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भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 454 में से

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पृष्ठ 410

४०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१. आकृति योग के फल

१--गदा-सदा धनोद्योगी, यज्ञ करने वाला, शास्त्र और संगीत में निपुण, स्वर्णे

रत्न आदि धनों से युक्त (वृ० पा०) । शस्त्र योग में प्रवीण, शीघ्र कहे हुए शब्द के

अर्थ में तत्पर, यज्ञ करने वाला, धनी और सम्पन्न (ल० चं०) । अनेक शास्त्र और

अनेक मंत्रों में तत्पर, गाने बजाने में चतुर, यज्ञ करने वाला, उग्र वेर करने वाला

शत्रुओं से युक्त, भूषण सहित, स्त्रियों वाळा (जा० भ०) ।

२--शकट~गाड़ी, रथ, छकड़े आदि के काम आजीवन करे, नित्य रोगी, उसकी

स्त्री निंदा योग्य हो (वृ० जा०) । दीन हीन, मित्र और वैभव युक्त कृश खोटी स्त्री

को प्राप्त, त्याग करने वाला (जा० भ०) । निधि के काम में निपुण, स्थिर द्र व्य, सुखी,

प्रसन्न मुख, और नेत्रों वाला, सदा ही तप्त, मूर्ख, कुभार्या वाला, रोगों से व्याकुळ

कष्ट युक्त जीविका, दरिद्री, भाइयों से हीन [छ० चं०]। रोगी, कुनखी मूखं, गाड़ी से

जीविका, निर्धन, मित्र आदि जन से रहित [वु० पा०] ।

३--विहग [पक्षी]-पराये भोजन से पर कायं को जाने-आने वाला और भ्रमण

करने वाला, कलह करने वाला [त्रु जा०] । भोगों सहित, त्यागों से उत्पन्न सोख्य

वाला, यात्रा में प्रीति, नित्य ही परदेश जाने वाला, बहुत बोलने वाला [जा० भ०]।

घूमने में अत्यन्त रुचि, प्रसन्न, सुरत से जीविका प्राप्त होने वाला, निकृष्ट और लड़ाई

प्रिय वाळा [ल० चं०]। भ्रमण शीळ, परतंत्र, दूत, सुरत से जीविका करने वाला,

ढीठ, झगड़ालू [वृ० पा०] ।

४--श्यगाटक-वुढ़ापे तक सुखी [वृ० जा०]। उत्कृष्ट राजा, साहंसी, युद्ध का

इच्छुक, सौख्य युक्त, बडा बुद्धिमान्‌, पहली स्त्री से बेर करने वाला [जा० भ०] ।

हंसने में सुखी, सुन्दर स्त्री वाला, राजा से डरने वाला, लड़ाई में प्रसन्न, धनवान्‌, स्त्री

का दास [ल० चं०] । कलह कारक, योद्धा, सुखी राजा का प्रिय, सुन्दरी पत्नी, धनी,

स्त्री का द्वेषी [वृ० पा०]।

५--हरू-कृषि कर्म या पशु पालन आदि करे [वृ० जा०] । दूत, साध ओर

मित्रों से रहित, खेती से आजीविका, अत्यन्त दुःखों का भोगी, क्लेशो को प्राप्त, धन

हीन [जा० भ०] । बहुत भोजन करने दारी, ८रिद्री, कृषि कर्म से वजित, उद्देग युक्‍त,

दुःखित और दास [७० चं०] । वहु भक्षी, दरिद्र, कृषक, दुःखी, भाई वन्धुओं से युक्त [वृ० पाश] । ६. वच्च--वालक वृद्ध और प्रथम अवस्था में सुखी, युवावस्था में दुःखी, सब का

प्यारा, अति शूर [वृ० जा०] । पहिली अवस्था में जीविका को प्राप्त, अंत में सौख्य

को प्राप्त, भाग्यवान्‌, जवानी में भाग्यहीन, काम-क्रोध युक्त [जा० भ०]। सुखी

सौभाग्यवान्‌, शूर मध्य अवस्था में भाग्यहीन, स्नेह रहित विष्द्ध करने वाला, दुष्ट

[छं० चं०] वाल्य और वार्धक्य में सुखी, शूर, सुन्दर, निस्पृह, भाग्यहीन, खल और

लोगों का विरोधी [वृ० पा०[ 1

७. यव--पराक्रमी, वाल वृद्ध अवस्था में दुःखी, तरुण अवस्था में सुखी [वृ०जा०]

इन सब योगों के पूर्ण फल आगे दिये हैं ! ठ