भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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७८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(६) कन्या का

पहिला द्रेष्काण-कुमारी, फूलों से भरा घड़ा सिर पर धरे, मलिन वस्त्र पहिने, वस्त्र ओर घन का संग्रह चाहती । गुरु की सेवा करती या गुरु कुछ की ओर गमन करती स्त्री द्रेष्काण, मिश्र पक्षी द्रेष्काण ।

दूसरा द्रेष्काण-श्याम रंग, हाथ में कमल की लेखनी लिये । सिर में पगड़ी बांधे आमदनी खर्च की गिन्ती करने वाला बहुत धन मिले खर्च भी करे । सर्वाङ्ग में रोम व्याप्त, बड़ा धनुष धारण किये । पुरुष द्रेष्काण, मिश्र, पक्षी द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-गोरे रंग की स्त्री, सुन्दर स्वच्छ दुपट्टा ओढे लम्बा शरीर, घड़ा और करछुली हाथ में लिये । सावधानी से मन्दिर जाने को तैयार हो रही। स्त्री द्वेष्काण, पक्षी द्रेष्काण ।

(७) तुला का

पहिला द्रेष्काण-रास्ता बाजार में दुकान खोलकर तराजू हाथ में लिए पुरुष बैठा है चाप तौल में दक्ष सुवर्ण आदि द्रव्य के पात्रादिकों को तोल कर मोल बताता नर ड्रेष्काण, जल और पक्षी द्रेष्काण भी है । रज दूसरा द्रेष्काण-गीध पक्षी जैसा मुख, घडा लेकर गिरने को तैयार हो रहा, भूख ओर प्यास से व्याकुल पुरुष शरीर मन में भी स्त्री पुरुषों को याद कर रहा अन्य मत ` से घोड़े सरीखा मुख । नर द्रेष्काण, मिश्र, पक्षी द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-पुरुष मणियो के अलंकार से भूषित । जंगल में मृगों को भय दिखाता, सोने का आभूषण धनुष, तरकस कवच लिये । फल ओर मांस धारण करता या भक्षण करता वानर सरीखा दिखने वाछा पुरुष, चतुष्पद द्रेष्काण । ५८) वृश्‍चिक का

पहिला द्रेष्काण-स्त्री, वस्त्र पुष्पों से रहित, बड़े समुद्र के तीर और अपने स्थान से अष्ट, पैरों में सपं लपटा, मनोहर सुरत, स्त्री व अग्नि और सर्प द्रेष्काण । दूसरा द्रेष्काण-कछुआ या घड़े के समान शरीर स्त्री अपने पति के लिए स्थान 'सुख चाहती, शरीर में सर्पाकार चिह्न या पति के लिए शरीर पर सपं धारण करे, मिश्र, स्त्री और सपं द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-बड़ा और चिपटा सा मुख कछवे के मुख के समान, कुत्ता, हरिण स्यार, सुकर इनको डरवाने वाला हाथ में चन्दन लगाया या चन्दन के उत्पत्ति स्थान का रक्षक मित्र द्रेष्काण, पुरुष चतुष्पद । (९) घत्‌ का

पहिला द्रेष्काण-मनुष्य जैसा मुंह, घोए जैसा शरीर, अडा धनुष धारण किये, आश्रम में बैठा, यज्ञ के उपयोगी धुव आदि पात्र और यज्ञ करने वाले तपस्वियो की रक्षा करना पुरुष, मिश्र, उदित ( पक्षी ) द्रेष्काण। ` दुसरा द्रेष्काण-मन को रमण करने वाळी कांति, चम्पा के पुष्प या सुवणं सरीखी