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भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 454 में से

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पृष्ठ 397

राजयोग : ३८७

केन्द्र कोण आदि संज्ञा का विचार कर ग्रहों के बल ओर स्थिति के अनुसार राजयोग के फल का विचार करना ।

इसके पहिले आयुर्दाय का निश्चय कर फिर फल का समय निकालना । राजयोग का कितना फल होगा ७ यह राजयोग कारक ग्रहों के बल आदि पर विचार कर निर्णय करना । यदि ये उच्च के डों तो पूर्ण फल, मूळ त्रिकोण में पौन फ़ल, स्वक्षेत्री में आधा फल, मित्र क्षेत्री में चौथाई फल होगा । शत्रु क्षेत्र में अष्टांश, शुभ फल होगा । वे ही ग्रह यदि अस्त व नीच में हों तो सम्पूर्ण अशुभ होगा। शतु क्षेत्री में पौन अशुभ, मित्र क्षेत्री में आधा, स्वक्षेत्री में चतुर्थाश, अशुभ होगा । मूल त्रिकोण में नाम मात्र को अशुभ होगा परन्तु उच्च में कोई ग्रह अशुभ फल नहीं देगा । फल समय

योग कारक ग्रहों में जो सबसे बळी हो उसकी दशा अंतर्दशा में पूवं बताये योगों के फल होंगे ।

राजयोग करने वाले ग्रहों में जो दशम या लग्न में हो उसकी अंतर्दशा में राज्य लाभ होगा ।

जब इन दोनों स्थानों में ग्रह हों तो जो उनमें से वली हो उसकी अंतर्दशा में लग्न फल होगा। और दशम में बहुत ग्रह हों तो उनमें से जो बली हो उसकी अंतर्दशा में 'फल होगा । इन दोनों भाव में जब कोई ग्रह न हो तो सब ग्रहों में जो बली हो उसकी दशा मे राजयाग होगा। या जन्म काल में जो बलवान्‌ ग्रह हो उसकी दशा में अधि- कार प्राप्त हो । छिद्रा दशा

चत ह बलवान्‌ ग्रह से होने वाले राज्य लाभ को भी छिद्रा दशा नष्ट कर

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जन्म कालिक शत्रु व नीचगत बलवान्‌ ग्रह की अंतर्दशा छिद्रा दशा कहलाती है ।

इनमें भी राज योग कारक ग्रहों में से कोई नीच व शत्रु क्षेत्री या निबंळ ग्रह हो

'तो वह योग भंग कर देगा अन्य कुछ हानि नहीं करेगा ।

जन्म में शत्रु क्षेत्री या नीच के ग्रह अपनी दशा में यदि राजा हो तब भी राज्य भ्रष्ट कर देता है । साहुकार को भिखारी बना देता है ।

राज भंग योग

जिन योगों के होने में पूर्व बताये राजयोग भंग हो जाते हैं वे नीच दिये हैं।

शुरुका ` १--गुरु नीच तथा अस्त का हो, लग्न में कुंभ राशि हो, ३ ग्रह नीच के हों, एक ग्रह धन भाव में हो, दशम भाव में अशुभ ग्रह हो तो सैकड़ों राजयोग नष्ट करता

है ( जा० भ० )।

२-- गुरु परम नीच अंश में हो तो राजयोग में भी उत्पन्न जातक अति दरिद्रो

हो (शंभु० ) । अन्‍य क या दे करी

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