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भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 454 में से

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राजयोग : ३८१

४५ ०--धतुर्थेश और दशमस्थ ग्रह वली हो नवमेश से युक्त या दृष्ट हो या परस्पर ग्रह हों तो दोनों योग सिंहासन प्राप्त कराने वाले है (जा० पारि०) 1 पंचमेश के राज योग ( उपरोक्त के अतिरिक्त )

४५१-- पंचमेश नवम में हो नवमेश पंचम में हो दोनों की परस्पर दृष्टि हो तो बड़ा राज्य का भागी हो (म० प०)। ४५२--पंचमेश नवमेश की परस्पर दृष्टि हो या दोनों कहीं भी एक स्थान में हों या परस्पर सप्तम स्थान में हों तो राजा हो (वृ० पा० )1 ४५३--पंचमेश यदि लग्नेश या नवमेश युक्‍त १, ४, १० भाव में हो तो राजा हो (चु० पा०) ।

षष्ठेश के योग ( पूर्वोक्त के अतिरिक्त )

४५४-६, ९, ११ और १२ के भावेश एक दूसरे के घर में हों तो अच्छा राज योग होता है (स० चि०)।

४५५--षष्ठेश दशम में, दशमेश शनि युक्त हो या केन्द्र त्रिकोण में हो तो बहुत दास दासी हों (स० चि०) ।

नवमेश के योग ( उपरोक्त के अतिरिक्त )

४५६--छग्न, नवम या दशम भाव से नदमेश और दशमेश युक्त हो और अन्यान्य राशि ( परस्पर एक दूसरे की राशि में ) स्थित हो या परस्पर केन्द्र में हो .या परस्पर दृष्टि हो द्वितीयेश के सम्बन्धी हों तो बहु धनी हो (जा० पा०) ।

४५७--नवमेश ओर दशमेश का परिवर्तन हो (एक दूसरे की राशि में हों) और दुष्ट राशियों का भी परिवर्तन हो तो राज योग होता है (ज्यो० शा ) 1 ३, ६, ८, ११, १२ भाव ये दुष्ट स्थान हैं ग्रहों के द्विस्थानाधिपत्य होने से इन दुष्ट स्थानों के भी स्वामी हो जाय तो राजयोग होता है परन्तु परस्पर परिवर्तन न हो तो ह्विस्थानाधिपत्य दोष से राज योग नष्ट हो जाता. है ।

४५८--नवमेश केन्द्र में होकर उच्च के अंश में हो और कोई दो और ग्रह उच्च में हों तो उसके अधिकार में कई वाहन और देश रहें राजा हो (स० चि०)। -

४५९--नवमेश, दशमेश यदि दशम में हो तो राजयोग होता है (ज्यो०्शा० )1 ४६०--नवमेश जहाँ हो उसका नवांशेश, पांचवें या चौथे भाव में हो तो राजा हो (जा० पा०) ।

४६१--नवमेश लग्न में हो गुरु से दुष्ट हो तो राजा हो (जा० सं०) ।

४६२--नवमेश द्वितीय भाव में हो ओर अपने ग्रह को देखता हो तो सवं सम्पदा से युक्त पृथ्वीपति होता है (जा० सं०) ।

४६३--नवमेश और आत्मकारक दोनों १, ५, ७ भाव में शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट | हो तो राजयोग होता है (वृ० पा०) ।