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भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 454 में से

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पृष्ठ 393

राजयोग : ३८३

४७९--जन्म लग्न, होरा लग्न और घटी लग्न इन तीनों पर किसी एक ग्रह की दुष्टि हो तो राजा हो ।

घटी लग्न---(इष्ट घटी+जन्म लग्न) -- १२८-शेष पंच ग्रह घटी लग्न है (वृ.पा.) । ४८०--इन तीनों उपरोक्त लग्न और सप्तम भाव पर, राशि, नवांश और द्रेष्काण के वश एक ग्रह की दृष्टि से भी राजयोग होता है (जैमिनि०) । उनमें एक भी न्युन हो तो राजयोग न्युन होता है । इन तीनों को लग्न की नवांश कुण्डली और द्रेष्काण कुण्डली से भी विचारना । इन तीनों लग्न को उच्च स्थित एक भी ग्रह देखें तो राजयोग होता है । इन तीनों में से किसी दो को भी उच्च स्थित ग्रह देखे तो राजयोग होता है। इन तीनों में से किसी दो को भी उच्च स्थित ग्रह देखे तो राजयोग होता है। राशि, नवांश और द्रेष्काण इन तीनों को या राशि और नवांश के वश या "राशि और द्रेष्काण को एक ग्रह देखे तो राजयोग होता है ।

४८१--जन्म लग्न, होरा लग्न, घटी लग्न इन तीनों में उच्चस्थ ग्रहहो। या "लग्न, द्रेष्काण ओर लर्न का नवांश इन तीनों में उच्चस्थ ग्रह हो तो अवश्य राजयोग होता है ( वृ० पाए ) ॥

४८२-छग्न के नवांश राशि के केन्द्र में नीच स्थित ग्रह लग्न को देखे तो भी राजयोग होता है ( वृ० पा० ) ।

४८३--लग्न के नवांश राशि के केन्द्र में शुभ ग्रह हो तो सर्वाधिकार सभ्पन्न राजा हो ( वृ० पा० ) ।

४८४--नीच नवांश को छोड़कर ३ आदि ग्रह रवनवांश में हों उनमें से एक भी लग्न में हो तो राजा हो ( जा० पारि० )। .

४५५--जन्म लग्न में ३ शुभ ग्रह हों तो नम्रता युक्त राजा हो ( जा० भ० )।

४८६--२,४,१०,११ के भावेश लग्न को देखते हों पद से सप्तम स्थान पर शुक्र की दृष्टि हो पद में शुभ ग्रह हो तो राजयोग होता है ( बु० पा० )।

४८७--छग्न के होरादि षड़वर्ग किसी एक भी ग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो भी

राजयोग होता है । योग दृष्टि के अनुसार पूर्ण आधा या उससे कम फल का विचार

करना ( वृ पा० ) ।

४८८--लग्न या चतुर्थं भाव अपने स्वामी या अपने मित्र से दृष्ट हो तो अवश्य

सम्पत्ति वाला हो ( जैमिनि० ) ।

४८९--लगन में क्रूर ग्रह, व्यय भाव में शुभ ग्रह द्वितीय में पाप ग्रह हो तो राजा

हो ( जा० सं० ) ।

४९०--लग्न में क्रुर ग्रह व्यय में शुभ ग्रह द्वितीय में शुभ ग्रह हो तो राजयोग

होता है । इसमें राजा नहीं होता दाता और दरिद्री होता है ( छ० चं० ) । ४९१--१,२ भाव में शुभ ग्रह, ३ घर में पाप ग्रह, ४ भाव में शुभ ग्रह हो तो राजा हो या राजा के तुल्य हो ( बू० पा० ) ।