सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
राजयोग : ३७९.
शक्ति प्राप्त हो जिससे सिंहासन मिले (स. चि) ।
४१९--१,४,९ के भावेश दशम में हों दशमेश लग्न में हो वलग्न को देखता होः
तो सिंहासन मिले (जा. पारि.) ।
४२०--लग्नेश ओर दशमेश यदि परस्पर स्थान में हों या दोनों एक ही साथ
लग्न या दशम में हों तो दोनों प्रकार से राजयोग होता है जगत प्रसिद्ध और विजयी
हो । लग्नेश या जिस भावेश से सम्बन्ध हो उसी प्रकार फल होगा (म. प.) ।
४२१--छग्नेश, चतुर्थेश, चञ्चमेश दशमेश किसी भी भाव में हो परन्तु इनमें से
कोई नवमेश के साथ हो तो राजयुक्त बहुत वाहनों से युक्त हो अपने प्रताप से समस्त
पृथ्वी व्याप्त करता है (म० प०) 1
४२२--१,४,६,७,९,१२ भाव के स्वामी सुखेश युक्त हो तो असंख्य देशों को
प्राप्त करे (जा० पारि०) ।
४२३--लग्नेश चतुर्थेश युक्त इष्ट हों तो धन वाहन का स्वामी हो (जा. पारि.) 1
४२४--१,४,९ के भावेश वाहन का कारक एक साथ हो तो सिंहासन मिले (प्रा० यो०) ।
४२५--लग्नेश चन्द्र से उपचय में हो शुभ ग्रह युक्त या शुभग्रह के नवांश में हो
तो इन्द्र के समान राजा हो (जा० पारि०) ।
४२६--लग्नेश शुभग्रह से दृष्ट हो और पापग्रह ३,६,११ भाव में हो तो पूजनीय
तेजस्वी राजा हो (जा० पारि०) ।
४२७--लग्नेश बली होकर पूर्ण चंद्र से दृष्ट हो तो वह शत्रुओं को जीतने वाला
राजा होता है (शंभू०) ।
४२८--लग्नेश शुभग्रह हो शुभग्रह से युक्त दृष्ट हो या शुभांशक में हो तो दूसरों कोः
आज्ञा देने वाला हाकिम होता है (स चि०)।
४२९--लग्नेश से ३,६ या ११ घर में पापग्रह हो तो राजयोग प्राप्त हो (फल.)
४३० --लग्नेश या कारक से २,४,१ भाव शुभग्रह युत हो तो राजा हों (यू.पा.) ।
४३१--लग्नेश या कारक में ३,६ भाव में पापग्रह हो ता राजा हो (वृ०पा०) ।
शुभ प्राप मिश्रित हो ता धनवान् हा (वृ० पा०) ।
४३२---लग्नेश चर राशि चर नवांश में हा, लग्न चर राशि हा, नवमेश भी चर
राशि में हा ता राजयोग हा वह परदेश में जाकर राजा हा (स० चि०)।
४३३--लग्नेश की राशि का नवांशेश जिस घर में हा उस राशि का नवांश
` स्वामी यदि शक्तिशाली होकर सर्वोच्च विशेषिक अंश में हा ओर द्वितीयेश हा जावे
तो यह राजा हो । गृण में गुरु के समौन हो (स० चिं०)।
मान लो वृष लग्न है तो लग्नेश शुक्र हुआ लग्न कुण्डली में यह अष्टम में घनु
का है जिसका स्वामी गुरु है ! अब नवांश कुण्डली में देखा तो यह अष्टमेश गुरु लग्न
में मेष का है ता यह गुरु मंगल के घर में है यहाँ बताया है यदि यह मंगल उच्च
आदि में होकर दूसरे स्थान का स्वामी हो जावे तो उक्त फल होगा ।
८ ३८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
ह्वितीयेश से राजयोग (उपरोक्त के अतिरिक्त)
४३४--दितीयेश बळी होकर केन्द्र में हो, चतुर्थेश लर्न या चतुर्थ में हो, उच्च का शुभग्रह नवम में हो ता राजगद्दी पर बैठे (स० चिं०) । ४३४--केन्द्र में द्वितीयेश सहित शुभग्रह हो यां उच्च का ग्रह घन स्थान में हो और नवम स्थान शुभ दृष्ट हो तो सिंहासन प्राप्त हो.(स० चिं०) । ४३६--द्वितीयेश केन्द्र में हो, लग्न व केन्द्र में शुभग्रह हो, नवम में उच्च का अह हो तो सिंहासन प्राप्त हो (जा० पारि०) ।
४३७--द्वितीयेश उच्च का केन्द्र में हो, लन में बली सौम्य ग्रह हों नवम में भी शुभग्रह हो तो सिंहासन प्राप्त हो (स० चिं०) । - .. ४३८--द्वितीयेश अपने उच्च या मूल त्रिकोण का लाभ या त्रिकोण में हो लग्नेश चली हो जिस राशि में द्वितीयेश है उसका स्वामी केद्र में हो ता राजा हो (स०चि० ) ४३९--द्वितीयेश तीसरे भाव में शुभग्रह की राशि में या अपने उच्च में हो, शुभ अह तथा पुरुष ग्रह सूर्य मंगळ गुरु से दृष्ट हो ता राजा हो (स० चिं०) । चतुर्थेश के राजयोग (उपरोक्त के अतिरिक्त)
४४०--चतुर्थेश और दशमेश उच्च में हों या स्वगृही या मित्रगृही हों तो उसके कई राजयोग होते हैं (ज्यो० रह०) । | ४४१--चतुर्थेश चतुर्थ में हो शुभग्रह से युक्त या दुष्ट हो नवमेश युक्त हो ता साधारण राजा या बड़ा धनी हो । राजद्वार से अधिकार प्राप्त हो (प्रा० यो०) । ४४२--चतुर्थेश लग्न में हो गुरु से दृष्ट हो तो राजाओं का पूज्य हो (जा.लं.) । ४४२--चतुथेश ग्रह, चतुर्थं भावगत ग्रह, नवमेश ओर नवम भावगत ग्रह चारों बलो हों तो दीर्घायु सुखी, तेजस्वी, चतुरंग सवारी, विपुल लक्ष्मी और राजचिह्व से अंकित राजा हो (जा० पारि०) ।
