भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

मारक स्थान : २६९.

और लग्न सें पाश आदि द्रेष्काण हो (जा०सं०) । (६) पञ्चम या नवम में पाप ग्रह

हो एक पञ्चम एक नवम भाव में हो तो बंधन से मृत्यु या किले में या हवालात में

मृत्यु हो ( जा० भ० )। (७) जन्म में चन्द्र आश्रित राशि से ५-९ स्थान में पाप ग्रह

हों या पाप दृष्टि हो तथा जन्म लग्न से ८ भाव का ( लग्न से २२ वाँ ) द्रेष्काण यदि

निगड़ या पाश हो तो बंधन में मरे ( जा० पारि० )। (८) लग्न से ४, १० भाव में

यो ५, ९ भाव में पाप ग्रह हो और लग्न में अष्टमेश और मङ्गल हो तो बंधन में मृत्यु हो ( जा० पारि० )।

बंधन आदि या सर्प से मृत्यु-- (१, अष्टम भाव में पाश फाँसी, या निगड़ (बेड़ी)

या सपं द्रेष्काण हो उसमें पाप ग्रह बैठा हो तो उस द्रेष्काण के समान बंधन से या

सपं द्रेष्काण हो तो सपं काटने से मरता है ( जा भ० )। (२) जन्म में चन्द्रमा

नवम या अष्टम मे पाप ग्रह से युक्त या दुष्ट हो तो वंधन से, सर्प से या फाँसी से

मृत्यु हो ( जा० भ० ) । (३) लग्न से पंचम या नवम राशि पाप युक्त या दृष्ट हो

रूग्न से २२ वा द्रेष्काण सर्प निगड़ या पाश हो तो सर्प बंधन या फाँसी लगाकर मृत्यु हो ।

फाँसी से मृत्यु---(१) दशमेश लग्नेश राहु व केतु से युक्त दुष्ट स्थान मे हो तो

फाँसी से मरण हो ( स० चि० )। (२) यदि २ और ६ के स्वामी राहु या केतु युक्त

हों पर दुष्ट स्थान मे हों तो फाँसी पर टंग कर मरे (स० चि० )। (३) जिस

द्रेष्काण मे अष्टमेश पाश मे हो तो फाँसी से मरण हो (४) अष्टमेश जिस द्रेष्काण

मे है वह शनि राहु केतु से युक्त हो (५) या शनि इस प्रकार हो तो फाँसी से मरण

हो ( स० चि० ) । अर्थात्‌ शनि कोई द्रेष्काण मे हो यदि इसका द्रेष्काण स्वामी शनि

मांदि और राहु से युवत हो ( स० चि० ) । (६) चतुर्थ मे मङ्गल व सूर्य, दशम मे

शनि हो या सूय चंद्र मङ्गल शनि ये १, ९, ५ इन स्थानों मे हों तो फाँसी लगकर

मरे (प्रा० यो०) । (७) दशम भाव का नवांशेश राहु केतु युक्त हो (जा० पारि०) ।

शूली से मरण--१-चतुर्थ में सूर्य, द्वितीय में चंद्र हो ( जा० सं० ) । २-१०,

४, १ और ८ भाव में शुभ ग्रह हो पाप ग्रह से दृष्ट हो तो शूल पात से मृत्यु हो

( जा० पा० )। ३-क्षीण चंद्र त्रिकोण या लाभ में पाप युक्त हो तो शूली से मृत्य हो ।

फाँसी से, अग्नि से, गिरने से मृत्यु--१-जन्म में शुभ ग्रह के बीच अष्टम भाव

'मे चंद्र हो तो गिरने से, फाँसी से व अग्नि से मृत्यु हो ( जा० भ० )। २-चंद्र पाप

ग्रह के बीच शनि की राशि मे! हो तो फाँसी से व आग मे गिरने से मृत्यु हो

( वृ० जा० ) ।

शूली से या पर्वत से गिरने से मृत्यु--१-चतुर्थ मे मङ्गठ, दशम मे सूर्य या

शनि हो तो शूली या पर्वत से गिरने से मृत्यु हो ।

दुर्मरण विष बंधन आदि या गिरने से--१-चंद्रमा ६,८,१२ मे कहीं हो लग्नेश

से दृष्ट हो और शनि राहु केतु से युक्त हो तो उसका दुमंरण हो अर्थात्‌ ऊँचे से गिरने

बंधन आदि व विष्चिका से मरण हो १-शनि नीच शत्रु मूढ अंशक मे पाप युक्त दृष्ट

हो क्रूर षष्ठचंश में होवे तो दुमंरण हो ( स० चि० )।