भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 122

१०६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्ड

कलह, विप्लव, शिव की भक्ति, गुहा प्रवेश, चिताएँ; स्त्री, माता पिता

` सास स्वसुर, मातामह ( नाना ) मातामही, ब्रण, चमं रोग, शूरु, क्षुघा,

पीड़ा, कम्बल, कस्तूरी, वैड्यं, शस्त्र, माषान्न, कृष्ण पुष्प, तिल तैल, रक्त,

सुवणं, लोहा, सप्त धान्य ।

अन्य प्रकार के कारक

(१) ग्रह एक दूसरे.के सम्बन्ध से जन्म समय में कारक होते है । जैसे-गुरु जन्म में

सूर्य से नवम हो तो यह कारक होता है । शनि जन्म में चन्द्र से ११ वां होतो

यह कारक होता है इत्यादि प्रकार से । शनि मंगल का कारक तब होता है जब

वह जन्म समय जहां है वहाँ से ११ वें स्थान में हो इत्यादि । एक दूसरे ग्रह

के शुभ मम्बन्ध से कारक कहलाते हैं ।

(२) अन्य प्रकार-ग्रह जन्म समय उच्च में, मूल त्रिकोण में हो और केन्द्र में हो तो वह

दूसरे ग्रह का कारक होता हैं। जो जन्म से दूसरे केन्द्र में होकर उच्च मूल

त्रिकोण या स्वगृही हा तो इसी प्रकार दूसरे कारक ग्रह होते है । अर्थात्‌ ग्रह

की लाभ जनक स्थिति जब हो तब उपरोक्त बताये । स्वगृही, उच्च या मूल

त्रिकोण में ग्रह हो तो ये सब आपस में कारक होते हैं । इनमें कर्म स्थान स्थित

ऐसा ग्रह विशेष कारक होता है । जैसे लग्न में कर्क राशि में चन्द्र हो, मंगल,

शनि, सूर्य तथा गुरु अपने उच्च के हों ये परस्पर कारक कहलायेंगे । लग्न में

स्थित ग्रह का चतुर्थं दशम स्थान में स्थित ग्रह पूणं कारक होता है ।

कारक विचार पर कुछ उदाहरण

अधिकार के सम्बन्त्र में विचार करना है तो {ण्डली में रवि की स्थिति पर पहिले

बिचार करना क्योंकि इसकी शुभाशुभ स्थिति पर दशमेश और लग्नेश का फल

निभर है ।

स्त्री और प्रापडिचक सुख का निर्णय करते समय केवल सप्तम के ग्रह तथा सप्तमेश

की स्थिति से ही नहीं बिचारना किन्तु शुक्र जो इस सुख का दाता है इससे भी प्रथम

बिचार करना । विद्या सन्तति सम्पत्ति का निर्णय करते समय केवल लग्नेश, धनेश,

पञ्चमेश, नवमेश, और लामेश की ही स्थिति नही विचारना किन्तु गुर की शुभाशुभ

स्थिति पर विचार कर इन स्थानों पर उनको दृष्टि का विचार अवश्य करना चाहिये

तब पूर्ण फल प्रगट होगा ।

आथिक सुख का विचार करते समय धनेश और छामेश के साथ शुक्र चन्द्र का भी

बिचार अवश्य करना चाहिये ।

दुःख, संकट, रोग, आयुष्य आदि का शनि कारक है । इन विषयों का विचार

करते समय शनि के उच्च नीच राशि और अंश शुभ ग्रहों को दृष्टि और युति का भी

विचार करना चाहिये तभी ठीक फल मिलेगा । 1).