भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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षड्वग विचार : ७९

भद्रासन पर बैठी । अति सुन्दर भी नहीं मध्यम रूप, समुद्र के रत्न घारण करने वाली ` स्त्री । मिश्र द्रेष्काण, स्त्री व धनुष द्रेष्काण ।

तीसरा द्रेष्काण-दाढीवाला पुरुष मुछें बड़ी, सोना या चम्पा पुष्प के समान कांति, श्रेष्ठ आसन सिंहासन कुरसी आदि में बैठा हुआ । लाठी हाथ में लिये, कुसुम्बी वस्त्र पहिने मृग चर्म धारण किये । मिश्र, पुरुष व आयुध द्रेष्काण । (१०) मकर का-पहिला द्रेष्काण-सर्वांग में दोष व्याप्त, मगर सरीखे दाँत, सुअर सरीखी देह, खेती करे वल जोते, जाळ, फाँसी, वेडी आदि लिये, भयानक मुख, मिश्च, पुरुष व चतुष्पद द्रेष्काण ।

दूसरा द्रेष्काण-सम्पूणं कला जानने वाली चतुर, कमल सदृश नेत्र । श्याम रंग की अनेक वस्तु को ढूंढ़ती, भूषणों से सजी कान में लोहा का भूषण पहिनी। जल द्रेष्काण, स्त्री व चतुष्पद द्रेष्काण ।

तीसरा द्रेष्काण-किन्नर सरीखी योनि, घोड़े जैसा मुख, उनके सरीख शरीर, कम्बल धारी, कवच धनुष भाला लिये। रत्न सहित घडा कन्धे पर रखा, सायुध पुरुष द्रेष्काण, मिश्च व चतुष्पद द्रेष्काण ।

(११) कुम्भ का-पहिला द्रेष्काण-तेल व शराव पिये, जल-भोजन मिलने के लिए अन्तः करण दुःखी । कम्बल ओढे, रेशमी वस्त्र व मृग चर्म धारण करना, गीध सरीखा मुख, अग्नि द्रेऽक्ञाण, पुरुष व आयुध द्रेष्काण ।

दूसरा द्रेष्काण-स्त्री जळती गाड़ी पर गोठी, सेमर के वृक्ष के पास, लोहा लिए, वन में मैले वस्त्र पहिने, बर्तन सिरथें धरे, मिश्र, सारिनक स्त्री द्रेष्काण, आयुध द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-स्याम वणं, कानों में बाल जमे हुए, सिर में किरीट ( मुकुट ) 'घारण किए । लोहे के पात्र में वृक्ष की छाल, पत्ते गोंद तेल और फल को रखे, एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना, पुरु ष, आयुध द्रेष्काण ।

(१२) मीन का-पहिला द्रेष्काण-त्न्‌ वादि यज्ञ पात्र सामान मोती मणि शंख सब हाथ में लिए, भूषण पहिने स्त्री के भूषणों के निमित्त, समुद्र में नाव आदि में बैठा जा रहा । पुरुष द्रेष्काण, आयुध द्रेष्काण ।

दूसरा द्रेष्काण-अँची ध्वजा वाले जहाज में नैठकर कुटुम्ब सखी जनों को लेकर समुद्र के तीर चछ रही। चम्पा पुष्प के समान मुख की पांति, जल स्त्री व आयुध द्रेष्काण ।

तीसरा द्रेष्काण-खाई के समीप रहे, सपं देह में घरे, बिना वस्त्र के अर्थात्‌ नंगा पुरुष वन में चोर और अग्नि के भय से मन में व्याकुल हो रहा । अग्नि द्रेष्काण, पुरुष, सपं द्रेष्काण ।

द्रेष्काण में चन्द्र का फल

जन्म में चन्द्र का फल द्रेष्काण अनुसार विचारना

(१ ) चन्द्र अपने या तात्कालिक मित्र के ३ष्काण में हो तो-रूप गुण अच्छे हों ।

चन्द्र सम द्रेष्काण में हो-गुण मध्यम ।