भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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नाभस आदि योग : ४१३

युक्त चतुर, [स्त्रयों का प्रिय, धन समृद्ध राजा से सत्कार पाने वाला, बहु वेत्ता उपरोक्त फल कहे यदि योग कारक ग्रह उच्च में हो स्वगृही हो अपने नवांश या मित्रग ही हो तो सब फल देते हैं ।

चन्द्रमा यदि राहु या केतु से युक्त हो या चन्द्र से १२वें राहु हो या दुरुघरा योग कारक ग्रह नीच या अस्तंगत हो तो मिश्र फल होता है । ५--केमद्रुम योग का फल--मलिन (स्नान आदि काम में आलसी), अनेक दुःखों से युक्त, नीच, अधम काम करने वाला, दरिद्री, प्रेष्य (दास कर्म करने वाला) दुष्ट स्वभाव, राजवंश में भी उत्पन्न हुआ हो तो इनमें से दो या सभी फल भोगे (वृ. जा.) उल्टी वृत्ति वाला, मलिन, बुरे वेष वाला, परदेश वासी, स्त्री ओर मित्र और पुत्र तथा धन से हीन होता है चाहे राजा का पुत्र हो (जा. भ.) । राजकुळ का भी दुःखित नीच निर्धन, नौकर और खल हो (जा. पारि.) । पुत्र कलत्र से रहित सदा दुःखी होकर देशान्तरो में घूमे,ज्ञाति जनों के सुख में विरत,कई कार्यों में मुखर (मुखवीर) बने बुरे वस्त्रों का पहिरने वाला, नीच प्रक्रति, चिरायु सदा भयभीत रहने वाला (मान,) । चन्द्र कृत अन्य योग

१--चन्द्र से सूर्य केन्द्र में हो तो--सुशीलता, धन, ज्ञान और शस्त्र का बोध, बुद्धि में निपुणता अर्थात्‌ कार्य में सूक्ष्म विचार । ये फल उसके अधम. होंगे अर्थात्‌ इतनी वस्तुए' उसे नहीं मिले । ७ २-चन्द्र से सूयं पणफर में--उपरोक्त फल मध्यम अर्थात्‌ थोड़ा-थोड़ा भिलें.। ३-चन्द्र से सूय आपोबिलम में--उपरोक्त फल उत्तम मिळे । ४-जन्म दिन का हो, चन्द्र स्व या अधि भित्र के नवांश में हो गुद की दृष्टि हो--धनवान्‌, सुखी ।

जन्म रात का हो, चन्द्र स्व या अधि मित्र के नवांश में हो शुक्र की दृष्टि हो. धनवान्‌, सुखी ।

५--जन्म में चन्द्र दृश्य चक्राद्ध में हो तो अशुभ फल देता है दुःख दरिद्र से युक्त रहे । प जन्म में चन्द्र अदृश्य चक्रा्ध में हो तो--शुभ फल अर्थात्‌ ऐश्वर्य आदि युक्त रहे | ६-छग्न या चन्द्र से सभी शुभ ग्रह उपचय में हों--अति धनवान्‌, उपचय में ३ शुभ ग्रह हों तो पूरा फल हो, २ हों तो मध्यम, यदि एक ही शुभ ग्रह हो तो अल्प फल हो । उपचय में यदि शुभ ग्रह न हो तो दरिद्री हो (वृ. जा.) । ७-लग्न या चन्द्र से ३,६,११ स्थान में मंगल शनि या सूये हो--इनमें १ ग्रह हो तो धनाढ्य हो, २ ग्रह हों तो मन्त्री, ३ ग्रह हों तो राजा हो। । फणा खग्न ओर चन्द्र दोनों से उपचय में सभी शुभ ग्रह हों तो अतिधनी हो यह केमद्रुम आदि योगों के दुष्ट फल को काट कर धनवान्‌, करता है । सूर्यं कृत योग

४ फोग---१-वोशि, २-वेशि, ३-उभय चरी, ४-कर्तरी ।