भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

मारक स्थान : २६५

कूमि, घाव, गुदा रोग, भगंदर, बवासीर, शस्त्र अग्नि से मरण--(१) अष्टम में

क्षीण चन्द्रमा और शनि हो, बली मंगल की दृष्टि हो ( जा० भ० ) । (२) अष्टम में

शनि हो, क्षीण चन्द्र पर बली मंगल की दृष्टि हो ( जा० सं० ) ( वृ० जा० ) ।

गुदा रोग, नेत्र पीड़ा या शस्त्र से मृत्यु-- क्षीण चन्द्र अष्टम हो उस पर बलवान्‌ शनि की दृष्टि हो ( जा० पारि०)। |

विष्टा से मृत्यु--(१) तुला का मंगल, मेषः का शनि, मकर या कुम्भ का चन्द्र हो

तो विष्टा से मृत्यु हो ( वृ० जा० ) । (२) क्षीण चन्द्र दशम, सूर्य सप्तम, मंगल चतुर्थ

में हो तो विष्ठा से मृत्यु हो ( वृ० जा० ) । (३) तुला का मंगल, वृष में सूर्य शनि के

गृह में चन्द्र हो तो विष्टा में मृत्यु हो ( जा० पारि० ) (४) मंगल तुला में, शनि ककं

राशि में, चन्द्र मकर कुंभ में हो तो वह विष्टा मूत्र के स्थान में मरता है (जा० भ०)।

विष से मरण--(१) दशम भाव का नवांशेश शनि युक्त हो दुःस्थान में हो तो

विष खाकर मरे ( जा० पारि० )। (२).अष्टमेश उस नक्षत्र के उन अंशों रें हो जो

विष घटिका से युक्त हों और पापग्रह से युक्त हो तो विष के निमित्त दोष से मरे

( जा० सं० ) । (३) दशमेश लग्नेश शनि युवत दुष्ट स्थान में हो तो विष खाने से

मृत्यु हो ( स० चि० ) । (४) जब द्वितीयेश और पष्ठेश शनि युक्त हों या दुष्ट स्थान

में हों तो विष से मृत्यु हो ( स० चि० ) । (५) लग्न नवांशेश, दसम नवांशेश शनि

के साथ में धनेश षष्ठेश शनि के साथ त्रिक में हों । (६) छठे या आठवें वुध युक्त

चन्द्र हो तो विष से मृत्यु हो ( लं० चं० ) ।

कूर जीव व विष या अग्नि शस्त्र से मरण--(१) विष घटिकाओं में जन्म हो तो

कूर जीव के विष, अग्नि, शस्त्र इनसे मरण हो ( जा० सं० ) ।

(विष ) विष घटी में जन्म हो और लग्न से अष्टम स्थान पाप युक्त हो ( जा० पा० )।

शस्त्र से या विष के विषाद से मरण या अपने हाथ ओर नेत्रों से हीन हुए देह के

कारण मरण--लम्न में चंद्रमा और अष्टम में निबंल सूयं और लग्न से २ ओर ४

भाव में पाप ग्रह हो तो अपने हाथ और नेत्रों से हीन हुए देह के कारण या शस्त्र से

या विष के विषाद कर कष्ट से मरण ( जा० सं० ) ।

विष या जल से मृत्यू--सूर्य पाप युक्त केन्द्र या नवम भाव में हो तो विष या

जल से मृत्यु हो ।

विशाळ पीड़ा अग्नि या अगाध जल से मरण---(१) दशम भाव का नवांश पति

मंगल राहु शनि से युक्त दुःस्थान में हो (जा० पारि० ) । (२) क्षीण चन्द्र अष्टम में

हो मंगळ राहु या शनि के साथ हो तो जल अग्वि पिशाच आदि के दोष से मरण हो।

अग्नि से धुवा में बंद होने या काष्ठ के भीतर कूटे जाने से-(१) क्षीण चंद्र दशम,

मंगल नवम, शनि लग्न में ओर सूर्य पंचम हो तो अग्नि के धुआ में बन्द होने से व

काष्ठ के भीतर कूटे जाने से मरण हो (वृ० जा०) । (२) क्षीण चंद्र, मंगळ शनि ये

अष्टम, दशम, नवम लग्न या पंचम में हों तो अनेक प्रकार से धूमादि बंधन से भरतः

है ( जा० भ०)।