सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंमारक स्थान : २५९
७३--रात्रि का जन्म है और लग्न उस राशि का है जिसमें चन्द्र है तो मांदि
की जो राशि और अंश है उसमें शनि जावे तब मृत्यु हो ।
७४--दिन का जन्म हो और लग्न वह राशि हो जिसमें सूर्य हो तो मांदि जहाँ
है उससे सातवां, पांचवां, या नवां घर में जो राशि और अंश है उसमें जब शनि जावे
तब मृत्यु संभव है ।
७४--अष्टम घर से मांदि कितना आगे चला गया है अंतर निकालो, जो राशि
अंतर की आवे उस पर शनि जाने पर मृत्यु संभव है ।
७६--जन्म समय जहाँ शुक्र हो उससे ६, ७ या १२ स्थान गिनने में जो आवे
“वहाँ सूर्य जाने पर मृत्यु योग संभव है ।
७७--जन्म समय (१) अष्टमेश, (२) द्वादशेश, (३) षष्ठेश, (४) अष्टम का घर
द्रेष्काण स्वामी, २२ वां द्रेप्फाण और (५) मांदि जिस स्थान में हों गोचर में जव शनि,
गुरु सूयं और चंद्र इन स्थानों जावे तब मृत्यु संभव है.।
या उपरोक्त ५ ग्रहों के नवांश में या उसके त्रिकोण में जब वे ग्रह जावे तब
मृत्यु होगी।
७८--(१) अष्टमेश, (२) ग्रुलिक, (३) शनि या (४) लग्न से गिनने पर २२ वें
द्रेष्काण ( खर द्रेष्काण ) का स्वामी इनकी राशि और नवांश में या उसके त्रिकोण में
जव गोचर का शनि जावे तब मृत्यु संभव है ।
७९--उदित द्रेष्काण का स्वामी, अष्टमेश व २२ वां द्रेष्काण का स्वापी की
राशि या अंश में जब गोचर का गुरु जावे तब मृत्यु संभव है ( फल० ) ।
८०--(१) राशि जिसका द्वादशांश उदय हो रहा है (२) नवांश राशि जिसमें
अष्टमेश हो (३) नवांश राशि जिसमें लग्नेश हो या इनके त्रिकोण में जब गोचर का
गुरु जावे मृत्यु संभव है ।
८१--जिसमें अष्टमेश या सूर्य हो उप्त राशि और नवांश में जब चन्द्र जावे तो
मृत्यु संभव है (फल०) । ८२--उदित राशि के अंश से यम कंटक के अंक घटाना । शनि के अंक से चंद्र
का अङ्क घटाना । इन दोनों अन्तरों में से प्रत्येक की राशि और नवांश जो प्रगट हो
उसमें या उसके त्रिकोण में गुरु जावे तव जातक की मुत्यु होगी (फल०) ।
८३--छरन से छठे या आठवें भाव में चंद्र हो और पाप दृष्टि हो तो तत्काल
मृत्यु होती है इस पर शुभ दृष्टि हो तो ८ वर्ष में और पाप दृष्टि भी हो तो ४ वर्ष में
मुत्यु हो । यदि पाप ग्रह अधिक और शुभ ग्रह कम देखता हो तो अनुपात से मृत्यु
समय निकाल लेना ( जा० सं०.) 1
८४-१, ५, ९ भाव में से एक में भी दुर्बळ पाप ग्रह हो ओर शुभ ग्रह से युक्त
न हो तो उसकी दशा के अन्त्य में मृत्यु होगी ( जा० पारि० ) ।
८५--राशि संधि में स्थित ग्रह की दशा रोय देने वाली होती है (जा० पारि० )1