सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२६६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
नदी व समुद्र में मरण--यदि चंद्र शनि ६,८ या १२ भाव में या चतुर्थ में हों और अष्टम में अष्टमेश दो पाप ग्रहों के बीच हो तो नदी या समुद्र में निश्चय मरण हो ( जा० सं०) ।
जलाशय द्वारा मृत्यु--(१) लग्न में द्विस्वभाव राशि में सूर्य चन्द्र हो तो जल में डूबकर मरे ( वृ० जा० )। (२) कन्या राशि में सूर्य चन्द्र दोनों हों ओर पाप ग्रह से दृष्ट हों तो जळ में डूबने से मृत्यु हो ( जा० सं० ) । (३) ककं राशि पर शनि और मकर पर चंद्र हो तो जल से मरण हो ( जा० सं० ) । (४) लग्न में द्विस्वभाव राशि में सूर्य चंद्र दोनों हों और पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों तो जल के बीच मरण हो ( जा० सं० ).। (५) चतुर्थेश जिस राशि में हो उसका राशीश चतुर्थेश युक्त या दृष्ट
हो तो जलाशय द्वारा मृत्यु हो। (६) सूर्य लग्न में हो चंद्रमा सप्तम हो दोनों को ही पाप ग्रह देखते हों तो जल में डूबने से या कलह से मृत्यु हो ( जा० पारि० ) । (७) सूर्य चंद्र छग्न में हो सभी ग्रह जहाँ कहीं द्विस्वभाव राशियों में हों पाप ग्रहों से दृष्ट हों तो अगम जल में या सींग वाले जानवरों के मारने से मृत्यु हो ( जा० पारि० ) । कुआ में गिरकर मृत्यु--शनि चतुर्थं, चंद्र सप्तम, मंगल दशम भाव में हो तो कुंआ में गिरने से मृत्य हो ( वृ० जा० )।
जल यंत्र कारणों से मरण--चन्द्र १, ८, या १२ भाव में हो तो जल यंत्र कारणों से मरण हो ( जा० सं० ) ।
अग्नि शस्त्र या राजकोप से मरण (१) चतुर्थ मंगल, सप्तम सूय, दशम शनि हो तो शस्त्र अग्नि या राजकोप से मृत्यु हो ( जा० सं० ) ( वृ० जा० ) । (२) चतुर्थ या सप्तम में मंगल और दशम में शनि हो और अष्टम में कोई ग्रह हो तो राजकोप से उत्पन्न मरण या अपने शस्त्र दोष से मरण ( जा० सं० ) । (३) केन्द्र में २ पाप प्रह हों एक दुसरे पर दृष्टि करते हों तो राजा का कोप, विष, शस्त्र या अग्नि से मरण हो ( फल दी० )।
राजकोप से मृत्यु (१) मंगल और सूर्य परस्पर राशि में हों अष्टमेश से केन्द्र में हों तो अवसर आने पर रोजा के कोप से शूळ आदि श्रेष्ठ आयुध से मरण हो ( जा० पारि० ) । (२) मंगळ शनि दोनों परस्पर राशि या नवांश में हों और केन्द्र में अष्टमेश हो तो राजा के कोप से शूल आदि शस्त्रों से मरण हो ( जा० सं० ) । अन्यमत- अष्टमेश से ये केन्र मे हों शेष पूर्वोक्त । (३) तीसरा स्थान सूर्य युक्त या दुष्ट हो और बलवान् हो तो राजा के कारण मृत्यु हो । (४) सूर्यं नीच राशि मै हो या ६,८ घर मे' पाप दृष्ट हो तो राज पीड़ा से मरण एवं धन नाश भी हो ( स० चि० )। चोर द्वारा मृत्यु (१) चतुर्थेश छठे स्थान भे राहु युक्त हो तो चोर द्वारा मृत्यु हो ( जा० सं० ) । (२) यदि लग्नेश अष्टमेश छठे स्थान मे शनि, राहु या केतु युक्त हो तो उसकी दशा या अंतदंशा मे चोरों से मारा जावे ( स० चि० )। (३) ६ और ८ के स्वामी राहु के साथ हों और शनि केतु के साथ हो तो मंत्र या चोर के हाथ से मरण हो ( स० चि० ) । षष्ठेश, अष्टमेश, राहु केतु या शनि की दशा अंतर्दशा मे.