भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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अध्याय ३.

योग विचार

अन्योन्याश्चय योगः | परिवतेन योग ]

जब दो भावेश एक दूसरे के भाव में हों तो उसे अन्योन्याश्रय योग कहते हैं.। इसे

परिवर्तेन योग भी कहते हैं । जैसे लग्नेश लाभ में हो ओर लाभेश लग्न में हो । या

चतुर्थेश दशम में हो दशमेश चतुर्थं में हो ।

६-८-१२ स्थान कुण्डली में अशुभ स्थान हैं यदि इन स्थानों के स्वामी अन्योन्या-

श्रय योग करें तो बुरा फल होता हैं । परन्तु ६-१०-२ ये परस्पर त्रिकोण हैं इसी

प्रकार ८-१२-४ भी त्रिकोण स्थान हैं अर्थात्‌ ये एक दूसरे के त्रिकोण स्थान है ।

इससे इन स्थानों के अन्योत्याक्रय योग उत्तम फल देंगे । जैसे षष्ठेश दशम में हो और

दशमेश षष्ठ में हो तो ये परस्पर त्रिकोण में भावेश होने के कारण उत्तम फल देंगे । क्योंकि कोई भी भावेश त्रिकोणेश व केन्द्रेश से अन्योत्या्य योग करें तो उत्तम

फल होता है।

एक दूसरे से नवम पंचम स्थान त्रिकोण होता है जैसे १।५,९।२,६।१०,३।७,११।,

४,८।१२ ये एक दूसरे के त्रिकोण स्थान हैं ।

भाव धर्मे और भावेश धमं विचार कर इनके फल की कल्पना करना ।

मालाश्रय योग

जब एक भाव का स्वामी जहाँ हो उस भाव का स्वामी कोई तीसरे स्थान में हो

उस तीसरे स्थान का अधिपति अन्य भाव में हो इस प्रकार माला सदृश भावेशों का

सम्बन्ध हो जाता है अंत का भावेश स्वगृही आदि अच्छी स्थिति में हो तो मालाश्रय

योग हो जाता है। जैसे लग्नेश चतुथं में हो, चतुर्थेश पंचम में हो, पंचमेश नवम में ` हो. नवमेश दशम में हो दशमेश लाभ में हो या लग्न में हो या स्वगृही हो तो यह माळाधय योग हो जाता है । जिसकी कुण्डली में इस प्रकार का योग हो तो यह राजा या राजा के समान श्रीमंत होता है।

ये मालाश्रय योग ६ प्रकार के हैं-

[१] अखण्ड मालाय । (२) त्रिकोण मालाश्रय । [३] केन्द्र मालाश्रय । (४) आपोक्लिम रो कलि 1 (५) “102. मालाश्रय । (६) अनियत मालाश्रय । एक दूसरे से लगातार भावेश का सम्बन्ध होने से अखंड मालाश्रय त्रिकोण केन्द्र आपोक्लिम पणफर आदि के भावेशों का सम्बन्ध 0025 स मालाश्रय होते हैं। इनके अतिरिक्त स्थानों का अनियत मालाश्रय होता है ।