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भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 454 में से

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पृष्ठ 389

राजयोग : ३७९.

शक्ति प्राप्त हो जिससे सिंहासन मिले (स. चि) ।

४१९--१,४,९ के भावेश दशम में हों दशमेश लग्न में हो वलग्न को देखता होः

तो सिंहासन मिले (जा. पारि.) ।

४२०--लग्नेश ओर दशमेश यदि परस्पर स्थान में हों या दोनों एक ही साथ

लग्न या दशम में हों तो दोनों प्रकार से राजयोग होता है जगत प्रसिद्ध और विजयी

हो । लग्नेश या जिस भावेश से सम्बन्ध हो उसी प्रकार फल होगा (म. प.) ।

४२१--छग्नेश, चतुर्थेश, चञ्चमेश दशमेश किसी भी भाव में हो परन्तु इनमें से

कोई नवमेश के साथ हो तो राजयुक्त बहुत वाहनों से युक्त हो अपने प्रताप से समस्त

पृथ्वी व्याप्त करता है (म० प०) 1

४२२--१,४,६,७,९,१२ भाव के स्वामी सुखेश युक्त हो तो असंख्य देशों को

प्राप्त करे (जा० पारि०) ।

४२३--लग्नेश चतुर्थेश युक्त इष्ट हों तो धन वाहन का स्वामी हो (जा. पारि.) 1

४२४--१,४,९ के भावेश वाहन का कारक एक साथ हो तो सिंहासन मिले (प्रा० यो०) ।

४२५--लग्नेश चन्द्र से उपचय में हो शुभ ग्रह युक्त या शुभग्रह के नवांश में हो

तो इन्द्र के समान राजा हो (जा० पारि०) ।

४२६--लग्नेश शुभग्रह से दृष्ट हो और पापग्रह ३,६,११ भाव में हो तो पूजनीय

तेजस्वी राजा हो (जा० पारि०) ।

४२७--लग्नेश बली होकर पूर्ण चंद्र से दृष्ट हो तो वह शत्रुओं को जीतने वाला

राजा होता है (शंभू०) ।

४२८--लग्नेश शुभग्रह हो शुभग्रह से युक्त दृष्ट हो या शुभांशक में हो तो दूसरों कोः

आज्ञा देने वाला हाकिम होता है (स चि०)।

४२९--लग्नेश से ३,६ या ११ घर में पापग्रह हो तो राजयोग प्राप्त हो (फल.)

४३० --लग्नेश या कारक से २,४,१ भाव शुभग्रह युत हो तो राजा हों (यू.पा.) ।

४३१--लग्नेश या कारक में ३,६ भाव में पापग्रह हो ता राजा हो (वृ०पा०) ।

शुभ प्राप मिश्रित हो ता धनवान्‌ हा (वृ० पा०) ।

४३२---लग्नेश चर राशि चर नवांश में हा, लग्न चर राशि हा, नवमेश भी चर

राशि में हा ता राजयोग हा वह परदेश में जाकर राजा हा (स० चि०)।

४३३--लग्नेश की राशि का नवांशेश जिस घर में हा उस राशि का नवांश

` स्वामी यदि शक्तिशाली होकर सर्वोच्च विशेषिक अंश में हा ओर द्वितीयेश हा जावे

तो यह राजा हो । गृण में गुरु के समौन हो (स० चिं०)।

मान लो वृष लग्न है तो लग्नेश शुक्र हुआ लग्न कुण्डली में यह अष्टम में घनु

का है जिसका स्वामी गुरु है ! अब नवांश कुण्डली में देखा तो यह अष्टमेश गुरु लग्न

में मेष का है ता यह गुरु मंगल के घर में है यहाँ बताया है यदि यह मंगल उच्च

आदि में होकर दूसरे स्थान का स्वामी हो जावे तो उक्त फल होगा ।