४४४ “बली चतुर्थेश मंगल की राशि (१,५) में हो तो राज्य, घन, सुख, मणि, वाहन आदि प्राप्त हो (स० चि०)। ` ४४५--चतुर्थेश, चतुर्थ या लाम में हो व उन स्थानों में मंगल की राशि हो तो राज्य प्राप्त हो (जा. पारि.) । ४४६--चतुर्थेश शुभग्रह मुक्त दशम मेंहो तो चामर छत्र से युक्त राजा हो (जा० पारि०) ।
४४७--चतुर्थेश दशम में, दशमेश चतुर्थं में हो उस पर पञ्चमेश या नवमेश की दृष्टि हो तो राजा हो (वृ० पा०)। ४४८--चतुर्थेश या दशमेश यदि पंचमेश या नवमेश से युक्त हो तो राज हो (वृ० पार) । ४४९ --चतुर्थेश, पंचमेश और दशमेश एक स्थान में हो, नवमेश से दृष्ट हो तो अन्य कुल में भी जन्मा राजा हो (म० प०) ।
राजयोग : ३८१
४५ ०--धतुर्थेश और दशमस्थ ग्रह वली हो नवमेश से युक्त या दृष्ट हो या परस्पर ग्रह हों तो दोनों योग सिंहासन प्राप्त कराने वाले है (जा० पारि०) 1 पंचमेश के राज योग ( उपरोक्त के अतिरिक्त )
४५१-- पंचमेश नवम में हो नवमेश पंचम में हो दोनों की परस्पर दृष्टि हो तो बड़ा राज्य का भागी हो (म० प०)। ४५२--पंचमेश नवमेश की परस्पर दृष्टि हो या दोनों कहीं भी एक स्थान में हों या परस्पर सप्तम स्थान में हों तो राजा हो (वृ० पा० )1 ४५३--पंचमेश यदि लग्नेश या नवमेश युक्त १, ४, १० भाव में हो तो राजा हो (चु० पा०) ।
षष्ठेश के योग ( पूर्वोक्त के अतिरिक्त )
४५४-६, ९, ११ और १२ के भावेश एक दूसरे के घर में हों तो अच्छा राज योग होता है (स० चि०)।
४५५--षष्ठेश दशम में, दशमेश शनि युक्त हो या केन्द्र त्रिकोण में हो तो बहुत दास दासी हों (स० चि०) ।
नवमेश के योग ( उपरोक्त के अतिरिक्त )
४५६--छग्न, नवम या दशम भाव से नदमेश और दशमेश युक्त हो और अन्यान्य राशि ( परस्पर एक दूसरे की राशि में ) स्थित हो या परस्पर केन्द्र में हो .या परस्पर दृष्टि हो द्वितीयेश के सम्बन्धी हों तो बहु धनी हो (जा० पा०) ।
४५७--नवमेश ओर दशमेश का परिवर्तन हो (एक दूसरे की राशि में हों) और दुष्ट राशियों का भी परिवर्तन हो तो राज योग होता है (ज्यो० शा ) 1 ३, ६, ८, ११, १२ भाव ये दुष्ट स्थान हैं ग्रहों के द्विस्थानाधिपत्य होने से इन दुष्ट स्थानों के भी स्वामी हो जाय तो राजयोग होता है परन्तु परस्पर परिवर्तन न हो तो ह्विस्थानाधिपत्य दोष से राज योग नष्ट हो जाता. है ।
४५८--नवमेश केन्द्र में होकर उच्च के अंश में हो और कोई दो और ग्रह उच्च में हों तो उसके अधिकार में कई वाहन और देश रहें राजा हो (स० चि०)। -
४५९--नवमेश, दशमेश यदि दशम में हो तो राजयोग होता है (ज्यो०्शा० )1 ४६०--नवमेश जहाँ हो उसका नवांशेश, पांचवें या चौथे भाव में हो तो राजा हो (जा० पा०) ।
४६१--नवमेश लग्न में हो गुरु से दुष्ट हो तो राजा हो (जा० सं०) ।
४६२--नवमेश द्वितीय भाव में हो ओर अपने ग्रह को देखता हो तो सवं सम्पदा से युक्त पृथ्वीपति होता है (जा० सं०) ।
४६३--नवमेश और आत्मकारक दोनों १, ५, ७ भाव में शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट | हो तो राजयोग होता है (वृ० पा०) ।
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३८२ : सचि ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
दशमेश के योग
४६४--दशमेश नवम में नवमेश दशम में हो तो राजा हो अपने जनों से मान
पावे (फल०) ।
४६५--दशमेश केन्द्र त्रिकोण या धन भाव में हो तो राज सिंहासन में बैठने
वाळा विख्यात कीति हाथियों से परिपूर्ण हो (जा० स०) ।
४६६--दशमेश केन्द्र में हो शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट हो शुभ षष्ठ्यंश में होवे तो
वह सौम्य आज्ञां देने वाला अधिकारी हो (स० चिं०) ।
४६७- केन्द्र में दशमेश शुभ युक्त या दृष्ट हो और क्रूर षष्ठ्यांश में हो तो
कठोर आज्ञा देने वाला हो (स०'चिं०) ।
४६८--दशमेश शुभ हो शुभ युक्त या दृष्ट होकर शुभ नवांश में हो तो दूसरों
को हुक्म देने वाला हो (स० चिं०) ।
४६९--दशमेश अष्टम में उच्च स्व राशि व मित्र नवांश का या पारावतांश में
होवे तो राज योग होता है (स० चिं०) ।
४७०--दशमेश उच्च या मित्र नवांश में होकर नवम घर में हो और पाराव-
'तांश में हो तो राजाओं के बीच मुखिया हो (स. चिं.) ।
४७१--दशमेश उच्च का होकर लग्न. को देखता हो तो राज योग होता है
(वृ० पा०) । ४७२--दशमेश पाप युक्त हो ओर लग्न से-६ भाव तक क्रम से ग्रह हों तो
राजेश्वर हो (स० चि०) ।
