भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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योग विचार : ५५

ग्रह उच्च में-पूर्ण फल देता है मूल त्रिकोण के समान-अपने नवांश त्रिकोण में-चतुर्थाश कम । में फल देता है।

मित्रांशक में-आधा । स्वराशि तुल्य--मित्रांश में फल देता है शत्रु गृह में - चतुर्थांश । नीच में, शत्रु.गृह में, अस्तंगत में--शत्रु

नीच में--स्वल्प । राशि सदृश फल देता है ।

मृदु ग्रह कुछ फल नहीं देता । ` ( जा० पारि० )

(१) सूर्यं का उच्च नीच आदि स्थिति अनुसार फल 1

सूर्य उच्च में- बड़ा धीर, तेज स्वभाव, चतुर, गौरांग, बड़ा श्र, अनेक कला

जानने वाला, दण्ड देने के अधिकार से युक्त, धनवान्‌ ( मान० )। धनवान्‌ उग्र स्वभाव, धन, भाई, पुत्र, स्त्री खजाना से पूर्ण, उग्र प्रताप, शत्र, को जीते, कोप से व्याकुल भाइयों से परिपूर्ण मान ( ल० च० ) ।

सूर्य नीच का-निकले हुए बुरे दांत, फटा हुआ बुरा मुंह ( चौड़ा मुह ), समान आँत, जंघा और हाथ पैर स्थूरु, स्त्रियों में और विवाह में मन (मान०) । पतित, बंधु हीन, प्रवासी ( जा० पारि० ) | भाईयों से वजित, दास हों ( ल० चं० ) ।

सूर्य मूल त्रिकोण का-धनवान्‌, सुखी, कार्य का जानने वाला ( मान० ),

( ल० चं० ), धनी, बंदनीय ( जा० पोरि० ) ।

सूर्यं स्वगृही-बड़ा प्रतापी, सदा उद्यम करने वाला ( मान० ) । रमणीय मंदिर,

दुराचारी, अतिकामी ( जा० पारि० ) ।

सूर्य मित्र गृही-सर्वत्र विख्यात, शास्त्रज्ञ, चिर मैत्री ( मान० ) ( ल० चं० ) । दृढ़ मित्र, दाता, यशस्वी ( जा० पारि० ) ।

सूर्य शत्रू, गृही-बड़ा नीच, विषयों से पीड़ित ( मान० )। पितु सुख का त्यागी,

दूसरे का सेवक ( जा० पारि० ) ।

(२) चन्द्र का उच्च नीच आदि स्थिति अनुसार फल

चन्द्र उच्च में-विज्ञान तथा धनयुक्त, पवित्र, सत्पात्र, स्त्री का वियोगी, सबको

प्रिय (मान ०) । दानी भोगी, बंहुत स्त्रियों का पति, संसार भर का बन्धु, अनेक प्रकार

के खेल खेलने में बुद्धि, चञ्चल स्वभाव, पुत्र पोत्र हाथी, घोड़ा रथों से पूर्ण घर, विलासी

संसार में पूज्य, प्रसन्न मनुष्ण, अच्छे भषण, बड़ा भोगी, धनवान्‌ ( छ० चं० ) ।

चन्द्र नीच का-नुत्य करने या बाजा बजाने वाला, बड़ा बकवादी, धूर्तेता से

मित्रता करने वाला, खोटा पति, संदिग्ध मन ( मान० ) । रोगी, थोड़ा गुण वाला,

अभागा ( छ० चं० )।

चन्द्र मूल त्रिकोण का-धनवान्‌, भोगी.( मान० ) ( ल० चं० )। धन सुख से

युक्‍त ( जा० पारि० ) ।

चन्द्र स्वगृही-काम करने में निरत,साधुओं सरीखा व्यवहार, बड़ा मनस्वी,

रूपवान्‌ ( मान० ) । धर्मे में रत साधु, मनस्वी, रूपवान्‌, ( ढ० चं० ) ।