सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ * सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
चतुर्थेश सूर्य शुक्र युक्त चतुर्थ भाव से त्रिक में हो-माता जन्मांध ।
पंचमेश सूर्य श् क्र युक्त पाचवे भाव से त्रिक में हो-पुत्र जन्मांध ।
सप्तमेश सूर्य शुक्र युक्त सातवें भाव से त्रिक में हो-स्त्री जन्मांध (जा० लं०) ।
२--एक और २ स्थान के स्वामी किसी स्थान में चन्द्र के साथ ६, ८, १२ भाव
में हों या १.२,७ स्थान में चन्द्र सूर्य [स्थत हों, शनि और मंगल से दृष्ट हों ।
३-२ स्थान में शनि और ६ स्थान में लग्नेश हो ओर व्यय स्थान स्थित तीन
ग्रहों से दृष्ट हो या इनके साथ स्थित हो ( ज्यो० शा० ) ।
४-द्वितीयेश सूर्य शुक्र और लग्नेश युक्त हो तो जन्मांध हो तथा ६,८,१२ भाव
में हो तो भो उपरोक्त फल (स० चिं०) ।
वा के साथ सूर्ण हो ओर द्वितीयेश दुष्ट स्थान में हो तो जन्मांध हो
स० चि० )।
६-सिंह लग्न में जन्म हो उसमें शनि हो तो नेत्रहीन हो यदि शुक्र हो तो जन्मांध हो (मान०) ।
७-सूर्य शुक्र से युक्त हो तो जन्म से अंधा हो (जा० ल०) ।
अंधा १-सिंह लग्न में सूयं चन्द्र हो उन्हें शनि मंगल देखे तो अंधा हो(जा०पारि०) __ २--सूयं मंगल शनि चन्द्र २,६,८,१२ भाव में हो तो अपने बली ग्रह के धातु दोष से अंधा हो (शंभू । '
३--सूर्य लान में,चन्द्र द्वादश भाव में शुभ दृष्टि रहित हो तो अधा हो (जैमिनी): ४--पंचम चतुर्थ में पाप ग्रह हो विशेषतः चन्द्रमा,८,१२भाव में हो तो अंधा हो इन पर पाप॑ दृष्टि हो तो अंधा हो शुभ दृष्टि होने से दोष नहीं है (स० चि०) । #--भाप ग्रह ४ या ५ घर में हो और चन्द्र ६,८,१२ भाव में हो तो अंधापन हो कोई शुभ दृष्टि न हो और पाप दृष्टि हो तो निश्चय अंधापन हो (स० चि०) । ६-“छग्न में सूर्य राहु ग्रह न हो और ५;९ भाव में पाप ग्रह शनि मंगल हो तो अंधा हो (बृ० जा०) ।
७-लग्न से चतुर्थ में शनि कूर ग्रहों से दृष्ट हो तो अधा हो (जा० छ०) । ८-<-लग्न से दूसरे घर में सूर्यं हो तो अंधा हो (मान०) । ९--सूर्य चन्द्रमा तीसरे भाव या केन्द्र में हो, मंगल केन्द्र में हो या पाप राशि में पाप ग्रह से दृष्ट हो । ६८,१२ भाव में शुभ ग्रह, सूर्यं दशम में ही तो अंधा हो(शंभु) । १०-सूर्य मंगल व शनि ये ८, ६, २, या १२ स्थान में क्रम से हो तो अंधा हो (वृ० जा०) ।
११--सूर्ये नवम पञ्चम स्थान में हो पाप ग्रह की दृष्टि हो (वृ० जा०) । १२-छन्न में चन्द्र ग्रहण युक्त हो तो आँख का गढा नष्ट हो (जा० लं०) । १३-सूयं व चन्द्र वारहवें व छठे स्थान में हो तो नेत्र नष्ट हो (आ० छं२) । १४--सूर्य ओर चन्द्र दोनों बारहवें भाव में दृष्टि रहित हो तो दोनों आंख से अंधा हो (जा० पारि०) ।