४७३--दशमेश से पहिले ६ घर में सब ग्रह हों ये लग्न से ६ घर में हों तो
राजाओं का राजा हो ( स० चि० ) अर्थात् लग्न से ६ घर के भीतर दशमेश कहीं हो
और उससे ६ घर के भीतर से ग्रह हो तब यह योग होगा । लग्न में दशमेश हो और
सब ग्रह उससे ६ घर के भीतर हों तभी यह वनता है।
लाभेश के योग
४७४ छाभेश लाभ में हो पाप ग्रह से अदृष्ट हो या आत्म कारक केवल शुभ
ग्रह से युक्त हो तो राजा से घन प्राप्त हो ( वृ० पा० ) ।
४७५ छाभेशे की दृष्टि लाभ पर हो दशम भाव में पाप ग्रह का योग दृष्टि न
हो तो राजमंत्री हो ( वृ० पा० ) ।
लग्न के योग
४७६-छग्न उत्तमांश में हो और चन्द्र को छोड़कर अन्य ४ या अधिक ग्रहों से
दृष्ट हो तो राजा हो ( वु० पा० ) ।
४७७--लग्न पर सब ग्रहों की दृष्टि हो जो सब प्रकार शुद्ध हों तो बड़े-बड़े
राजा कोश रत्नों की भेंट करे, निर्भय हो, राजाओं का मुकुटमणि हो ( मान० ) ।
४७८--छर्न को सब बली ग्रह देखते हों तो भय रहित दीर्घायु सुखी घनयुक्त
राजा हो ( वू० पा० )।
राजयोग : ३८३
४७९--जन्म लग्न, होरा लग्न और घटी लग्न इन तीनों पर किसी एक ग्रह की दुष्टि हो तो राजा हो ।
घटी लग्न---(इष्ट घटी+जन्म लग्न) -- १२८-शेष पंच ग्रह घटी लग्न है (वृ.पा.) । ४८०--इन तीनों उपरोक्त लग्न और सप्तम भाव पर, राशि, नवांश और द्रेष्काण के वश एक ग्रह की दृष्टि से भी राजयोग होता है (जैमिनि०) । उनमें एक भी न्युन हो तो राजयोग न्युन होता है । इन तीनों को लग्न की नवांश कुण्डली और द्रेष्काण कुण्डली से भी विचारना । इन तीनों लग्न को उच्च स्थित एक भी ग्रह देखें तो राजयोग होता है । इन तीनों में से किसी दो को भी उच्च स्थित ग्रह देखे तो राजयोग होता है। इन तीनों में से किसी दो को भी उच्च स्थित ग्रह देखे तो राजयोग होता है। राशि, नवांश और द्रेष्काण इन तीनों को या राशि और नवांश के वश या "राशि और द्रेष्काण को एक ग्रह देखे तो राजयोग होता है ।
४८१--जन्म लग्न, होरा लग्न, घटी लग्न इन तीनों में उच्चस्थ ग्रहहो। या "लग्न, द्रेष्काण ओर लर्न का नवांश इन तीनों में उच्चस्थ ग्रह हो तो अवश्य राजयोग होता है ( वृ० पाए ) ॥
४८२-छग्न के नवांश राशि के केन्द्र में नीच स्थित ग्रह लग्न को देखे तो भी राजयोग होता है ( वृ० पा० ) ।
४८३--लग्न के नवांश राशि के केन्द्र में शुभ ग्रह हो तो सर्वाधिकार सभ्पन्न राजा हो ( वृ० पा० ) ।
४८४--नीच नवांश को छोड़कर ३ आदि ग्रह रवनवांश में हों उनमें से एक भी लग्न में हो तो राजा हो ( जा० पारि० )। .
४५५--जन्म लग्न में ३ शुभ ग्रह हों तो नम्रता युक्त राजा हो ( जा० भ० )।
४८६--२,४,१०,११ के भावेश लग्न को देखते हों पद से सप्तम स्थान पर शुक्र की दृष्टि हो पद में शुभ ग्रह हो तो राजयोग होता है ( बु० पा० )।
४८७--छग्न के होरादि षड़वर्ग किसी एक भी ग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो भी
राजयोग होता है । योग दृष्टि के अनुसार पूर्ण आधा या उससे कम फल का विचार
करना ( वृ पा० ) ।
४८८--लग्न या चतुर्थं भाव अपने स्वामी या अपने मित्र से दृष्ट हो तो अवश्य
सम्पत्ति वाला हो ( जैमिनि० ) ।
४८९--लगन में क्रूर ग्रह, व्यय भाव में शुभ ग्रह द्वितीय में पाप ग्रह हो तो राजा
हो ( जा० सं० ) ।
४९०--लग्न में क्रुर ग्रह व्यय में शुभ ग्रह द्वितीय में शुभ ग्रह हो तो राजयोग
होता है । इसमें राजा नहीं होता दाता और दरिद्री होता है ( छ० चं० ) । ४९१--१,२ भाव में शुभ ग्रह, ३ घर में पाप ग्रह, ४ भाव में शुभ ग्रह हो तो राजा हो या राजा के तुल्य हो ( बू० पा० ) ।
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३८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४९२--लग्न में शुभ ग्रह अष्टम में कूर ग्रह हो तो ध्वज योग होता है जातक श्रेष्ठ हो ( छ० चं० ) ।
४९३--जन्म ऊषा काल का हो या अभिजित काळ या गोधूलि या महानिशा में हो तो ग्वाल पुत्र भी राजा हो ( जॅमिनि० ) ।
४९४--मध्याल्न या अढ रात्रि के वाद २॥ घड़ी शुभ समय होता है उसमें जन्म
लेने वालो राजा होता है ( वृ० पा० ) ।
४९५--पाप ग्रह लग्न में हो गुरु से दृष्ट हो तो राजा हो ( जा० भ० ) । ४९६--लग्न में चर राशि हो लग्नेश चर राशि चर नवांशक में हो. तो प्रभाव
शाली राजा हो ( स० चि० ) ।
४९७--लग्न दशम या लाभ ही के सन्मुख सम्पूर्ण ग्रह हों तो कारक योग होता है इसमें नीच कुल का भी राज्य प्राप्त करे ( ल० पं० ) ।.
