भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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राजयोग : ३७७

३८७--दशम में शुभ ग्रह की दृष्टि हो या दशमेश शनि युक्‍त हो तो भी उपर -रोषत फल हो (स. चिं.) । ३८८--दशमेश का नवांशेश शनि युवत हो या किसी केन्द्र में हो तो दास दासियों पर हुकूमत करे (स. चिं) । ३८९~-शनि या राहु दशम में हो नवमेश से दृष्ट हो, लग्नेश नीच ग्रह के साथ हो तो राजा के बरावर हो (स. चिं.) । टिप्पणी--३८० और ३८९ में लग्नेश के विषय में एक मत कहता है नीच ग्रह युक्‍त न हो दूसरा मत कहता है नीच ग्रह युक्त हो इससे नीच ग्रह युक्त न हो ऐसा पाठ ठीक है । राहु के योग (उपरोक्त के अतिरिक्त) ३९०--उच्च का राहु हो तो हाथी घोड़ा नौकर चाकर जमीन आदि युवत बड़ा पंडित हो अपने कुल में उच्च हो (मान.) । ३९१--छरन में उच्च का राहु हो तो कुल दीपक हो (जा. सं.) । ३९२--राहु या केतु दशम या अष्टम में हो नवमेश नीच राशि में हो कूर आज्ञा वाला हाकिम हो (स. चि.) । हू ३९२--राहु दशम में मांदि युक्त हो या मांदि दशम में हो राहु केतु अष्टम हो और नवमेश नीच में हो तो क्रूर आज्ञा देने वाला हो (स. चिं.) । २९४-२,४,५,६ राशि में राहु हो वह बहुत लक्ष्मी सम्पन्न राजाधिराज हो(मान.) । २९५--२,४,६,१० राशि में राहु हो वह बहुत लक्ष्मीवान्‌ या राज्य का स्वामी, पृथ्वी नौका वाहन युक्त बुद्धिमान्‌ कुळ दीपक हो (जैमिनि)।

` ३९६--१,३,६ राशि का राहु केन्द्र त्रिकोण या ६,८,१२ भाव में हो वह कामी, शूर, वलवान्‌ भोगी, हाथी घोड़े छत्र वाला बहु पुत्र वाला हो (जा. सं.) ।

३९७-सप्तम घर में मेष या कन्या राशि हो केन्द्र या त्रिकोण या ८,१२ घर में

राहु हो तो बड़ा कामी शूर बलवान्‌ योगी, हाथी घोड़े छत्र युक्त हो अनेक पुत्र हों

मान०) ।

॥ ३९८--अन्य मत है कि राजयोग के विचार में राहु केतु का कोई विचार नहीं करना (ज्यो. रह.)

लग्नेश के राजयोग ( उपरोक्त के अतिरिक्त )

३९९--छग्नेश केन्द्र या नवम भाव में वर्गोत्तम नवांश में हो, नवमेश अपने

उच्च का या स्वक्षेत्री हो और इसी प्रकार अंश प्राप्त करे तो राजा हो । स्वर्ण के

वाहन में हाथी पर बैठे चेंवर डुले (फल.) ।

४००--लग्नेश बली होकर केन्द्र में हो तो राजयोग करता है वह मित्र ग्रह से

दुष्ट हो तो नीच वंश में उत्पन्न भी राजा हो, राजा से पुजने वाला हो (जा. पारि.) ।

४०१--छग्नेश केन्द्र में हो शत्रु, गृही या अस्त न हो, अन्य ग्रह से युत न हो तो

सावं भौम राजा हो (जा. पारि.) 1