सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
के पाप ग्रह बलवान् हों तो वह फौज का स्वामी, पुलिस कप्तान या जेल का ओहदे-
दार या चोर आदि का स्वामी होकर बड़ी सम्पत्ति वाळा हो ( प्रा० यो० )।
७४-उदय को प्राप्त स्वोच्च का ग्रह केन्द्र में हो तो राजा के समान प्रतापी हो
( जा० लं० ) ।
५37० में शुभ ग्रह और अष्टम में पाप ग्रह हो तो सवं सिद्धि प्राप्त हो राजाओं
में मान हो (जा० ळ॑० ) 1
७६-केन्द्र या त्रिकोण के स्वामियों का योग एक ही भाव में हो तो राजयोग
होता है । या वे परस्पर एक दुसरे से सम्बन्ध स्थापित करते हों या वे परस्पर स्थान
में हों तो राजयोग होता है परन्तु ३,११ या ६,८,१२ भाव के भावेश से इनका
सम्बन्ध न हो । यदि इनके भावेश केन्द्र में हों तो हानि नहीं है (ज्यो० रह०)।
७७-चारों केन्द्र में शुभ और पाप ग्रह दोनों हों तो राज्य और धन देते हैं
(ल० चं०) । र
गुरु ;
७८-उच्च का गुरु हो मेष लग्न में बुध हो तो राजा हो ( जा० पारि० ) ।
७९-उच्च का गुरु, केन्द्र में हो, दशम में शुक्र हो तो चक्रवर्ती राजा हो जिसका
सिक्का चले (शंभु०) ॥
८०-उच्चराशि में या स्वगृही गुरु शुक्र केन्द्र या त्रिकोण में हों तो राज कुछ:
का राजा हो अन्य कुल में उत्पन्न मंत्री हो (जा०भ०) ।
८१-गुरु, शुक्र, बुध या चन्द्र में से एक भी उच्च का हो पर द्वितीय भाव में हो
तो राजयोग होता है (वृ० जा०) ।
८२-उच्च का गुरु केन्द्र या त्रिकोण में हो चन्द्र बुध शुक्र इनसे युक्त या दृष्ट हो
तो शत्रु को जीतने वाला चक्रवर्ती राजा हो (जा० सं०) ।
८३-उच्च का गुरु लग्न में हो, मेष को सूर्य हो और शनि बुध शुक्र ग्यारहवेँ
भाव में हों तो वह बलवान् राजा होता है (जा० भ०) ।
घ४-उच्च का गुरु शुक्र सूर्यं हो चन्द्र भी उच्च राशि गत शनि से दुष्ट हो तो
राजा हो (जा० भ०) ।
८५-गुरु शुक्र या बुध इनमें एक भी उच्च में हो और अन्य शुभ ग्रह केन्द्र में हों
तो निश्चय राजा हो (बु० पा०) ।
८६-नीच का गुरु लग्न या अष्टम में हो और नवमेश पारावतांश में हो तो राजाओं का राजा कुवेर सम होवे (स० चि०) ।
८७-छरन में नीच का गुरु हो अष्टम भाव पाप ग्रह युक्त हो और उस अष्टम भाव के नवांश से युक्त हो तो राजाधिराज हो जंसे.मकर लग्न में तृतीय नवांश में गुरु हो, अष्टम भाव में तृतीय नवांश गत सूर्य हो तो वह राजयोग होगा (जा.पारि.)। : ८८-गुरु नीचांश में न हो, चन्द्रमा उत्तरांश में हो, सूर्यं शुभ षष्ठ्धंश मे हो तो , राजा के तुल्य हो (स० चि०)।