अन्य भाव के योग ४९८--लग्न से ६,८ स्थान में शुभ ग्रह हो पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट न हो तो बहु मंत्री या सेनापति या राजा होता है ( जँमिनि० ) ।
४९९--६,७,८, भाव में शुभ ग्रह हो पाप ग्रह से युक्त दुष्ट न हो तो छत्र वाला
राजा, दंड करने वाला, दीर्घायु, निर्भय, निरोग बहुत स्त्रियों का पति होता है (शंभु) ।
५००--ल्ग्न से अष्टम और व्यय में क्रूर ग्रह हो और बीच में. शुभ अशुभ ग्रह
हों तो वह राजयोग है महाराजा हो ( मान० ) ।
४० वर्ष जीता है राजयोग है (ल. चं.) ।
५०१--८,१२ भाव में कूर ग्रह हो दशम में एक क्रूर ग्रह एक शुभ ग्रह हों तो महाराजा हो (जा. स.) ।
५०२--पाप ग्रह ६,१० भाव में, शुभ प्रह ९,११ भाव में हो तो राजा हो (जा. पा.) ।
५०३--नवम भाव में सब शुभ ग्रह हों तो राज्यदाता हैं (जा. सं.) । ` ५०४-नवम में सब शुभ ग्रह हों शुभ ग्रह से दृष्ट हों तो शत्रुओं को जीतने वाला राजा हो ।
५०५--नवम भाव में बुध को छोड़कर ६,७ ग्रह हों तो राजा हो (जा. सं.) । _ ५०६--दशम स्थान में शुभ ग्रह स्वराशि में हो ओर शुभ दृष्ट हो तो अपने कुल में राजा या श्रेष्ठ अति उदार हो (शंभु) । ल , २०७--लाभ में ३ सौम्य ग्रह हों तो बड़ा राजा हो ३ पाप ग्रह हों तो दुःखी, दरिद्री शोक युक्त हो ।
,५०८--दशम और लाभ में शुभ ग्रह हो पाप ग्रह की राशि में चन्द्र हो तो राज- योग होता (जा. सं.) । ५०९--उपचय में सब. शुभ ग्रह हों पाप ग्रह लग्न या दशम में हों तो सम्पूर्ण शत्रू ओं को जीतने वाला क्रूर स्वभाव का राजा हो (जा. पारि.) । छ
राजयोग : ३८५
अन्य योग
५१०--सभी ग्रह चन्द्र के होरा में हों तो यशस्वी हो (जा. पारि.) । ५११-एक भी ग्रह स्वगृही या वर्गोत्तम हो और बलवान् मित्र ग्रह से दृष्ट हो तो राजा हो (जेमिनि) ।
४१२-२,३ ग्रह दिग्बल से पूर्ण हों तो राजवंशी राजा हो और विजयी हो (फल.) । ५१३--यदि शनि को छोड़कर ४,५ ग्रह दिग्वल पूर्ण हों तो साधारण कुल में भी उत्पन्न हुआ मनुष्य राजा हो (फल.) । न ५१४--यदि ५ आदि ग्रह स्वनवांश में हों तो वित्तवान् राजा हो (जा. पारि.) 7 ५१५--त्रिपुष्कर में उत्पन्न हुआ मनुष्य राजा होता है (शंभु) 1 त्रिपुष्कर योग--दिन-रविवार, मंगलवार, शनिवार, (मुहूतं चिता०) तिथि-भद्रा २,७,१२, नक्षत्र-विशाखा, कृतिका, पुनवंसु, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, पूर्व भाद्रपद । ५१६-जन्मकाल में उत्तर में वशिष्ठ ओर पश्चिम में शुक्र, गुरु पूर्व में, अगस्त दक्षिण में हो तो ऐसे समय उत्पन्न जातक धरती का स्वामी सप्ुद्र तक राजा हो (शंभु) कारक से राजयोग विचार
५१७--कारकांश और जन्म लग्न इन दोनों से राजयोग विचारना चाहिये । एक तो आत्म कारक और पुत्र कारक से, दूसरा लग्नेश और पंचमेश से । इन दोनों के परस्पर सम्बन्ध और बल के अनुसार ही .राज योग का. आधा या चतुर्थांश आदि फल समझना ।
५१८--आत्म कारक शुभ राशिया शुभ नवांश में हो तो धनवान् होता है (वृ. पा.) ।
५१९--कारकांश से केन्द्र में शुभ ग्रह हो तो राजा होता है (वृ, पा.) । ५२०--आत्म कारक से चतुर्थ में शुक्र और चन्द्र दोनों हो तो नगाड़ा आदि बाजे चामर आदि राज चिह्न होते हैं (जैमिनि) । : ५२१--आत्म कारक से २,४,५ भाव के राश्यादि तुल्य शुभ ग्रह के राश्यादि हो : तो राजा हो (जैमिनि) ।
५२२--आत्म कारक से ३,६ इन दोनों भावों के तुल्य दो पाप ग्रह के राश्यादि , हों तो राजा हो (ज॑मिनि)। |
५२३--आत्म कारक से, पद से, या लग्न से, ३,६ भाव में सब पाप ग्रह हों तो सेनापति हो (व्. पा.) ।
५२४--आत्म कारक अपनी राशि या उच्च में होकर केन्द्र त्रिकोण में नवमेश से युक्त या दृष्ट हो तो निश्चय राअमंत्री हो (वृ. पा.) । ; ५२५--आत्म कारक जन्म राशीश होकर शुभ प्रह के साथ लग्न में हो तो बह वृद्धावस्था में मंत्री हो (व्. पा.) । ) ५२६--जन्म लग्न से दशमेश यदि आत्म कारक राशीश या पंचमेश तथा आत्म कारक से युक्त हो तो राजमंत्रो हो (वृ. पा.) ।
(२५
३८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फित खण्ड
५२७--यदि आत्म कारक, अमात्य कारक से युक्त हो तो भी राजमंत्री हो
(वृ. पा.) ।
५२८--आत्म कारक बली, शुभ ग्रह से युक्त होकर अपने गृह या उच्च में हो
तो मंत्री हो (वृ. पा.) ।
५२९ आत्म कारक यदि १,५,९ भाव में हो तो भी राजमंत्री हो (वृ. पा.) ।
३०--आत्म कारक से केन्द्र या त्रिकोण में अमात्य कारक हो तो भी राजा का
कुपा पात्र होकर सुखी होकर राजमंत्री हो (वृ. पा.) ।
५३१--आत्म कारक नवम में हो या नवम भाव का पद लग्न में हो तो वह
निश्चय राजा का सम्बन्धी होता है (वृ० पा०)।
५३२--आत्म कारक से चतुर्थ भाव में शुक्र ओर चन्द्र हो तो राजचिह्लों से युक्त
राजा के बराबर सुख भोगने वाला हो (वृ० पा०)।
५३३--पुत्राद कारक वश से पुत्रादि का राजयोग विचारना अर्थात् पुत्रादि
कारकों में राजयोग बली हो तो पुत्रादि को भी राजयोग बली होता है ।.
