भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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११० : ज्योतिष-जिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

स्थिर कारक विचार

(१) पितृ कारक- सूयं और शुक्र में जो बको हो इन दोनों से माता और पिता के

(२) मातृ कारक- चन्द्र और शुक्र ,, ,, शुभाशुभ का विचार होता है।

चर कारक

( १) अमात्य- आत्म कारक से न्यून अंश वाला

( २) ञ्रातृ--उससे न्यून अंश वाला

(३) पिता--,, ४

( x ) पुत्र esa 11 ”

(५) ज्ञाति-- ,, i;

(६)स्त्री- , १

इस विचार में भो भिन्न २ मत हैं :--किसो का मत है कि जब किसी ग्रह में

अंक्षादि तुल्य हो जावें तब राहु से भी कारक का विचार करे कोई कहते हैं कि राहु सहित

८ कारक पृथक्‌ विचारना ।

कुछ का मत है कि मातु कारक और पुत्र कारक एक हो है अर्थात्‌ दोनों को एक

मानते हैं । यह भी बताया है कि जब दो ग्रहों के अंश तुल्य हों तो एक ही कारक सम￾झना उसके अग्रिम कारक का लोप हो जाता है। उस हालत में स्थिर कारक के द्वारा ही

छुभाशुभ का विचार करना ।

राहु के अंश का विचार

राहु का कारक विचारने में उसके स्पष्ट अंश को ३०° में से घटा कर शेष अंकों

को लेकर कारक विचारना क्यों कि वह सदा उल्टा चलता है । जैसे राहु स्पष्ट

रा अं ? ” है इस के अंश ३० से घटाये तो शेष २ १-५३-२८ ३०-"-०

२-८-६-३२ ; -८-६-३२

रहे । यहां २१° राहु लेता बताया ë! शेष २१-५३-२८

यहां इस प्रकार विचारने से राहु के अंश सब में अधिक जाने से उपरोक्त ग्रहों

में वह आत्म कारक हो जाता है।

आत्म कारक ग्रह--सब से अधिक अंश वाला ग्रह ।

अन्त्य कारक ग्रह--सब से अल्प अंश वाला ग्रह ।

मध्य कारक .उपखेट--मध्य के अंश वाला ग्रह्‌ ।

प्रन्त्री आदि अधिकारी राजा को आज्ञा के बिना किसी का कुछ नहीं कर सकते इसी

प्रकार आत्म कारक के विरुद्ध कोई भी ग्रह अपने फल देने में समर्थ नहीं होते । जैसे

आत्म कारक ग्रह अशुभ हो तो अन्य शुभ ग्रह भी अपने फल को नहीं दे सकते । यदि

आत्म कारक शुभ हो तो ग्रह अपने अशुभ फल को नहीं देते ।

कारकांश विचार

आत्म कारक ग्रह के नवांश को कारकांश कहते हैं ।