सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीरोगता : ३२७
हो तो कातर नेत्र (बुदबुदाकार) हों (शंमु०) ।
र पयली चन्द्रमा वक्र ग्रह की राशि में या ६,१२ भाव में हो तो टेढ़ी दृष्टि हो
शभु० A
३९--कारक ओर भावेश दो शूभ ग्रह हों उन पर पाप ग्रहों की दृष्टि न हो
शुभ दृष्टि न हो छूर दृष्टि हो (स० चि०)।
४०--सूर्य नवम पंचम में हो पाप ग्रह से दृष्टि हो उसके नेत्र मंद रहें पुष्ट न हो
अर्थात् मंद दृष्टि रहे (वृ० जा०) ।
४१--धन व्यय भाव में शुक्र या मंगल हो वहाँ चन्द्र भी हो तो नेत्र दोष कारक
हो (शंभु०) ।
४२--क्षीण चन्द्र ककं में हो उत पर शनि की दृष्ट हो या दशवें सातवें स्थित
पाप ग्रह की दृष्टि हो शुक्र की दृष्टि न हो तो छोटे नेत्र वाला या अल्प दृष्टि वाला
हो (जा ० लं०)।
४३--सूर्य के आगे मंगल गया हो तो उसके नेत्र कांति रहित हों अर्थात् माई से
छाये रहते हैं । (ज!० लं०) 1
४४--पष्ठेश वक्री ग्रह के साथ हो तो नेत्र रोग हो (शंभु०) 1
४५--लग्न में शनि से दुष्ट, मंगल व गुरु अथवा शुक्र बुध चन्द्र सहित हो तो
उष्णता से या शोक या काम विकार हो या शस्त्र से नेत्र रोग हो (शंभु०) ।
४६--धन या व्यय स्थान में चन्द्र मंगळ हो तो नेत्र दोष हो ।
४७-_व्यय भाव में शुक्र हो तो नेत्र पीड़ा हो (जा० सं०)।
रताँध १--शुक्र चन्द्रमा युक्त द्वितीयेश लग्न में हो तो रात्र्यंध हो (जा० पारि०)।
यदि द्वितीयेश उच्च ग्रह ओर शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो यह रोग न हो अर्थात् नेत्र
अच्छे रहें (जा० पारि०) । ९
२--सिह लग्न में सूर्य हो तो रतोंध का रोग हो (जा० पारि०) ।
३--चन्द्र सहित शुक्र ६,८.१२ भाव में हो तो रात्रि में अंधा हो (जा० सं०) ।
४- शुक्र चन्द्र और द्वितीयेश तीनों एकत्र हों तो निशांध हो (जा० पारि०) ।
५-जन्म में सूर्य और बुध त्रिक स्थानों मे हो तो रात्र्यंध हो ( शभु० ) ।
६-हीन बली सूर्य वक्री ग्रह की राशि में हो। या मंगल में आक्रांत कक राशि
में चन्द्र हो या धन के अंत्य नवांश में हो तो अंधा योग है सूर्य की दृष्टि हो तो
रात्रि अंध, शनि की दृष्टि हो तो दिवा अघ होता है ( शंभु० ) ।
जन्म से अंधा १-सूर्ण और शुक्रदोनों से युक्त होकर लग्नेश मिक में हो तो जन्म
से अंधा हो ।
इसी प्रकार इतर जनों का विचार करना जैसे
दशमेश सूर्य शुक्र युक्त दशम भाव से निक ह हो-पिता जन्मांध ।
तृतीयेश सूर्य शुक्र युक्त तीसरे भाव से त्रिक मे हो-भाई जन्मांध ।