भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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षड्वर्ग विचार : ६७

'बड़वर्ग में लग्न क्रूर अंश में हो--दीन, शठ, अल्पायु हो ।

अंशों के स्वामी बळी हों तो--राजा हो ।

यदि उदित नवांश स्वामी बली हो तो--सुखी । यदि उदित द्रेष्काण स्वामी बली हो तो--राजा तुल्य । यदि उदित लग्त राशि स्वामी बली हो तो--भाग्यवान्‌, भूपति हो ।

चगो के प्रभाव में मत

नवांश का प्रभाव राशि के प्रभाव के समान होता है ।

राशि में पूर्ण फल होता है ।

वर्ग में आधा फल होता है ।

खोडशाँश, दशांश पष्ठ्यंश में--पाव ( ३ ) फल होता है ।

ग्रहों का बल साधने -के लिये यह वर्ग साधन करना पड़ता है ।

शुभग्रह-अपने उच्चगत, मित्र राशिगत ग्रह--शुभ होते हैं ।

पाप ग्रह-अपने नीच, शत्रु राशिस्थ ग्रह--अशुभ है ।

इससे ग्रह होरा आदि स्थापन करके शुभ पंक्ति पृथक्‌ रखना पाप पंक्ति पृथक्‌ रखना

यदि शुभ पंक्ति अधिक हो-तो वह ग्रह दशा और भाव में शुभ फल देग। ।

यदि पाप पंक्ति अधिक हो-तो वह ग्रह दशा और भाव में अनिष्ट फल देगा ।

शुभ ग्रह शुभ वर्गाधिक हो तो-अति शुभ |

पाप ग्रह शुभ वर्गाधिक हो तो-शुभ ग्रह भी निन्द्य हो जाते हैं।

इस प्रकार पाप ग्रह शुभवर्गाधिक्य होने से-शुभ हो जाता है ।

इस प्रकार पाप ग्रह पापवर्गाधिक्य होने से-अति निद्य है ।

ग्रहों का वर्ग साधन करके भावों के साथ उनका सम्बन्ध देखना जसे लग्नेश शुभ

ग्रह शुभ राशि में मित्र राशि या उच्च में हो तो-लग्न शुभाधिक्य होने से लग्न

सम्बन्धी सभी फलं शुभ होंगे। लग्न पापाधिक वर्ग हो और उसका स्वामी पाप ग्रह, पाप￾राशि गत व शत्रु राशि गत व नीच में हो तो-छरन सम्बन्धी अनिष्ट फल अधिक होगा ।,

जहाँ एक प्रकार से शुभ दूसरे प्रकार से अशुभ हो वहाँ मिश्र फल होगा जैसे

लग्नेश शुभ राशि में तीच व शत्रू, राशि गत हो या लग्नेश पाप, मित्र, उच्चराशि

में हो तो मिश्र फल होगा ।

इसी प्रकार द्वितीय तृतीय आदि भाव के सम्बन्ध से फल विचारना ।

ग्रहों के वग

षडवर्ग-(१) गृह (२) होरा (३) द्रेष्काण (४) नवमांश (५) द्वादणाँश

(६) त्रिशांश ।

सप्तवगं-(१) गृह (२) होर! (३) द्रेष्काण, (४) सप्तर्माश (५) नवमांश

(६) द्वादशांश (७) त्रिशांश ।

दशवर्ग-(१) गृह, (२) होरा, (३) द्रेष्काण, (४) सप्तमांश (५) नवमांश,

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