२४ वर्ष आयु १५९- लग्नेश अष्टम में पाप युक्त या दृष्ट हो शुभ दृष्ट न हो,
अष्टमेश द्वितीयेश और नवमेश से युक्त हो ( स० चि०) १ ९०-लग्नेश अष्टम में पाप
ग्रह युक्त हो अष्टमेश नवम भाव या लग्न में हो ( जा० लं० ) । १९१-लग्नेश अष्टम
में पाप युक्त या दृष्ट हो उक पर शुभ गृह की दृष्टि भी हो, अष्टमेश ९, २, १, भाव
में से कहीं हो ( स० चि० ) ।
२५ वर्षं आयु १९२- शनि द्विस्वभाव राशि का लग्न में हो, ५, १२ भाव के
स्वामी बलहीन हों ( जा० लं० ) । १९३-छगनेश दो पाप गूहों के वीच शुभ ग्रह रहित
हो ओर पिता के जन्म लग्न में जन्म हो ( स० चि० ) ।
२६-२७ वर्ष आयु १९४-म्त में शनि शत्रुक्षेत्री हो शुभ गृह आपोक्लिम ( ३, ६,
९, १२ )--में हों ( जा० पारि० ) । शनि का कट्टर शनु मंगल और सूर्य है । चन्द्र
भी शत्रु है परन्तु उतना कट्टर शत्रु नहीं है । क्योंकि चन्द्र का शनि सम है।
२७ वर्ष आ० १९५--हग्नेश और अष्टमेश अष्टम में पाप युक्त हो शुभ युक्त न
हों ( स० चि० ) । १९६--गुरु स्व स्थानी या स्व द्रेष्काण में हो ( जा० लं० ) ।
२७ या ३० वर्ष आ० १९७--छग्नेश और अष्टमेश के वीच चन्द्रहो और गुर १२
चें हों ( स० चि० ) । यहाँ चंद्र के एक ओर लग्नेश दूसरी ओर अष्टमेश होगा ।
२८वर्षे आ० १९८-अष्टमेश पाप गृह हो अष्टमेश पर गुरु की दृष्टि हो जन्म राशि
अष्टम में हो जो पाप गूहों से दृष्ट हो ( जा० पारि० ) । १ ९९-अब्टमेश पाप गृह
हो पाप गुदर से दुष्ट हो या लग्नेश अष्टम में हो अष्टमेश पर गुरु की दृष्टि हो
( स० चि० ) | २००--पाप गृह १,७, = भाव में, शुभ गृह केन्द्र के वाहर हों [ स०
चि० ] ¡ २०१-कस्न से या चन्द्र से अष्टम भाव का स्वामी केन्द्र में या व्यय भाव में
हो [ जा० ल० ] । २०२-पाप गूह १, २, ८ भाव में, शुभ प्र ह पणफर ओर आपो-
क्लिम मे हों अर्थात केन्द्र के बाहर हों [ स० चि० | ।