भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

चंचल, धृष्ट, निरन्तर उत्साह में तत्पर ( जा० भ० ) । हीनांग, दुष्ट वंशोत्पन्न,

नंचल बुद्धि ( जा० पारि० ) । १

मंगल बुध शनि-भय युक्त क्षीण शरीर, धन की इच्छा करने वाला, दूत, परदेश

वासी, कुनेत्र, सहनशील नहीं, बहुत बकने वाला ( शंभु० ) । परदेश में रहने वाला,

नेत्र रोगी, दूत का काम करने वाला, मुख रोगी, हँसी करने वाला (मान०) बुरे नेत्र,

दुर्बल देह, वन में वास करने वाला, दूत का काम करने वाला परदेशी,बहुत हास्य युक्त,

किसी की न सहने वाला, अपराधी होता है (जा०भ० ) । दूत, नेत्र रोगी सदा

भ्रमणशील ( जा० पारि० ) ।

मंगल गुरु शुक्र-स्त्री पुत्र आदिकों के सुख से युक्त, राज मान्य, सज्जन संगी

(शंभु०) । सुन्दर स्त्रियों से युक्त, सदा सुखी, सवों को आनन्द देने वाला, राजा का

प्रिय, (मान०) । श्रेष्ठ पुत्र और स्त्री के सुख सहित, राजा का माननीय, श्रेष्ठजनों के

साथ रहने वालां ( जा० भ० )। राजा का मित्र, सुपुत्री, सुखी (जा० पारि०) ।

मंगळ गुरु शनि-राजा से मान प्राप्त, दया रहित, दुर्गल शरीर, दुष्ट वृत्ति,

मित्र सुख रहित (शभु ०) । कुष्ठी शरीर, राज पूज्य, नीचों के समान आचार, निर्धन,

मित्रों से निदित ( मान० ) । राजा से प्राप्त मान और कृपा रहित, दुर्गल, खोटी

वृत्ति, मित्रता रहित (जा० भ०) । दुवला शरीर, मानी, दुराचारी (जा० पारि०) ।

मंगल शुक्र शनि-विदेशवासी, मां असभ्य होवे, सुन्दर स्त्री के कारण मान हानि

आदि से सुख नाश ( शंभु० ) । स्त्री दुष्ट स्वभाव की, परदेशवासी, सदा सुखी

(मान०) । परदेशवासी, नीच कुल की माता, वैसे ही स्त्री, सुखों का नाश करता ।

( जा० भ० ) । कुपुत्री. सदा परदेश में रहने वाला ( जा० पोरि० ) । 6

(४) बुध गुरु शुक्र-सत्यवादी,उसकी कीति बहुधा गाई जावे, राजा की कुपा रहे,

शत्रु से विजयी रहे, प्रसन्न मुख (शंभु०)। सुन्दर शरीर, राज पूज्य, शत्रुओं को जीतने

वाला, वडा यशस्वी और सत्यवादी (मान०) । राजा की कृपा सहित, बहुत यश वाला,

प्रसन्न चित्त, शत्रुओं को जीतने वाला, सत्य में तत्पर ( जा० मर ) । शत्रुओं को

जीतने वाला, कीति, प्रताप से युक्त । ( जा» पारि० ) ।

बुध गुरु शनि- स्थान ऐश्वर्य से उत्पन्न सुख से युक्त, उत्तम चरित्र, धारणा

युक्त, बहुत बोलने वाला (शंभु०) । उत्तम आचार, अनेक भोग भोगने वाला, ऐश्वर्य

से युक्त, बुद्धिमान्‌, सुख धैर्य से युवत ( मान० ) । घर में घन और श्रेष्ठ वैभव युक्त,

बहुत बोलने वाला, धृतिमान्‌, थेष्ठा वृत्ति, ( जा० भ० ) “विशेष सुखी. श्रीमान्‌,

अपनी स्त्री का प्रिय ( जा० भा )।

बुध शुक्र शनि- शूठ बोलने वाला, बहुत वकने वाला, धूर्त, सदाचार, रहित, दूर

गमन, में तत्पर, कला जानने वाला ( शंभु० ) । बडा मुखर ( चुगल खोर ), परस्त्री

गामी, दुष्ट जनों का संग, कलाओं का जानने वाळा, स्वदेश में रहने वाला ( मान० ) ।

साधू शीळ रहित, झूठ बोलने वाळा, बहुत बोलने वाला, निश्चय धूतं, बड़ी दुर की

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