सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंषड्वर्ग विचार : ७१
(६) पारावत-समस्त शास्त्र जानने वाळा, अच्छा घर, अच्छा वाहन, एवं अन्य
राजकीय सामग्री युक्त, विद्या, यश,बहुत धन युक्त ।
(७) देवलोक-महादान करने वाला, संसार का राजा, सत्कीतियुक्त राजा, बहुत
वाहन ओर सेनायुक्त ।
(८) अमर (सुरलोक)-सद्भाग्य, धनधान्य पुत्रयुक्त, राजा ।
(९) ऐरावत-चक्रवर्ती राजा होकर समस्त ऐश्वर्य से परिपूर्ण, इन्द्रसदृश राजा,
अन्य राजाओं से वंदित राजा बनाता है ।
(१०) वैशेषिकांश-सम्पूर्ण श्रेष्ठ फल ।
(१) ग्रह स्ववर्ग में हो उसको परिजात आदि का फल शुभ होता है ।
(२) जो ग्रह रिक स्थान, शत्रु राशि, नीच राशि, अस्तंगत या बलहीन॑ हो या
मरण अवस्था में हो वे परिजात आदि के शुभफल नष्ट कर देते हैं ।
(३) जो ग्रह उच्च मूळ त्रिकोण आदि में पूर्ण बली. हो और कूर षष्ठघंश में,हो
तो उपरोक्त शुभफल का नाश कर देते हैं ।
जन्म समय दशवग में बलहीन ग्रह का. फल
१-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-राजा ।
२-वर्गा में ग्रह बलहीन हो-धनी ।
३-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-राजा का सित्र ।
४-वर्ग में ग्रह बलहीच हो-बन्धुओं में श्रेष्ठ ।.
श-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-बन्धु प्रिय ।
६-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-सुखहीन ।
छ-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-अनथं ( विपत्ति ) ।
८-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-दुःख ।
९-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-नाश ।
१०-वर्ग में ग्रह बलहीन हो-जातक की मृत्यु ।
सर्व वर्ग में ग्रह बलवान् हो तो-राजाओं में श्रेष्ठ हो ।
केन्द्रेश त्रिकोणेश आदि होने के अनुसार फल
वर्ग केन्द्रोश फल पंचमेश फल नवमेश फल
१-परिजात दाता कुलोचित विद्या तीथं करने वाला
२-वर्गोत्तम श्रेष्ठदाता उत्तम विद्या अनेक जन्म में तीर्थ करने वाला
३-गोपुर पुरुषत्व से युक्त संसार में ख्याति यज्ञ करने वाला
४-सिहासन लोकमान्य राजमंत्री वीर सत्यवक्ता जितेन्द्रिय
र १ ब्रह्म उपासक |
श-पारावत शूरवीर ब्रह्मज्ञानी परमहंस -
६-देवलोक सभापति कर्मयोगी दंडी या त्रिदंडी