५३४--कारकांश या उससे पञ्चम भाव या लग्न या लग्न पद में शुक्र हो उसपर
गुरु की या चन्द्र की योगदृष्टि हो तो राजा का सम्बन्धी हो (वृ० पा०) ।
५३५--शुभ ग्रह से युक्त कारक यदि ५,७,१० या ९ भाव में हो तो उसे राजा
के आश्रय से धन लाभ हो (वृ० पा०)।
५३६--कग्न का पद और सप्तम भाव का पद परस्पर केन्द्र में हो या ३,११ में
या ५,९ में हो तो निश्चय राजा हो सुखी हो (वृ० पा०) ।
५३७--लग्न पद या चन्द्र के साथ उच्च का ग्रह हो उसमें गुरु या शुक्र का योग
या किसी उच्चस्थ ग्रह का योग हो तो निश्चय राजा हो (वु० पा०) ।
५३८--या पद में चन्द्रमा हो और उससे दूसरे स्थान में गुरु हो तो भी राजयोग होता है (वृ० पा०) ।
५३९--पद में शुभ ग्रह और चन्द्रमा हो, द्वितीय स्थान में गुरु हो उनपर उच्च
अह की दृष्टि हो तो निश्चय राजा होता है (वृ० पा०) ।
४५४०--जेसे आत्मकारक से २,४,५ भाव का विचार बताया है उसी प्रकार
रूगनेश ओर सप्तमेश से भी विचारना अर्थात् लग्नेश सप्तमेश से २,४,५ इन भावों के
सुल्य शुभ ग्रह हो तो राजा होता है (जेमिनि) ।
५४१- यदि लग्नेश सप्तमेश २,४,५ इन भावों में शुभ और पाप ग्रह दोनों मिले
हों तो राजा के समान हो (जैमिनि) ।
५४४२--लग्नेश ओर सप्तमेश में ३,६ भावों के तुल्य २ पाप ग्रहों के राश्या दि
हों तो राजा हो (ज॑मिनि) ।
“राजयोग के फल का विचार
ग्रहों के स्थान ओर दृष्टि का विचार कर राजयोग का फल विचारना । पहिले
जन्म काल का ग्रह स्पष्ट भाव स्पष्ट करना । इसमें शूभ और अशुभ भाव विचार कर
राजयोग : ३८७
केन्द्र कोण आदि संज्ञा का विचार कर ग्रहों के बल ओर स्थिति के अनुसार राजयोग के फल का विचार करना ।
इसके पहिले आयुर्दाय का निश्चय कर फिर फल का समय निकालना । राजयोग का कितना फल होगा ७ यह राजयोग कारक ग्रहों के बल आदि पर विचार कर निर्णय करना । यदि ये उच्च के डों तो पूर्ण फल, मूळ त्रिकोण में पौन फ़ल, स्वक्षेत्री में आधा फल, मित्र क्षेत्री में चौथाई फल होगा । शत्रु क्षेत्र में अष्टांश, शुभ फल होगा । वे ही ग्रह यदि अस्त व नीच में हों तो सम्पूर्ण अशुभ होगा। शतु क्षेत्री में पौन अशुभ, मित्र क्षेत्री में आधा, स्वक्षेत्री में चतुर्थाश, अशुभ होगा । मूल त्रिकोण में नाम मात्र को अशुभ होगा परन्तु उच्च में कोई ग्रह अशुभ फल नहीं देगा । फल समय
योग कारक ग्रहों में जो सबसे बळी हो उसकी दशा अंतर्दशा में पूवं बताये योगों के फल होंगे ।
राजयोग करने वाले ग्रहों में जो दशम या लग्न में हो उसकी अंतर्दशा में राज्य लाभ होगा ।
जब इन दोनों स्थानों में ग्रह हों तो जो उनमें से वली हो उसकी अंतर्दशा में लग्न फल होगा। और दशम में बहुत ग्रह हों तो उनमें से जो बली हो उसकी अंतर्दशा में 'फल होगा । इन दोनों भाव में जब कोई ग्रह न हो तो सब ग्रहों में जो बली हो उसकी दशा मे राजयाग होगा। या जन्म काल में जो बलवान् ग्रह हो उसकी दशा में अधि- कार प्राप्त हो । छिद्रा दशा
चत ह बलवान् ग्रह से होने वाले राज्य लाभ को भी छिद्रा दशा नष्ट कर
1
जन्म कालिक शत्रु व नीचगत बलवान् ग्रह की अंतर्दशा छिद्रा दशा कहलाती है ।
इनमें भी राज योग कारक ग्रहों में से कोई नीच व शत्रु क्षेत्री या निबंळ ग्रह हो
'तो वह योग भंग कर देगा अन्य कुछ हानि नहीं करेगा ।
जन्म में शत्रु क्षेत्री या नीच के ग्रह अपनी दशा में यदि राजा हो तब भी राज्य भ्रष्ट कर देता है । साहुकार को भिखारी बना देता है ।
राज भंग योग
जिन योगों के होने में पूर्व बताये राजयोग भंग हो जाते हैं वे नीच दिये हैं।
शुरुका ` १--गुरु नीच तथा अस्त का हो, लग्न में कुंभ राशि हो, ३ ग्रह नीच के हों, एक ग्रह धन भाव में हो, दशम भाव में अशुभ ग्रह हो तो सैकड़ों राजयोग नष्ट करता
है ( जा० भ० )।
२-- गुरु परम नीच अंश में हो तो राजयोग में भी उत्पन्न जातक अति दरिद्रो
हो (शंभु० ) । अन्य क या दे करी
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३८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
३--गुरु अस्त हो और ३ ग्रह नीच के हो, और जन्म लग्न कुंभ हो तो राजयोग
नष्ट हो ( जा० भ० ) ||
४--गुरु अस्त हो, एक भी ग्रह उच्च में न हो, दशम में पाप ग्रह हो तो राजयोग
नष्ट हो ( शंभु० ) ।
५-- लर्न में मकर का गुरु परम नीचगत हो तो राजयोग में भी उत्पन्न दरिद्री हो ( शंभू. ) । शुक्र का
६--शुक्र नीच या सिंह के नवांश में हो तो राजयोग नष्ट हो।
७--शुक्र परम नीच अंश में हो तो राजयोग: नष्ट होकर पतन हो (जा०भ० )r
८--शुक्र अस्त हो, या नीचगत हो, सब ग्रह केन्द्र में हों और शुभ ग्रह ६,८१२
भाव में हों तो सब राजयोग भंग हों ( शंभु० ) ।
९--शुक्र नीच का होने से राजयोग नष्ट होता है ( स$ चि० ) ।
चन्द्र का
१०--चन्द्र अस्त हो ४ ग्रह नीच या शत्रु क्षत्री हों, केन्द्र ग्रह शून्य हो या उसमें
शुभ ग्रह न हों तो राजयोग नष्ट हो ( जा० सं० )।
११-चन्द्रमा परम नीच अंश का हो या चन्द्र परम -नीच हो तो राजयोग
नष्ट हो ।
१२--चन्द्रमा तुला के १० अंश पर हो तो हजारों योगों को भंग करता है।
१३--नीच का हो तो भाग्य नष्ट करता है।
१४--चन्द्रमा या लग्न को एक भी ग्रह न देखे तो राजयोग नष्ट हो (शंभु०) ४
१५--क्षीण चन्द्र को पाप ग्रह देखते हों और शुभ ग्रह नहीं देखते हों और सूर्य
स्व नवांश में हो तो पहिले राज्य प्राप्त हो पश्चात् राजयोग नष्ट होकर दुःखी हो,
आशा नष्ट हो ( जा भ०-)।
१६--बलहीन चन्द्र चरराशि के अन्त भाग में, स्थिर राशि के आदि में, दविस्थभाव
राशि के मध्य में हो और कोई भी ग्रह लग्न में न हो तो राजयोग भंग हो (जा. पारि.)
