सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 395, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजयोग : ३८५
अन्य योग
५१०--सभी ग्रह चन्द्र के होरा में हों तो यशस्वी हो (जा. पारि.) । ५११-एक भी ग्रह स्वगृही या वर्गोत्तम हो और बलवान् मित्र ग्रह से दृष्ट हो तो राजा हो (जेमिनि) ।
४१२-२,३ ग्रह दिग्बल से पूर्ण हों तो राजवंशी राजा हो और विजयी हो (फल.) । ५१३--यदि शनि को छोड़कर ४,५ ग्रह दिग्वल पूर्ण हों तो साधारण कुल में भी उत्पन्न हुआ मनुष्य राजा हो (फल.) । न ५१४--यदि ५ आदि ग्रह स्वनवांश में हों तो वित्तवान् राजा हो (जा. पारि.) 7 ५१५--त्रिपुष्कर में उत्पन्न हुआ मनुष्य राजा होता है (शंभु) 1 त्रिपुष्कर योग--दिन-रविवार, मंगलवार, शनिवार, (मुहूतं चिता०) तिथि-भद्रा २,७,१२, नक्षत्र-विशाखा, कृतिका, पुनवंसु, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, पूर्व भाद्रपद । ५१६-जन्मकाल में उत्तर में वशिष्ठ ओर पश्चिम में शुक्र, गुरु पूर्व में, अगस्त दक्षिण में हो तो ऐसे समय उत्पन्न जातक धरती का स्वामी सप्ुद्र तक राजा हो (शंभु) कारक से राजयोग विचार
५१७--कारकांश और जन्म लग्न इन दोनों से राजयोग विचारना चाहिये । एक तो आत्म कारक और पुत्र कारक से, दूसरा लग्नेश और पंचमेश से । इन दोनों के परस्पर सम्बन्ध और बल के अनुसार ही .राज योग का. आधा या चतुर्थांश आदि फल समझना ।
५१८--आत्म कारक शुभ राशिया शुभ नवांश में हो तो धनवान् होता है (वृ. पा.) ।
५१९--कारकांश से केन्द्र में शुभ ग्रह हो तो राजा होता है (वृ, पा.) । ५२०--आत्म कारक से चतुर्थ में शुक्र और चन्द्र दोनों हो तो नगाड़ा आदि बाजे चामर आदि राज चिह्न होते हैं (जैमिनि) । : ५२१--आत्म कारक से २,४,५ भाव के राश्यादि तुल्य शुभ ग्रह के राश्यादि हो : तो राजा हो (जैमिनि) ।
५२२--आत्म कारक से ३,६ इन दोनों भावों के तुल्य दो पाप ग्रह के राश्यादि , हों तो राजा हो (ज॑मिनि)। |
५२३--आत्म कारक से, पद से, या लग्न से, ३,६ भाव में सब पाप ग्रह हों तो सेनापति हो (व्. पा.) ।
५२४--आत्म कारक अपनी राशि या उच्च में होकर केन्द्र त्रिकोण में नवमेश से युक्त या दृष्ट हो तो निश्चय राअमंत्री हो (वृ. पा.) । ; ५२५--आत्म कारक जन्म राशीश होकर शुभ प्रह के साथ लग्न में हो तो बह वृद्धावस्था में मंत्री हो (व्. पा.) । ) ५२६--जन्म लग्न से दशमेश यदि आत्म कारक राशीश या पंचमेश तथा आत्म कारक से युक्त हो तो राजमंत्रो हो (वृ. पा.) ।
(२५