सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 390, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें८ ३८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
ह्वितीयेश से राजयोग (उपरोक्त के अतिरिक्त)
४३४--दितीयेश बळी होकर केन्द्र में हो, चतुर्थेश लर्न या चतुर्थ में हो, उच्च का शुभग्रह नवम में हो ता राजगद्दी पर बैठे (स० चिं०) । ४३४--केन्द्र में द्वितीयेश सहित शुभग्रह हो यां उच्च का ग्रह घन स्थान में हो और नवम स्थान शुभ दृष्ट हो तो सिंहासन प्राप्त हो.(स० चिं०) । ४३६--द्वितीयेश केन्द्र में हो, लग्न व केन्द्र में शुभग्रह हो, नवम में उच्च का अह हो तो सिंहासन प्राप्त हो (जा० पारि०) ।
४३७--द्वितीयेश उच्च का केन्द्र में हो, लन में बली सौम्य ग्रह हों नवम में भी शुभग्रह हो तो सिंहासन प्राप्त हो (स० चिं०) । - .. ४३८--द्वितीयेश अपने उच्च या मूल त्रिकोण का लाभ या त्रिकोण में हो लग्नेश चली हो जिस राशि में द्वितीयेश है उसका स्वामी केद्र में हो ता राजा हो (स०चि० ) ४३९--द्वितीयेश तीसरे भाव में शुभग्रह की राशि में या अपने उच्च में हो, शुभ अह तथा पुरुष ग्रह सूर्य मंगळ गुरु से दृष्ट हो ता राजा हो (स० चिं०) । चतुर्थेश के राजयोग (उपरोक्त के अतिरिक्त)
४४०--चतुर्थेश और दशमेश उच्च में हों या स्वगृही या मित्रगृही हों तो उसके कई राजयोग होते हैं (ज्यो० रह०) । | ४४१--चतुर्थेश चतुर्थ में हो शुभग्रह से युक्त या दुष्ट हो नवमेश युक्त हो ता साधारण राजा या बड़ा धनी हो । राजद्वार से अधिकार प्राप्त हो (प्रा० यो०) । ४४२--चतुर्थेश लग्न में हो गुरु से दृष्ट हो तो राजाओं का पूज्य हो (जा.लं.) । ४४२--चतुथेश ग्रह, चतुर्थं भावगत ग्रह, नवमेश ओर नवम भावगत ग्रह चारों बलो हों तो दीर्घायु सुखी, तेजस्वी, चतुरंग सवारी, विपुल लक्ष्मी और राजचिह्व से अंकित राजा हो (जा० पारि०) ।
४४४ “बली चतुर्थेश मंगल की राशि (१,५) में हो तो राज्य, घन, सुख, मणि, वाहन आदि प्राप्त हो (स० चि०)। ` ४४५--चतुर्थेश, चतुर्थ या लाम में हो व उन स्थानों में मंगल की राशि हो तो राज्य प्राप्त हो (जा. पारि.) । ४४६--चतुर्थेश शुभग्रह मुक्त दशम मेंहो तो चामर छत्र से युक्त राजा हो (जा० पारि०) ।
४४७--चतुर्थेश दशम में, दशमेश चतुर्थं में हो उस पर पञ्चमेश या नवमेश की दृष्टि हो तो राजा हो (वृ० पा०)। ४४८--चतुर्थेश या दशमेश यदि पंचमेश या नवमेश से युक्त हो तो राज हो (वृ० पार) । ४४९ --चतुर्थेश, पंचमेश और दशमेश एक स्थान में हो, नवमेश से दृष्ट हो तो अन्य कुल में भी जन्मा राजा हो (म० प०) ।