इतर ग्रहों के योग
१७--मंगल सूर्यं शनि ३,६,११ स्थानों में हों, शुभः ग्रह केन्द्र में न हो या अस्तंगत
हो, या शुभ ग्रह सप्तम हो राहु लर्न में हो चन्द्र की दृष्टि उस राहु पर हो राजयोग
नष्ट हो ( जा० भ० )1 ;
मतांतर--सूर्यं मंगल शनि १,६,११ भाव में हों शेष पूर्वोक्तं ।
१८-¬सूर्यं उच्च का नीच नवांश में हो तो राजयोग नष्ट हो । इस योग में पाप
दुष्ट सूर्य लग्न में हो तो निश्चय राजभंग हो ( स० चि० ) ।
१९--सूये परम नीच का हो तो हजार राजयोग नष्ट हों ( स० चि० )। -
२०--छनम में राहु हो चन्द्र से दुष्ट हो तो राजयोग भंग हो ।
२१-५ ग्रह नीच के हों या अस्त हों तो राजयोग भंग हो ।
राजयोग: ३८९
२२--सब पाप ग्रह केन्द्र में हों नीच या शत्रु के घर के हों और सोम्य ग्रहों की उन पर दृष्टि न हो शुभ ग्रह ६,८,१२ भाव में हों तो राजयोग नष्ट हो (जा० भ०) । २३--इसी प्रकार नीच शत्रु राशि आर पाप षष्ठ्यंश वाले ग्रह राजयोग नष्ट करते हैं ( जा० पारि० )।
२४--९,१०,११ स्थानों के स्वामी नीच के हों तो सव राजयोग नष्ट हों ।
२५--उच्च के ग्रह नीचांशक में हों तो राजयोग नष्ट हो ।
२६--सब पाप ग्रह नीच के केन्द्र में हों ।
२७--सब पाप ग्रह ३,६,११ स्थानों में हों ।
२८--सौम्य ग्रह ६;८,१२ घरों में हों ।
२९--सोम्य ग्रह अस्तंगत हों या केन्द्र में न हों तो राजयोग नष्ट हो । ३०--घरों केन्द्रों में शुभ ग्रह न हों या केन्द्र में जो गृह हों वे अस्त व नीच में हों या शत्रु गृही हों ( जा० भ० ) । ३१--चारों केन्द्र शून्य हों शुभ गृह अस्त हों या नीच में हों या ४ गृह शत्रु क्षेत्री हों तो राज योग भंग हो ( जा० सं० ) ।
३२--चारों केन्द्रों में पाप ग्रह हों और द्वितीय में भी पाप ग्रह हों तो वह अति दरिद्री वंश वाले को भय प्रद है ( जा० सं० ) । ३३--राजयोग कारक ग्रह नीच शत्रुक्षेत्री या अस्त हो.या नीच या शत्रुक्षेत्री ग्रह से दृष्ट हो तो राजयोग भंग हो ( जा० पारि० ) ;
३४--दशम भाव में नीच का ग्रह हो तो राजयोग भंग हो ।
३५--शत्रु राशि में सब ग्रह हों चाहे नवांश में या वर्गोत्तम में हों तो राजयोग
नष्ट हो ( शंभु० ) ।
३६--वहुत ग्रह नीच में हों तो राजयोग नष्ट हो ( शंभु० ) । ३७--लग्न में एक भी ग्रह नीच का हो ओर दशम में पाप ग्रह हो तो राजयोग
नष्ट हो ।
३८--यदि ४,५ या ६ ग्रह एक स्थान में हों तो राजयोग नष्ट हो पर भिक्षुक हो।
३९--जितने राजयोग नाशक योग हैं, जितने रेका (दरिद्र) योग हैं, जितने प्रेष्य
( दूसरे की नौकरी ) योग और केमद्रुम योग हैं ये चारों प्रकार के योग शुभ नाशक हैं
{ जा० पारि० ) ।
४०--जन्म में उल्कापात हो या व्यतीपात योग हो या धरती कम्पायमोन हो, फट जावे या जन्म समय पूछल तारा का उदय हो तो राजयोग में भी उत्पन्न हुआ
दरिद्री होता है ( शंभु० ) 1
अध्याय १२
नाभस आदि योग
योग--जन्म कुंडली में जो ग्रह हैं उनका अधिकार एक-एक दूसरे ग्रह से दृष्टि
आदि द्वारा सम्बन्ध एवं ग्रहों की स्थिति के अनुसार ग्रहों का जो विशेष योग बनता हैः
यहाँ उनके नाम दिये हैं ओर उनका फल बताया है। नाभस आदि अनेक इस प्रकार
के योग आगे दिये हैं ।
थोग के फल का समय
इन योगों का फल उस ग्रह की दशा में होता है । दशा आरम्भ काल में ग्रह स्पष्ट
के अनुसार यवनाचार्य ने ऐसे १५०० भेद कहे हैं कोई आचार्य पृथक असंख्य भेद
बतलाते हैं ।
१ आकृति योग के २० भेद
१. गदायोग--केन्द्र के पास मिले किसी दो भाव में सव ग्रह हों तो गदायोग
होता है । इसक्रे ४ भेद हैं ।
(१) लग्न और चतुर्थं में सब ग्रह, (२) चतुर्थं और सप्तम में सव ग्रह, (३)सप्तम
और दशम में सब ग्रह, (४) दशम और लग्न में सब ग्रह । यवनमत से इन चारों भेदो
के पृथक-पुथक नाम भी दिये हैं ।
(१) लग्न और चतुर्थ में सब ग्रह-गदा । (२) चतुर्थ और सप्तम में सव ग्रह-शंखः
(३) सप्तम और दशम में सब ग्रह-बच्चुक । (४) दशम और लग्न में सब ग्रह=ध्वज ।
नाभस आदि योगः ३९१
२. शकट योग- केन्द्र
३, विहंग योग--चतुथं और दशम में ४. श्युगाटक योग--लग्न, पञ्चम सब ग्रह हों । ओर नवम में सब ग्रह हों ।
