भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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१०८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

कारक ग्रह का शुभाशुभत्व

कारक ग्रह--पाप युवत हो तो पराया घन-स्त्री भोगने वाला, नीरस वचन, कपट बुडि,

आलसी ।

पापदृष्ट-दुष्ट, रोगो, अपने धमं गुण यश से होन ।

शुभ युधत-दात्रु को जीतने वाला, घर्मवान, बुद्धिमान हो ।

शुभ दृष्ट-पुत्र घन से युवत) भोगी, सुन्दर, राज पूज्य पराभव से रहित ।

आत्म कारक आदि का विचार

१ आत्मकारक ग्रह--सूर्य से शनि तक सात ग्रहों में से जिम ग्रह के स्पष्ट करने पर अंश

अधिक हों वह ग्रह आत्म कारक होता है । कोई इसमें राहु ग्रह भी ले लेते

हैं अर्यात्‌ ८ ग्रह लेकर अंश का विचार करते हैं ।

यदि ग्रहों के अंश बराबर हों कला विकला में जो अधिक हो उसे

लेना । यदि अंश कला विकला भी समान हो तो उनमें .जो सबसे बली हो

वही आत्मकारक होगा ।

आत्म कारक ग्रह नोच राशि या पाप योग से बंधन का स्वामी होता

है अर्थात प्रतिकूल होकर पाप कर्म में प्रवृत्ति के द्वारा संसार रूपी बंधन

देता है । उच्चादि राशि और शुभ योग से मोक्ष का स्वामी होता है अर्थात्‌

अनुकूल होकर ज्ञान घर्म स्थान वासादि द्वारा मोक्ष कर्ता होता है ।

२ अमात्य कारक qg -( मन्त्रो कारक ग्रह )--आत्म कारक ग्रह से कुछ न्यून अंश

बाला ग्रह होता है ।

` जिस कुंडली में अमात्य कारक ग्रह नोचादि पाप ग्रह से युक्‍त हो

उसको राजा मन्त्री, स्वामी आदि श्रेष्ठ लोगों से दुःख देता है उच्चादि शुभ

ग्रह से युक्त हो तो राजा आदि जनों से सुख देता है ।

३ आतु कारक ग्रह--आमात्य कारक ग्रह से कुछ अल्प अंशादि से कम ग्रह होता है ।

इससे भ्रातु सम्बन्धी दुःख सुख का विचार होता है ।

४ मातु कारक--भ्रातु कारक ग्रह से कुछ अल्प अंशादि वाला ग्रह । इससे मातृ सम्बन्धी

दुःख सुख का विचार होता है । इससे कोई qq का भी विचार करते हैं।

५ पितु कारक--मातृ कारक से कुछ अल्प अंश वाला ग्रह । इससे पिता सम्बन्धी दुःख

सुख का विचार होता ë ।

६ पुत्र कारक ग्रह--पितु कारक से अल्प अंश वाला ग्रह । इससे पुत्र सम्बन्धी दुःख सुख

का विचार होता ë । :

७ ज्ञाति कारक qg—qa कारक से अल्प अंश वाला ग्रह । इससे ज्ञाति सम्बन्धी दुःख

सुख का विचार होता है ।