भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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योग विचार : ५३

२ ग्रह मित्र गृही हों--मित्र धन काँ भोगी--मित्र पोषण करे ।

३ ग्रह मित्र गृही हों--धन पैदा कर भोग करे--अपनी जाति वालों से पोषण । ४ ग्रह मित्र गृही हों--दाता - भाई पोषण करे ।

५ ग्रह मित्र गृही हों--मुखिया--बहुतों का स्वामी हो ।

६ ग्रह मित्र गृही हों--सेनापति--सेनापति हो ।

७ ग्रह्‌ मित्र गृही हों--राजा ( जा० पारि० )--राजा या बड़ा अधिकारी -हो .

( वु० जा० ) ।

१ भी ग्रह मित्र युक्त हो--सिद्धि होती है ( मान० ) ।

१ भी ग्रह मित्र दृष्ट हो--बड़ा धनवान्‌ ( मान० ) । शत्रुगृही ग्रह का फल

निकृष्ट (नीच प्रवृत्ति) हो, दूसरे के घर में रहकर पराया अन्न भक्षण करे, अति

दरिद्री और सदा बेरियों द्वारा सताया जावे । वह मनुष्य भी जो पहिले मित्र था बाद में

उसका विरोधी बन जावे ( फल० ) ।

५ ग्रह शत्रु क्षेत्री-मिश्न फल निन्द्य ग्रह के साथ शत्रुगृही ग्रह

६ ग्रह शत्रु क्षेत्री--सुखहीन . एक से अधिक होने का फल दे चुके हैं।

७ ग्रह शत्रु क्षेत्री--सब प्रकार का दुःख हो ( जा० पारि० ) ।

१ भी ग्रह शत्रु गृही या नीच का हो--धन हीन, सुख रहित, मूखं, रोग युक्त,

चांधवों में दुःखितं तथा पाप युक्त होता है ( मान० ) ।

सम गृही ग्रह का फल

विशेष कोई ध्यान देने योग्य प्रभाव नहीं होता पर सुख' या दुःख बिना कोई प्रभाव

डाले वसा ही रहने देता है ( फल० ) ।

वर्गोत्तम ग्रह का फल

स्वक्षत्र में ग्रह होने का जो फल है वही वर्गोत्तम अंश में होता हैं ( फल० ) ।

चक्री ग्रह फल

उच्च राशि में होने का जो फल कहा है वह फल हो चाहे ग्रह शत्रु गृही या नीच

में क्यों न हो ( फल० ) ।

अस्त ग्रह का फल | इसकी दशा में थोड़े समय में इसका अन्त हो, स्त्री पुत्र धन का भी कष्ठ हो, अना-

वश्यक .हानिया हों, झगड़ों में पड़ना पड़े । शत्रुता बढे, अपमान सहना पड़े ( फल० ) ।

अस्त ग्रह सब अशुभ ही करते हैं ।

३ ग्रह अस्त के हों तो--जड़ हो ( मान० ) ।

एक भी ग्रह उच्च का हो--राजा तुल्य हो ।

एक भी ग्रह मित्र से दृष्ट हो--धनवान्‌ हो ।

शक भी ग्रह मित्र ग्रह युक्त हो--सिद्धि होती है ।

एक्र भी ग्रह शत्रु गृही या नीच का हो--घन हीन, सुखी, मूर्ख ।