५. हुल योग--लग्न छोड़कर परस्पर त्रिकोण में सब ग्रह हों।
इसके ३ भेद हैं (१) २, ६, १० स्थान में सब ग्रह ।
(२) ३, ७, ११ स्थान में सब ग्रह ।
(३) ४, ८, १२ स्थान में सब ग्रह ।
३९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
आरु गाटक के १, ५, ९ स्थान छोड़कर अन्य त्रिकोण में सब ग्रह ।
हल योग के उदाहरण:--
६. बज्न योग--सव शुभ ग्रह लग्न और सप्तम में हों या सब पाप ग्रह चतुर्थ
और दशम में हों ।
नाभस आदि योग; ३९३
मतांतर
कुछ विद्वानों का कहना है कि १,७ आव में शुभ ग्रह और ४,१० भाव में पाप ग्रह हों तो वच्ञ योग होता है। परन्तु सूर्य से चौथे स्थान अन्तर पर चुघ शुक्र आना असभव है । सब ग्रह केन्द्र में होने
से तो कमल योग होता है। यहाँ पाप और शुभ ग्रह का पृथक कारण हो गया है । चारों केन्द्र में इस प्रकार पाप-शुभ ग्रह के अनुसार ग्रह आना असंभव है इससे उपरोक्त हल योग पृथक-पृथक दो प्रकार से चताये हैं ।
७. यव योग--वह वज्र योग का उल्टा है अर्थात सब पाप ग्रह लग्न और सप्तम में हों या सब शुभ ग्रह चतुर्थ ओर दशम में हों ।
सतांतर--
यहाँ भी विद्वानों का कहना है कि १,७ भाव में पापग्रह और ४,१० भाव
में शुभ ग्रह हों तो वस्न योग होता है ।
यहाँ भी उपरोक्त विचार होता है कि सूर्य
से शुक्र बुध चौथेभाव में नहीं जा सकते
इस प्रकार तो कमल योग होता है । परन्तु 2
शुभ ओर पापग्रहों के विचार से यहाँ भी दो उपरोक्त प्रकार से योग बताये हुँ ।
८. कमल योग--चारों केन्द्र में शुभ-पाप ९. वापी योग--यह कमल योग का सभी ग्रह हों और पणफर आपोक्लिम उल्टा है । अर्यात. सभी ग्रह केन्द्र के में ग्रह न हों अर्थात् सब केन्द्र में ही हों बाहर हों। केन्द्र मे कोई ग्रह न हो केन्द्र के बाहर ग्रह न हों इसमें शुम-पाप के इसके भी २ भेद हैं ! क्रम का कोई विचार नहीं है, जैसा यहां (१)सब ग्रह २,५,८,११(पणफर) में ।
बताया है 1 (२)सब ग्रह ३,६,९,१२(अपो क्लिम) में।
यक त क्क pe ह
३९४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
११. शर (इणु या इषु) योग-चतुर्थ
१०. यूप (यूपक) योग- लग्न से चतुर्थ से सप्तम तक सब ग्रह हों जैसा यहाँ
तक सब् ग्रह हों अर्थात्, १, २, ३ और बताया है अर्थात् लग्न से ४,५,६,७ भाव
४ भावों में सबग्रह हों । में सब ग्रह होना । ८
१२. शक्ति योग--सप्तम से दशम भाव १३. दंड योग--दशम भाव से लग्न
तक सब ग्रह हों अर्थात् लग्न से ७,८,९, तक सब ग्रह हों अर्थात लग्न से १०,११,
१० भाव में सब ग्रह हों । १२ और ९ स्थान में सब ग्रह हाँ ।
१४. नौका योग- लग्न से सप्तम तक १५ कूट योग--चतुर्थ भाव से दशम
प्रत्येक भाव में एक-एक गृह हो ७ भाव भाव तक प्रत्येक भाव में एक-एक करके ७
हक ७ गृह हों || गृह ७ स्थानों में हो ।
oo =
नाभस आदि योग : ३९%
१६--छत्र योग-सप्तम से लग्न तक १७--चाप (धमुष-कामुंक) योग-दश सब ग्रह हों । प्रत्येक भाव में गृह हों। भाव से चतुर्थं भाव तक सब गृह हों एक एक करके ७ गूह ७ स्थानों में हों ।
१८--अद्धंचंद्र योग-पूर्वोक्त नौका, कूट, छत्र और चाप में जो योग बताये हैं उनको छोड़ कर उनके विरुद्ध शेप किसी स्थान से लगातार सव गूह एक-एक करके
७ स्थानों में हों इसके ८ भेद हो जाते हैं।
[१] २ भाव से ८ भाव तक लगातार ७ घरों में १,१ गृह ।
[२] ३ भाव से ९ भाव तक लगातार ७ घरों में १,१ गृह ।
[३] ५ भाव से ११ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।
[४] ६ भाव से १२ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।
[५] ८ भाव से २ भाव तक लगातार ७ घरों में १-५ गृह ।
[६] ९ भाव से ३ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।
[७] ११ भाव से ५ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।
[८] १२ भाव से ६ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह 1
३९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
नाभस आदि योग : ३९७
१९--समुद्र ( जलधि ) योग-द्वितीय २०--चक्र योग--लग्न से एकादशं भाव तक १-१ घर छोड़कर सभी गूह अर्थात् १,३,५,७,९,११ इन भावों में गृह हों यह समुद्र का उल्टा है ।
