भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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१० : सचित्र ज्योतिप्र शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

च्ययेश लग्नेश का-धन की हानि ।

चतुर्थेश दशमेश का-वैद्य हो । यु लग्नेश और इतर भावेश के सम्बंध से विचार

(१) लग्नेश द्वितीयेश का अर्थात्‌ लग्नेश द्वितीय में द्वितीयेश लग्न में-धनवान्‌ ,

उत्तम बुद्धि, आचार में प्रवीण, पुण्यकर्म, बली, योगी (जा० ल॑०) ।

(२) लग्नेश तृतीयेश का-थोड़ा पराक्रम, उत्तम बंधु, राजपूज्य, अपने कुछ को

सुखदायक, मातृपक्ष के आश्रय से युक्त (जा० ल॑०) ।

(३) लग्नेश चतुर्थेश को-क्षमावान्‌, पिता का आज्ञाकारी; राजकार्यं में सरल स्वभाव, उत्तम गुरु, पितृ पक्ष में रहने वाळा (जा० लं०) ।

(४) लरनेश पंचमेश का-उत्तम स्वभाव, विद्यालंकार युक्त, अपने कुल में प्रसिद्ध

दानी व मानी (जा० लं०), दत्तकयुक्त हो (जा० पारि०) ।

(५) लग्नेश षष्ठेश का-व्याधि रहित व सदा द्रोह करने वाला, देह में बलवान्‌,

द्रव्यवान्‌,-वस्तुओ का सग्रह करने वाला ( जा० छं० ) ।

(६) लग्नेश सप्तमेश का-पिता का सेवक, खियों के पीछे खर्च करने वाला व

उन्हीं में चञ्चल चित्त, साले की सेवा करने वाला ( जा० लं८ ) ।

(७) लग्नेश अष्टमेश का-जुआ खेलने वाला, श्‌ रवीर, चोरी करने वाला, राजा से

व किसी राज पुरुष से मृत्यु पाता है ( जा० ल॑० ) ।

(८) लग्नेश नवमेश का-विदेश में रहने वाला, धमं बुद्धि, देवता व गुरु की

पूजा में आसक्त व राजपूज्य ( जा० छं० ), धन और वस्त्रों से पूर्ण ( वृ० पा0) । _

(९) लग्नेश दशमेश-राजा तथा लाभ व रूप में प्रसिद्ध, गुरु सेवा में तत्पेर, चञ्चल चित्त तथा द्रव्य का स्वामी ( जा० लं० ) ।

(१०) लग्नेश लाभेश का-शुभ कमं करने वाला, दीर्घायु व पृथ्वी का स्वामी, शुभ धन युक्त व पंडित होता है ( जा० ल॑० ) ३३ वर्ष में १ हजार स्वणं मुद्रा प्राप्त ( वृ० पा०)

(११) लग्नेश व्ययेश का-सब घनों का शत्रु हो या सब जन उसके शत्रु हों, यह निरंतर बुद्धि हीन होता है । अत्यन्त कृपण बुद्धि होता है, द्रव्य नाश करने वाला तथा ° चञ्चल स्वभाव का होता है ( जा० लं० ) धर्म कार्य में घन का व्यय ( वृ० पा० )। इसी प्रकार पिता आदि का उनके सम्बन्धी भाव से विचारना जैसे पिता का दशम घर है तो पिता सम्बन्ध से विचारने को दशम घर को लग्न मानकर योगफल से पिता का विचारना तीसरे से भाई का इत्यादि । अन्य पंरिवर्तन योग

घनेश लाभ में.ळाभेश घन में-व्यापार धन्धा करे ( ज्यो० र० ), विवाद वाद भाग्योदय ( बु० पा० ) ।

तुतीयेश लाभ में लाभेश तृतीय में-भाईयों द्वारा घन आदि प्राप्त हो (बु० पा०) ।

चतुर्येण लाभ में लाभेश चतुर्थ में-१२ वें वर्ष में वाहनों का सुख ( वृ० पा० ) ।