भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 454 में से

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पृष्ठ 388

३७८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

४०२--लग्नेश और जन्म राशीश बली होकर केन्द्र में हो तो नीच कुल में भी उत्पन्न, उदार पवित्र राजा हो (जा. भ०) ।

४०३--लग्नेश बली होकर लग्न में, केन्द्र त्रिकोण या ळाभ में हो तो राजा हो उत्तम शील वैभव युक्त हाथी और वाहनयुक्त, नीच कुछ में भी हो तो विभूति युक्त हो (मान.) ।

४०४--लग्तेश या कारक पञ्चमेश युक्त केन्द्र त्रिकोण में हो तो वह राजा का मित्र होता है (वू, पा.) ।

४०५--लग्नेश केन्द्र मों हो दशमेश केन्द्र चतुर्थ में हो नवमेश लाभ में हो तो दीर्घं जीवी राजा हो (जा. पारि.) । ४०६--छग्नेश मित्र गृही केन्द्र में मित्र ग्रह से दृष्ट हो तो शत्रू ओं को नाश करने वाला शुभ प्रताप को करता है (जा. सं.) ।

४०७--लग्नेश की दृष्टि लग्न पर हो लग्न में सिंह राशि हो तो सम्राट हो ४०८--ल्ग्नेश लग्न में, द्वितीयेश घन भाव में, चतुर्थेश चतुर्थ में हो या नवमेश भी लग्न में हो हाथी या गद्दी प्राप्त हो (जा. लं.) ।

४०९--लग्नेश स्वगृही या उच्च का होकर लग्न को देखता हो और ३,६,८ घर में अपने-अपने नीच के ग्रह हों तो राजा हो (वृ. पा.) । ४१०--लग्नेश स्वगृही या उच्च का होकर लग्न को देखता हो ६,८,१२ के भावेश नीच, शन्‌, गृही या अस्त हों तो राजयोग होता है (वृ. पा.) 1 ४११--लग्नेश उच्च का हो, नीच या शत्रु, नवांश में हो और केन्द्र में कोई ग्रह न हो राजा हो (जा. पारि.) । पा ४१२--छग्नेश ओर धनेश धन भाव में हो तो करोड़ पति हो (जेमिनि) अन्य- मतलग्नेश या धनेश धन भाव में हो तो करोड़पति हो ।

४१३--छग्नेश पञ्चमेश नवमेश युक्त १५४,१० भाव में हो तो राजवंशी राजा हो (मध्य परा.) ।

४१४--लग्नेश मित्र ग्रह युक्त या मित्र ग्रृही होकर ३,७ भाव में आ पड़े तो सब भुमंडळ का शत्र रहित राजा हो (मान०) । ४१५--लग्नेशे पञ्चम में हो पंचमेश लग्न में हो आत्म कारक और पुत्र कारक दोनों लग्न या पंचम में हों (कारकांश या उससे पंचम में हो) अपने उच्च राशि या नवांश में तथा शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो यह महाराज योग होता है इसमे विख्यात और सुखी होता है (वृ. पा.) । ४१६--ऊभनेश स्वक्षेत्री होकर दशम में हो तो उसे राज मंडल में सेवित करता है राजा लोग सेवा करें । सेनायुक्त देवताओं में इन्द्र के समान हो (जा. स.) । ४१७--१,४,१० के भावेश दशम में हों, दशमेश यदि लग्न का सम्बन्धी होतो सिंहासन का स्वामी हो (जा. पारि.) ।

४१८--१,४,९ के भावेश अस्त न हों दशम हों दशमेश लग्न में हो तो राजकीय

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