(६) वजू, (७) यव, (८) कमल, (९) वापी योग पर बिचार प्राचीन ग्रंथों के अनुसार वस्न आदि योग लिखे गये हैं परन्तु सूर्य से चौथे घर में बुध तथा शुक्र कंसे हो सकते हैं सूर्य से बुध या शुक्र २८ अंश और ४८ अंश से अधिक दूरी पर नहीं हो सकते अर्थात् सूर्य से बुध शुक्र दूसरे या तीसरे भाव से अधिक द्र नहीं हो सकते । भारतवषं में इन योगों का होना असंभव जान पड़ता है । कुछ विद्वानों का कहना है कि सूर्य से बुध शुक्र चौथे स्थान पर इस प्रकार हो सकते हँ कि सूर्य अंतिम २९ अंश के अंत में एक भाव में हो ओर २ राशि छोड़कर चौथे ठिकाने थोड़े अंश से बुध या शुक्र हो । २ संख्या योग--इसके ७ भेद हैं । पूर्वोक्त योगों में से कोई योग न हो तब इन योगों का विचार करना । १-वीणा (वल्ली-वल्लकी) योग यदि ७ स्थानों में सव ग्रह हों । २-दाम ( दमनिका-दामनी-रज्जू ) योग-केवल ६ स्थानों में सब ग्रह हों। ३- पाश योग = केवल ५ स्थानों में सब ग्रह हों । ४-केदार योग = केवल ४ स्थानों में संव ग्रह हों । ५-शूल योग = केवल ३ स्थानों में सब ग्रह हों । ६-युग योग = केवल २ स्यान में ही सव ग्रह हों ७-गोल (गोलक) योग-केवछ १ स्थान में ही सब ग्रह हों। विचार-संख्या योद की प्राप्ति में आकृति योग हो तो संख्या योग का फल नहीं दोगा आकृति योग का ही फल होगा । संख्या योग के भेद १. एक-एक ग्रह पृथक रहने से-७ भेद । २. २ ग्रह साथ रहने से -२३ भेद । ३. ३ ग्रह साथ रहने से -३५ भेद। ४. ४ ग्रह पाथ रहने से -३५ भेद । ५. ५ ग्रह साथ रहने से -२१ भेद । ६. ६ ग्रह साथ रहने से - ७ वंद । ७. ७ ग्रह साथ रहने से - १ भेद ।
योग १२७
३९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
इनके भेदों के उदाहरण
१. एक ग्रह एक ही स्थान में होने से ७ होते हैं अर्थात् पृथक एक ही ग्रह रहने
सब ७ योग ७ ग्रहों के होते हैं (वीणा योग) ।
२. दामनी योग > २ ग्रह एक साथ होने से २१ भेद होते हैं--
१ सूर्यं चंद्र ८ चंद्र बुघ १५ मंगल शनि
२ सूर्यं मंगल १ चंद्र गुरु १६ बुध गुरु
३ सूर्य बुध १० चंद्र शुक्र १७ बुध शुक्र
४ सूर्य गुरु ११ चंद्र शनि १८ बुध शनि
५ सूर्य शुक्र १२ मंगल बुघ १९ गुरु शुक्र
६ सूर्य शनि १३ मंगल गुरु २० गुरु शनि
७ चंद्र मंगल १४ मंगल शुक्र २१ शुक्र शनि
३. ३ ग्रह एक साथ होने से ३५ भेद हो जाते हैं ( पाश योग के )
१ सूः च. मं. ८ सूः मं. शु. १५ सू. शु. श. २२चं. बु. शः २९ मं. गु. शु.
२ सू. चं. बु.
३ सू. चं. गु.
४सू. चं. शु.
५ सू. चं.श.
६ सू. मं. बु.
७ सू. मं. गु.
९ सू.मं. शः १६ चं. मं. बु. २२चं.गु.शु. ३० मं. गु. श,
१०सू. बु. गु. १७चं. मं. गु. २४ चे, गु. शः ३१ मं. शु. श.
११सू. बु. शु. १८ चं. मं. शु. २५चं.शु.श. २२ वु. गुः शु,
१२सू. बु. श. १९ चं. मं. शः २६ मं. वु. गु. ३३ वु. गु. शः
१३सू. गु. शु. २० चं. बु. गु. २७ मं. बु. शु. ३४ बु. शु, श.
१४.सू. गु. श. २१ चं. वु. शु. २८ मं. वु. श. ३५ गु. शु. श.
४, केदार योग--४ ग्रह एक साथ रहने से ३५ भेद हो जाते हैं सूर्यं सहित २०
-भेद, चंद्र सहित १० भेद, मंगल सहित ४ भेद, बुध सहित एक भेद सब ३५ भेद
१ सू. चं. मं, बु.
२ सू. चं. मं. गु.
३ सू. चं. मं. शु.
४ सूः चं. मं. श
५ सू. चं. बु. गु.
६सु. चं. बु. शु.
७ पू. चं. बु. श.
८ सू, चं. गु. श.
९ सू. चं. गु. श.
१० सू. चं. शु. श.
११ सू, मं. बु. गु.
१२ सू. मं. बु. शु.
१३ सू. मं. बु. श.
१४ सू. मं. गु. शु.
१४ सू. मं. गु. श.
१६ सू. मं शु. श.
१८ सू. बु. गु. शु.
१८ सू. बु. गु. श.
१९ सू. बु. शुः श.
१० सू. गु. शु. श.
२१ चं. मं. बु. गु.
२२ चं. मं. बु. शु.
२३ चं. मं. बु. श,
२४ चं. मं. गु. शु.
२५ चं. मं. गु. शः
२६ चं. मं. शुः श.
२७ चं. बु. गु. शु.
२८ चं. वु. गु. श.
२९ चं. वु. शुः शः
३० चं. गु. शु. शः
३१ म॑. बु. गुः शुः
३२ सं. बु. गु. शः
३३ मं. बु. शु. शः
३४ मं. गु. शु. श.
३५ बु. गु. शु. शः
५, शूल योग के भेद--५ ग्रह एक साथ होने ये २१ विकल्प होते है ।