भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

हो तो बुरा फल अवश्य होगा पर बहुत कम रूप से होगा । आपत्ति आने पर वह मान

पूर्वक उससे छुटकारा भी पा जायेगा । -

नीच गृही ग्रह 0

इसकी दशा में अपनी स्थिति से गिर जावे, अपमान हो, पाप युक्त कार्य करे, ऋण

बढ़े, नीच लोगों से सहायता लेवे, . अशुद्ध स्थान में रहे, नीच कार्य करे, लम्बी यात्रा

करे, अनर्थ कार्य करे ( फल० ) ।

ग्रह नीच या शत्रु स्थानी या क्रूर अंश में हो तो-धन न हो ।

ऐसे २ ग्रह हों-दुःखी । ऐसे ५ ग्रह हो-कैद भोगे ।

ऐसे ३ ग्रह हॉ-मूखं ओर जिद्दी । ऐसे ६ ग्रह हों-बघिक या कसाई हो ।

ऐसे ४ ग्रह हों-रोग से पिडित । ऐसे ७ ग्रह हों-भयानक पापी हो (सवं चिता०)।

एक ग्रह शत्रु स्थानी या नीच का-निर्धन ।

२ ग्रह शत्रु स्थानी या नीच के-सदा दुःखी, दरिद्र, सुख रहित ।

३ ग्रह शत्रु स्थानी या नीच के-मूखं, दुःखी, दरिद्री ।

४ ग्रह शत्रु स्थानी या नीच के-व्याधिष्ठ, उपरोक्त तीनों का फल और रोग ।

४ ग्रह शत्रु स्थानी या नीच के-कारागृह वास, बन्धन से संताप.

६ ग्रह शत्रु स्थानी या नीच के-वहुद कष्ट, बहुत दुःख, तप्त ।

७ ग्रह शत्रु स्थानी या नीच के-व्याधिष्ट, सदा मृत्यु तुल्य कष्ट (वृ० जा०) ।

३ ग्रह उच्च के हों तो-राजा हो ( मान० ) ।

३ ग्रह नीच के हों तो-दासं हो ( मान० ) ।

स्वगृही ग्रह का फल

स्वगृही ग्रह की दशा में शक्ति और बल प्राप्त होता है धनिक जनों की सहायता से

या स्वतः स्वामी हो । बिना कहीं गये अपने स्थान में स्थित रहे । नया घर प्राप्त करे,

नई भूमि कृषि योग्य प्राप्त करे, अपने जनों से सम्मानित, गुमी वस्तुएं प्राप्त हों (फल०) ।

१ ग्रह स्वगृही हो-कुल सम-कुल के अनुसार वैभव ।

२ ग्रह स्वगृही हों-जाति में श्रेष्ठ-कुल में श्रेष्ठ ।

३ ग्रह स्वगृही हों-सब में मान्य-बन्धु जनों का पूज्य ।

४ ग्रह स्वगृही हों-धनी-धनवान्‌ ।

५ ग्रह स्वगृही हों-अधिक धनी-सुखी ।

६ ग्रह स्वगृही हों-राजा सदृश-+अनेक भोग भोगी, राजा तुल्य ।

. ७ ग्रह स्वगृही हों--राजा ( जा० पारि० )--राजा हो ( चृ० जा० ) ।

३ ग्रह स्वगृही हों तो मंत्री हो--( मान० ) । मित्रगृही ग्रह का फल

. अपने सब प्रयत्नो में अपने मित्र द्वारा सफलता प्राप्त करे, नई मित्रता प्राप्त हो,

“अनेक पुत्र स्त्री, घन अन्न ओर दूसरे सुख प्राप्त हों सब लोगों से सहायता मिले(फल०)।

१ ग्रह मित्र गृही हो--पर द्रव्य का भोगी-लोग उसका पोषण करें ।