सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फित खण्ड
५२७--यदि आत्म कारक, अमात्य कारक से युक्त हो तो भी राजमंत्री हो
(वृ. पा.) ।
५२८--आत्म कारक बली, शुभ ग्रह से युक्त होकर अपने गृह या उच्च में हो
तो मंत्री हो (वृ. पा.) ।
५२९ आत्म कारक यदि १,५,९ भाव में हो तो भी राजमंत्री हो (वृ. पा.) ।
३०--आत्म कारक से केन्द्र या त्रिकोण में अमात्य कारक हो तो भी राजा का
कुपा पात्र होकर सुखी होकर राजमंत्री हो (वृ. पा.) ।
५३१--आत्म कारक नवम में हो या नवम भाव का पद लग्न में हो तो वह
निश्चय राजा का सम्बन्धी होता है (वृ० पा०)।
५३२--आत्म कारक से चतुर्थ भाव में शुक्र ओर चन्द्र हो तो राजचिह्लों से युक्त
राजा के बराबर सुख भोगने वाला हो (वृ० पा०)।
५३३--पुत्राद कारक वश से पुत्रादि का राजयोग विचारना अर्थात् पुत्रादि
कारकों में राजयोग बली हो तो पुत्रादि को भी राजयोग बली होता है ।.
५३४--कारकांश या उससे पञ्चम भाव या लग्न या लग्न पद में शुक्र हो उसपर
गुरु की या चन्द्र की योगदृष्टि हो तो राजा का सम्बन्धी हो (वृ० पा०) ।
५३५--शुभ ग्रह से युक्त कारक यदि ५,७,१० या ९ भाव में हो तो उसे राजा
के आश्रय से धन लाभ हो (वृ० पा०)।
५३६--कग्न का पद और सप्तम भाव का पद परस्पर केन्द्र में हो या ३,११ में
या ५,९ में हो तो निश्चय राजा हो सुखी हो (वृ० पा०) ।
५३७--लग्न पद या चन्द्र के साथ उच्च का ग्रह हो उसमें गुरु या शुक्र का योग
या किसी उच्चस्थ ग्रह का योग हो तो निश्चय राजा हो (वु० पा०) ।
५३८--या पद में चन्द्रमा हो और उससे दूसरे स्थान में गुरु हो तो भी राजयोग होता है (वृ० पा०) ।
५३९--पद में शुभ ग्रह और चन्द्रमा हो, द्वितीय स्थान में गुरु हो उनपर उच्च
अह की दृष्टि हो तो निश्चय राजा होता है (वृ० पा०) ।
४५४०--जेसे आत्मकारक से २,४,५ भाव का विचार बताया है उसी प्रकार
रूगनेश ओर सप्तमेश से भी विचारना अर्थात् लग्नेश सप्तमेश से २,४,५ इन भावों के
सुल्य शुभ ग्रह हो तो राजा होता है (जेमिनि) ।
५४१- यदि लग्नेश सप्तमेश २,४,५ इन भावों में शुभ और पाप ग्रह दोनों मिले
हों तो राजा के समान हो (जैमिनि) ।
५४४२--लग्नेश ओर सप्तमेश में ३,६ भावों के तुल्य २ पाप ग्रहों के राश्या दि
हों तो राजा हो (ज॑मिनि) ।
“राजयोग के फल का विचार
ग्रहों के स्थान ओर दृष्टि का विचार कर राजयोग का फल विचारना । पहिले
जन्म काल का ग्रह स्पष्ट भाव स्पष्ट करना । इसमें शूभ और अशुभ भाव विचार कर